नेपाल बाढ़ में 275 भारतीय अब भी लापता, दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट में पानी भरा, उप्र का एक तिहाई से अधिक जिले बाढ़ प्रभावित, मप्र में 2 युवक बाढ़ में बहे। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
नेपाल फ्लैश फ्लड के बाद कम से कम 275 भारतीय अभी भी लापता हैं। विदेश मंत्रालय (MEA) के मुताबिक, अब तक 166 भारतीयों को सुरक्षित बचाया गया है और चीन सीमा से 1,907 भारतीय सुरक्षित नेपाल पहुंच चुके हैं। नेपाल में इस प्राकृतिक आपदा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 1,295 हो गई है।
दिल्ली में हुई अत्यधिक बारिश के कारण इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय (IGI) हवाई अड्डे के टर्मिनलों (T-2 और T-3) के अंदर पानी भर गया। रनवे और टर्मिनलों में पानी भरने के कारण 400 से अधिक उड़ानें प्रभावित हुईं और 11 उड़ानों को डायवर्ट करना पड़ा। दिल्ली में इस मानसून सीजन में कुल वर्षा का आंकड़ा 509.8 मिमी तक पहुंच गया है, जो सामान्य से 11% अधिक है।
बिहार में गंगा सहित कई प्रमुख नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं, जिससे कई तटीय जिले जलमग्न हैं। राहत कार्यों के लिए राज्य सरकार ने एनडीआरएफ (6) और एसडीआरएफ (27) की 33 टीमें तथा 600 से ज्यादा सरकारी नावें तैनात की हैं। उत्तर प्रदेश के कुल 75 जिलों में से एक तिहाई से अधिक यानी 26 जिले गंभीर रूप से बाढ़ प्रभावित हैं।
मध्य प्रदेश में पानी की गुणवत्ता जांचने की व्यवस्था में गंभीर बुनियादी कमियां उजागर हुई हैं। राज्य की सभी 155 जल परीक्षण प्रयोगशालाओं में से किसी में भी पानी की केमिकल टॉक्सिसिटी जांचने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) की जांच भी केवल एक राज्य स्तरीय प्रयोगशाला में हो सकती है।
मध्य प्रदेश के श्योपुर और शिवपुरी जिलों में अत्यधिक वर्षा से बाढ़ जैसे हालात बन गए हैं। श्योपुर की मोरडूंगरी नदी और शिवपुरी की अमराल नदी को पार करने की कोशिश में दो युवक पानी के तेज बहाव में बह गए। सतना के चित्रकूट में मंदाकिनी नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है।
आईआईटी मंडी के एक वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया है कि हिमाचल प्रदेश में 3,500 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर कुल 2,076 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। पिछले 10 वर्षों में राज्य की ग्लेशियर झीलों की कुल संख्या में 710 नई झीलों की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इन झीलों के कुल सतही क्षेत्रफल में 28.45% का बड़ा इजाफा हुआ है।
विस्तृत चर्चा
आज रिपोर्टर्स डायरी में हमारे असोसिएट एडिटर वाहिद भट बता रहे हैं भारत की ग्लेशियल झीलों और हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट्स से संबंधित उनकी 2 महत्वपूर्ण रिपोर्ट्स के बारे में। इसके अलावा हमारे रिपोर्टर अब्दुल वसीम अंसारी से जानिए एथेनोल फैक्ट्री के बारे में की गई उनकी पड़ताल के बारे में।
हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा और झीलों की निगरानी: वाहिद भट
नेपाल की हालिया सैलाब ने हमारे पड़ोसी मुल्क में भारी तबाही मचाई है। अगर इस पूरे वाक़ये को सिलसिलेवार तरीके से देखें, तो 26 अगस्त 2026 को नेपाल-चीन सरहद के पास लांगतांग लिरुंग चोटी से बर्फ और चट्टान का एक बड़ा हिस्सा टूट कर नीचे आ गिरा। इसके बाद एवलांच आया, जिसने भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों के आस-पास बहुत तबाही मचाई। कई गांव, सड़कें और पुल तबाह हो गए, जबकि ग्यीरोंग पोर्ट का तिजारती रास्ता भी नुक़सान का शिकार हुआ। इस आफ़त में अब तक 1,200 लोगों की जान चली गई और 4,200 से ज़्यादा लोग लापता हो गए।
इस इंसिडेंट की वजह से एक जगह नदी का पानी रुक गया और वहां एक नई झील बन गई। बाद में जब इस झील का पानी भर कर बाहर निकला, तो नीचे के इलाक़ों में और ज़्यादा तबाही मची। इस सैलाब से नेपाल के 12 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को भी भारी नुक़सान हुआ और सुरंगों के अंदर 900 से ज़्यादा वर्कर्स फंस गए। मैं पहले भी सलाल डैम और कई दूसरे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के बारे में पढ़ चुका हूं और कुछ प्रोजेक्ट्स पर रिपोर्टिंग भी की है। नेपाल की इस वाक़्या के बाद मेरे ज़ेहन में एक सवाल आया, क्या यह आफ़त इंडिया के लिए भी एक अलर्ट है?
मुल्क में इस वक़्त 98 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पाइपलाइन में हैं, जिनकी कुल क्षमता 58,196 मेगावाट है। इनमें से 36 प्रोजेक्ट्स अभी बन रहे हैं। यह प्रोजेक्ट्स ज़्यादातर अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और जम्मू-कश्मीर जैसे पहाड़ी रियासतों में हैं। हम सिक्किम में भी देख चुके हैं कि एक जीएलओएफ ने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को कितना बड़ा नुक़सान पहुंचाया था। इसलिए नेपाल की इस तबाही के बाद मैंने यह जानने की कोशिश की कि इंडिया अपने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को मुस्तक़बिल में ऐसी आफ़तों से कैसे महफ़ूज़ रख सकता है। इसी सवाल के साथ मैंने मुख़्तलिफ़ एक्सपर्ट्स से बात की।
साइंटिस्ट्स के मुताबिक़ हिमालय दुनिया के कई दूसरे हिस्सों के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ी से गर्म हो रहा है। बर्फ कम हो रही है और ग्लेशियर्स पीछे हट रहे हैं। जैसे-जैसे बर्फ कम होती जा रही है, नीचे की चट्टानें ज़्यादा गर्मी ले रही हैं। इससे एवलांच, लैंडस्लाइड और अचानक आने वाली फ्लड्स का ख़तरा बढ़ सकता है। ग्लेशियल लेक्स के टूटने से आने वाली फ्लड्स, जिसे जीएलओएफ भी कहते हैं, नीचे बने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के लिए बड़ा ख़तरा बन सकती है।
इंडिया का सेंट्रल वाटर कमीशन इस वक़्त 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,485 ग्लेशियल लेक्स को मॉनिटर कर रहा है। इनमें से 56 लेक्स को बहुत ज़्यादा ख़तरे वाली कैटेगरी में रखा गया है। कश्मीर यूनिवर्सिटी की एक हालिया स्टडी के मुताबिक़, कश्मीर हिमालय में ग्लेशियल लेक्स का एरिया 1992 से 2024 के दरमियान 26 प्रतिशत बढ़ गया है। इसका मतलब यह है कि सिर्फ़ बाढ़ का ख़तरा नहीं बढ़ रहा। पुल, सड़कें और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स भी ख़तरे में आ सकते हैं।
मेरी दो स्टोरीज़ इसी सवाल का जवाब ढूंढती हैं। पहली स्टोरी में हमने देखा कि सरकार को हिमालय में बन रही और बढ़ रही ग्लेशियल लेक्स पर ज़्यादा ध्यान क्यों देना चाहिए। दूसरी स्टोरी में हमने यह सवाल पूछा है कि अगर इंडिया हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स बढ़ा रहा है, तो क्या हम उनकी हिफ़ाज़त पर भी उतना ही ध्यान दे रहे हैं? सिर्फ़ बिजली बनाना काफ़ी नहीं है। हमें इन प्रोजेक्ट्स को बाढ़ और दूसरी पहाड़ी आफ़तों से बचाने के लिए उनकी सेफ़्टी और मॉनिटरिंग पर भी ध्यान देना होगा।
आप हमारी वेबसाइट पर जाकर दोनों स्टोरीज़ को तफ़्सील से पढ़ सकते हैं।
स्टोरी –
नेपाल की बाढ़ के बाद भारत में हाइड्रो प्रोजेक्ट्स की निगरानी बढ़ाने की मांग
जब एथेनॉल फैक्ट्री बनी मुसीबत का सबब: अब्दुल वसीम अंसारी
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर बसा कुंडला आगर गांव के ग्रामीण 21 जुलाई को बरसते हुए पानी में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, उनका आरोप था कि गांव में स्थित इथेनॉल फैक्ट्री दूषित पानी नाले में बहा रही है।
10 अगस्त को ग्ग्रामीणों के आरोप और फैक्ट्री का जायज़ा लेने के लिए हम भी निकल पड़े, लेकिन बारिश इतनी थी कि हमे बीच रास्ते से वापस लौटना पड़ा। हालांकि हमने 11 अगस्त को फिर प्लान किया और निकल पड़े।
जब हम आगर मालवा पहुंचे तो वहां से लगभग 7 से 8 किलोमीटर की दूरी पर गांव से पहले ही बाई तरफ इथेनॉल फैक्ट्री है और बाई तरफ से ही गांव के लिए रास्ता जाता है। गांव में कदम रखते ही एक अजीब से दुर्गन्ध महसूस हुई जो हमे असहज महसूस करा रही थी। आसपास खड़े हुए लोग हमारी तरफ गौर से देखने लगे और बताने लगे कि यहां के लोगों के लिए ये आम बात है।
पूछने पर मौके पर मौजूद ग्रामीण उनके द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन वाले दिन के फोटो वीडियो दिखाते हुए फैक्ट्री की तरफ इशारा करते हुए कहते है कि यह कंपनी प्रदूषित पानी गांव के नाले में छोड़ रही है जिससे हमारे गांव के पेयजल स्त्रोतों पर भी प्रदूषण का खतरा मंडरा रहा है।
ग्रामीण हमे उस नाले के पास लेकर गए जिसमें फैक्ट्री के द्वारा दूषित पानी छोड़े जाने के आरोप कंपनी पर लग रहे थे। हालांकि 9 और 10 अगस्त को हुई मूसलाधार बारिश से नाला बिल्कुल साफ हो चुका था लेकिन दुर्गन्ध फिर भी आ रही थी ग्रामीण आगे-आगे और हम पीछे-पीछे चलते रहे।
नाले से सटे हुए फैक्ट्री के आखिरी छोर जहां से ग्रामीण पानी छोड़े जाने की बात कह रहे थे वहां तक पहुंचने के लिए हमे नाले के पानी में उतरकर कीचड़ से सने वा फसलों से ढके हुए रास्ते की तरफ लगभग 10 मिनट तक चलना पड़ा पैरों के जूते गारा लगने के बाद और भारी हो चुके थे फिर भी हम ग्रामीणों के पीछे चलते रहे।
आखिर हम अपने मुकाम तक पहुंच गए,जहां पानी स्थिर और मटमैला था। लेकिन वहां से फैक्ट्री से पानी निकलता हुआ नजर नहीं आ रहा था। नाले की रिकॉर्डिंग करने के दौरान कंपनी के कुछ कर्मचारी हमारी भी रिकॉर्डिंग करने लगे। लेकिन हमने बगैर कोई प्रतिक्रिया दिए अपना काम जारी रखा और ग्रामीणों के पेयजल स्त्रोतों वा ग्रामीणों के सभी आरोपों को अपने कैमरे में कैद किया। हालांकि नाले में मौके पर हमे कोई प्रदूषण नहीं मिला।
लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं था कि ग्रामीणों के द्वारा लगाए गए आरोप प्रदर्शन और फोटो वीडियो और मौके पर तहसीलदार का बयान कोई मायने न रखता हो। हमने हमारी रिसर्च लगातार जारी रखी क्योंकि फैक्ट्री मालिक ने अपना पक्ष रखते हुए ग्रामीणों के आरोपों को बेबुनियाद और मौके की तस्वीरों तक को झुठला दिया था और अपने प्लांट को जीरो लिक्विड डिस्चार्ज पॉलिसी का पालन करने वाला बताया था। हालांकि प्रशासनिक जांच अभी भी लंबित है।
लेकिन फैक्ट्री से संबंधित ऑनलाइन खंगाले गए दस्तावेज में हमे कुछ ऐसे प्रमाण मिले है जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दरअसल इथेनॉल का निर्माण करने वाली इन फैक्ट्रियों को अति प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों की फेहरिस्त में शामिल किया गया है। इन पर 24 घंटे ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम से निगरानी की जाती है।
लेकिन उक्त कंपनी के बारे में जानकारी देखने पर संबंधित दिनांक को ऑनलाइन डाटा NA दिखा रहा था। जिसके संबंध में हमने प्रमाणित जानकारी जुटाने के लिए उज्जैन पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अधिकारियों को ऑनलाइन सिस्टम का स्क्रीन शॉट वा 1 जुलाई से अगस्त तक की पीडीएफ रिपोर्ट भी सेंड की और जानने के प्रयास किए कि रिपोर्ट में NA का मतलब क्या है?
लेकिन अधिकारियों ने अभी तक हमारे किसी सवाल का कोई जवाब न तो कॉल पर दिया और न ही व्हाट्सएप पर,जो कही न कही कंपनी मालिक के जीरो लिक्विड डिस्चार्ज के दावे को कमजोर करती हुई नजर आ रही है लेकिन इसका अंतिम निर्णय प्रशासनिक जांच रिपोर्ट आने के बाद ही तय होगा।
स्टोरी –
कुंडला आगर इथेनॉल फैक्ट्री: नाले, पानी और ऑनलाइन डेटा पर उठते सवाल
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
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