पेट्रोल और डीजल की कीमतों में फिर बढ़ोतरी, इबोला को लेकर केंद्र का अलर्ट, मध्य प्रदेश की वनभूमि प्राइवेट हाथों में देने की तैयारी, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
केरल के कई हिस्सों में भारी बारिश और तेज हवाओं के कारण मौसम विभाग ने 12 जिलों में ऑरेंज और येलो अलर्ट जारी किया है। दरअसल प्रदेश में मानसून के 26 मई तक आने की संभावना जताई गई है इसी बीच यहां भारी बारिश के चलते संपत्ति को नुकसान पहुँचा है।
केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देश दिया है कि पर्यावरण मंजूरी (environmental clearance) की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए हर 15 दिन में बैठक आयोजित की जाए। इसका उद्देश्य खनन और विकास कार्यों को पर्यावरणीय मंजूरी न मिलने के कारण अटकने से रोकना है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इबोला को ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित किए जाने के बाद भारत सरकार ने अलर्ट जारी किया है। कांगो, युगांडा और सूडान जैसे देशों की यात्रा करने वाले लोगों की हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग की जा रही है और लक्षण दिखने पर तुरंत सूचना देने को कहा गया है।
सोमवार को 10 दिनों में चौथी बार पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बढ़ाई गईं, इस बार पूरे देश में औसतन ₹2.80 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई। इससे दिल्ली में पेट्रोल की कीमत ₹102.12/लीटर और डीज़ल की ₹95.20/लीटर हो गई।
मध्यप्रदेश में गहराते जल संकट को देखते हुए मुख्यमंत्री ने जल आपूर्ति से जुड़े अमले की छुट्टियां रद्द कर दी हैं। पानी की टंकियां भरने के लिए बिजली की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी और ग्रामीण क्षेत्रों में नए बोरवेल के लिए 1500 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।
मध्यप्रदेश में गिद्धों के संरक्षण के प्रयासों के सफल परिणाम सामने आए हैं और राज्य में इनकी संख्या 10,000 के पार पहुंच गई है। पिछले एक साल में करीब 1200 गिद्ध बढ़े हैं, जिसका मुख्य कारण मानवीय दखल कम होना और हानिकारक दवाओं पर नियंत्रण है।
विस्तृत चर्चा
आज की चर्चा में हमारे एडिटर इन चीफ पल्लव जैन से जानिए नए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों को लागू करने पर सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ? साथ ही हमारे रिपोर्टर अब्दुल वसीम अंसारी बता रहे हैं मध्य प्रदेश सरकार के उस फैसले के बारे में जिसके बाद प्रदेश की वनभूमि प्राइवेट हाथों में दी जा सकेगी।
ठोस कचरा प्रबंधन पर सख्त सुप्रीम कोर्ट
देश में कचरा प्रबंधन नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अब हर घर को कचरा चार श्रेणियों में अलग करना होगा। नियमों का उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।
कचरे का चार श्रेणियों में वर्गीकरण: नियमों के अनुसार, कचरे को स्रोत पर ही चार श्रेणियों गीला कचरा, सूखा कचरा, सेनेटरी कचरा और विशेष कचरा (जैसे ई-कचरा, बैटरी, सिरिंज आदि) में अलग करना अनिवार्य है।
जवाबदेही और जिला कलेक्टर की भूमिका: कोर्ट ने नियमों को लागू कराने की जिम्मेदारी जिला कलेक्टरों को सौंपी है। इसके लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को उन्हें ‘पर्यावरण संरक्षण एक्ट 1986’ के तहत एक वर्ष के लिए विशेष शक्तियां देने का निर्देश दिया गया है। हर जिले में एक ‘स्पेशल सेल’ बनाई जाएगी जिसमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी भी शामिल होंगे।
बल्क वेस्ट जनरेटरों के लिए नियम: होटल, मॉल, अस्पताल और बड़ी हाउसिंग सोसायटियों को ‘बल्क वेस्ट जनरेटर’ के रूप में पंजीकरण कराना होगा। उन्हें परिसर में ही कचरा अलग करना होगा और गीले कचरे से खाद बनाने या ऑनसाइट प्रोसेसिंग करनी होगी।
दंडात्मक कार्रवाई: नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ बिजली और पानी के कनेक्शन काटने जैसी सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
स्थानीय निकायों पर प्रभाव: जो स्थानीय निकाय इन नियमों को लागू नहीं करेंगे, उनकी केंद्रीय और राज्य स्तरीय ग्रांट (अनुदान) प्रभावित हो सकती है। कचरा केवल बंद और ढके हुए वाहनों में ही ले जाया जा सकेगा और खुले में कचरा फेंकना प्रतिबंधित होगा।
कोर्ट का मानना है कि कचरा प्रबंधन की स्थिति अब “अभी या कभी नहीं” (now or never) के मोड़ पर है और इसका पालन करना सरकार और नागरिक दोनों की जिम्मेदारी है।
निजी हाथों में जाएंगी वन भूमि
मध्य प्रदेश सरकार केंद्र सरकार के जनवरी 2026 के दिशा-निर्देशों के आधार पर एक नई वन भूमि लीज नीति तैयार कर रही है।
मुख्य उद्देश्य: इस नीति का प्राथमिक लक्ष्य राज्य के बिगड़े हुए वनों को पुनर्जीवित करना है। इसके लिए निजी कंपनियों को वृक्षारोपण और सस्टेनेबल हार्वेस्टिंग (सतत कटाई) के लिए वन भूमि लीज पर दी जाएगी।
आदिवासी अधिकारों का संरक्षण: नीति में यह स्पष्ट किया गया है कि पेशा (PESA) कानून, वन अधिकार कानून (FRA) और अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों की भूमि को इस नीति से बाहर रखा गया है ताकि आदिवासी समुदायों के हितों की रक्षा की जा सके।
सरकार का नियंत्रण और स्वामित्व: वन भूमि का मालिकाना हक और नियंत्रण पूरी तरह से राज्य सरकार के पास ही रहेगा। निजी निवेशक केवल स्वीकृत वर्किंग और मैनेजमेंट प्लान के अनुसार ही काम करेंगे।
स्थानीय लाभ: इस नीति के तहत स्थानीय ग्रामीणों और संयुक्त वन प्रबंधन समितियों को रोजगार में प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही, इसमें राज्य सरकार की राजस्व हिस्सेदारी भी तय की गई है।
उल्लेखनीय है कि मार्च 2025 में इस नीति का पुराना ड्राफ्ट वापस ले लिया गया था, क्योंकि आरएसएस से जुड़े वनवासी कल्याण आश्रम और अन्य संगठनों ने इसका विरोध किया था।
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