देश भर में सामान्य से 18 प्रतिशत अधिक बारिश, खरीफ उत्पादन पर एल नीनो का प्रभाव कम रहने की उम्मीद, ईवी, सीएनजी और हाइड्रोजन ईधन आधारित कमर्शियल वाहनों की आयु सीमा बढ़ेगी, ओडिशा में 25 साल की सबसे ज्यादा बारिश। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
मंगलवार को देश भर में सामान्य से 18 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई। इसके बावजूद पूरे मानसून सीजन (1 जून से 18 अगस्त) की बारिश का कुल घाटा अभी भी 13 प्रतिशत पर बना हुआ है। देश के कुल 36 मौसम उपमंडलों में से 22 में अभी भी बारिश की कमी बनी हुई है।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आईसीएआर की 97वीं वार्षिक आम बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि देश में कमजोर मानसून के प्रति संवेदनशील जिले 262 से घटकर लगभग 100 रह गए हैं। इसके चलते इस साल खरीफ उत्पादन पर एल नीनो का प्रभाव बहुत सीमित रहने की उम्मीद है।
केंद्र सरकार ने नेशनल परमिट वाले ईवी, सीएनजी और हाइड्रोजन से चलने वाले कमर्शियल वाहनों की मौजूदा आयु सीमा को 5 साल बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है। इस नए संशोधन के बाद इन वाहनों की आयु सीमा 12 और 15 साल से बढ़कर क्रमशः 17 और 20 साल हो जाएगी।
ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों और मुफ्त रसोइयों की व्यवस्था के लिए ₹1,000 करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की है। राज्य में जून से अब तक लगभग 1,100 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है, जो सामान्य से 34 प्रतिशत अधिक है। मुख्यमंत्री के अनुसार, यह पिछले 25 वर्षों में ओडिशा में मानसून के दौरान दर्ज की गई सबसे अधिक बारिश है।
राजस्थान में सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए चलाई जा रही ‘पन्नाधाय बाल गोपाल योजना’ स्किम्ड दूध पाउडर की 58 प्रतिशत की भारी कमी से जूझ रही है। राज्य के स्कूलों में केवल 41.90% दूध पाउडर की ही आपूर्ति हो सकी। जबकि 41 जिलों में से 17 जिलों में कोई आपूर्ति नहीं हुई।
मध्य प्रदेश कैबिनेट ने ‘निर्मल एवं अविरल मां नर्मदा मिशन’ (नमन मिशन) को अपनी मंजूरी दे दी है। इस त्रि-स्तरीय मिशन के अध्यक्ष खुद मुख्यमंत्री मोहन यादव होंगे। इस मिशन को राज्य अनुदान के माध्यम से प्रति वर्ष ₹100 करोड़ दिए जाएंगे।
विस्तृत चर्चा
दतिया में अतिकुपोषण के चलते एक 16 महीने की बच्ची की मौत हो गई। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार पूरे प्रदेश में ही मां और 6 वर्ष तक के बच्चों को 300 दिन के बजाए सिर्फ 170 दिन का पोषण आहार मिला है। पूरी खबर जानते हैं पल्लव जैन से।
मध्य प्रदेश में कुपोषण का संकट और बंद ‘आहार’
केंद्र सरकार के पोषण मिशन 2.0 के तहत गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और 6 वर्ष तक के बच्चों को साल में कम से कम 300 दिन पोषण आहार देना अनिवार्य होता है। लेकिन मध्य प्रदेश में ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है।
राज्य में एक साल में जुलाई तक केवल लगभग 170 दिन ही नियमित पोषण आहार मिल पाया है। चर्चा के अनुसार, कुछ स्थितियों में यह आपूर्ति साल में केवल 160 दिन ही मिल सकी है। वितरण में यह भारी कमी एक बेहद महत्वपूर्ण केंद्रीय कल्याणकारी योजना के राज्य स्तर पर क्रियान्वयन में गंभीर विफलता को दर्शाती है।
कुपोषण के चिंताजनक आंकड़े
पोषण आहार के वितरण में यह विफलता ऐसे समय में हो रही है जब मध्य प्रदेश में कुपोषण की स्थिति राष्ट्रीय औसत के मुकाबले पहले से ही काफी गंभीर बनी हुई है।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के आंकड़ों के मुताबिक:
ग्रामीण क्षेत्रों में अंडरवेट बच्चे: ग्रामीण इलाकों में अंडरवेट बच्चों की संख्या 33% से बढ़कर 42% हो गई है।
वेस्टिंग: बच्चों में वेस्टिंग की दर में 6% की बढ़ोतरी हुई है।
उम्र के मुकाबले कम वजन: उम्र के अनुपात में कम वजन वाले बच्चों की संख्या 33% है।
ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि जिस समय ग्रामीण बच्चों को इस सुरक्षा कवच की सबसे ज्यादा जरूरत है, उसी समय पोषण वितरण की यह पूरी व्यवस्था विफल साबित हो रही है।
पोषणहार फैक्ट्रियों का बंद होना
इस आपूर्ति संकट का एक मुख्य कारण राज्य सरकार द्वारा पोषणहार बनाने वाली सात फैक्ट्रियों को बंद करने का फैसला है। इन फैक्ट्रियों में टेक-होम राशन (THR) के रूप में बांटी जाने वाली खिचड़ी, दलिया और लड्डू जैसे पोषणहारों की पैकेजिंग होती थी, जो आंगनबाड़ियों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं और बच्चों तक पहुंचती थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन फैक्ट्रियों को ग्रामीण आजीविका दीदियां (महिला स्वयं सहायता समूह) चलाती थीं, जिसके कारण इनके बंद होने से स्थानीय महिलाओं के रोजगार पर भी सीधा असर पड़ा है।
प्रशासनिक विफलता और नीतिगत खामियां
सरकार ने इन संयंत्रों को बंद करने के पीछे वित्तीय अनियमितताओं और पोषणहार की गुणवत्ता का हवाला दिया था और इस काम को आउटसोर्स करने का निर्णय लिया था।
हालांकि, इस फैसले के बाद से राज्य प्रशासन में गंभीर नीतिगत असमंजस की स्थिति बन गई है। ये फैक्ट्रियां मार्च से बंद हैं, लेकिन सरकार इसकी जगह कोई भी नई व्यवस्था अमल में नहीं ला पाई है। पोषणहार बनाने के लिए अभी तक नए टेंडर भी जारी नहीं किए गए हैं। इससे पूरी व्यवस्था अधर में लटकी हुई है।
बिना किसी मजबूत वैकल्पिक व्यवस्था के चालू फैक्ट्रियों को बंद करने के प्रशासनिक फैसले ने राज्य के सबसे संवेदनशील हिस्से (माताओं और बच्चों) को गंभीर संकट में डाल दिया है।
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