छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों को सुरक्षा और लाइसेंसिंग नियमों में कोई छूट नहीं, गर्मी से फसल बचाएगा धान का नया जीन, मप्र का प्राकृतिक खेती करने वालों के लिए नया एलान, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों का निजीकरण। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार भारत का परमाणु नियामक (AERB) छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMRs) के लिए सुरक्षा और लाइसेंसिंग नियमों में कोई विशेष छूट देने के पक्ष में नहीं है। सुरक्षा मानकों को बड़े रिएक्टरों की तरह ही कड़ा रखा जाएगा और निजी भागीदारी के लिए ‘शांति अधिनियम’ (SHANTI Act) के तहत नियमों को तैयार किया जा रहा है।
जापान के राष्ट्रीय कृषि और खाद्य अनुसंधान संगठन (नारो), अन्य जापानी शोध संस्थानों और अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई) के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक ऐसा जीन खोजा है जो धान के पौधे को गर्मी से बचाने में मदद कर सकता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि ईएमएफ3-1डी जीन धान का फूलना 1.5 घंटे पहले कर देता है, जिससे ताप तनाव से बचाव होता है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने तेलंगाना सरकार के फ्यूचर सिटी प्रोजेक्ट पर अंतरिम रोक लगाने की मांग खारिज कर दी है। हालांकि, पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर सुनवाई जारी रहेगी और परियोजना की वैधानिक जांच आगे भी की जाएगी।
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने ग्रीन हाइड्रोजन प्रमाणन पोर्टल लॉन्च किया, जिससे स्वच्छ हाइड्रोजन के उत्पादन और प्रमाणन की प्रक्रिया पारदर्शी होगी। उन्होंने राज्यों से राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को गति देने और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में निवेश बढ़ाने का आह्वान किया।
भोपाल के सरकारी अस्पतालों में कीमोथेरेपी की महत्वपूर्ण दवाओं का स्टॉक लगभग खत्म हो चुका है, जिससे प्रतिदिन 200 से अधिक मरीजों का इलाज प्रभावित हो रहा है। कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने के कारण इन दवाओं की कमी हुई है और निजी अस्पतालों में भी इनका बहुत सीमित स्टॉक बचा है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने घोषणा की है कि 25 गायों के साथ डेयरी शुरू करने वाली 40 लाख रुपये की परियोजना पर सरकार 10 लाख रुपये का अनुदान देगी। साथ ही, उन्होंने प्राकृतिक खेती करने वाले पशुपालकों को प्रतिमाह 1100 रुपये देने की बात भी कही है।
विस्तृत चर्चा
कम्युनिटी हेल्थ सेंटर्स का होगा निजीकरण
ग्रामीण इलाकों में सपेशलिस्ट डॉक्टर्स की कमी है यह हम सभी जानते हैं, क्योंकि ये पोस्ट्स खाली पड़ी हैं। कोई डॉक्टर ग्रामीण इलाकों में काम नहीं करना चाहता। इसी को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने रीवा, गुना और देवास ज़िलों में 18 कम्युनिटी हेल्थ सेंटर्स का मैनेजमेंट प्राइवेट ऑपरेटरों को सौंपने के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट को मंज़ूरी दी है। यह हाल के वर्षों में हेल्थकेयर सेक्टर में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत राज्य के सबसे अहम प्रयोगों में से एक है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने यह फ़ैसला सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में खाली पदों की समस्या को देखते हुए लिया है।
तो नए मॉडल के तहत, सरकार दवाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराती रहेगी, जबकि चुनी गई प्राइवेट संस्था, ट्रस्ट या संगठन स्पेशलिस्ट डॉक्टरों और अन्य हेल्थकेयर स्टाफ की भर्ती करने और रोज़मर्रा के कामकाज को संभालने के लिए ज़िम्मेदार होगा।
अभी यह पायलट प्रोजेक्ट 5 साल तक चलेगा इसके मॉनिटरिंग होगी और अच्छे आउटकम आए तो अन्य जिलों में भी इसे लागू किया जाएगा।
मध्य प्रदेश में डॉक्टरों की कमी
कैबिनेट के सामने पेश किए गए सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य के 327 रनिंग सीएचसी में स्पेशलिस्ट के लिए मंज़ूर 1,320 पदों में से सिर्फ़ 113 पद ही भरे हुए हैं।
इस संकट की वजह से मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों के बड़े हिस्से में सर्जन, फ़िज़िशियन, गायनेकोलॉजिस्ट और पीडियाट्रिशियन जैसी विशेषज्ञ सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं – जबकि नैशनल पब्लिक हेल्थ नॉर्मस के तहत सीएचसी से इन विशेषज्ञों की सेवाएं मिलने की उम्मीद की जाती है। पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुने गए 18 केंद्रों में से पांच में तो एक भी स्पेशलिस्ट नहीं है।
ग्रामीण भारत में कम्युनिटी हेल्थ सेंटर सेकेंडरी हेल्थकेयर की रीढ़ हैं। ये प्राइमरी हेल्थ सेंटर के लिए रेफरल सुविधा के तौर पर काम करते हैं और ऐसी आबादी को सेवाएं देते हैं, जिनकी पहुंच अक्सर प्राइवेट अस्पतालों तक नहीं होती। फिर भी, मध्य प्रदेश में बार-बार भर्ती अभियान चलाने, कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्तियां करने और आर्थिक प्रोत्साहन देने के बावजूद, दूर-दराज़ के ज़िलों में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को लाना मुश्किल साबित हुआ है।
2025-26 के सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य में स्पेशलिस्ट डॉक्टर के हर चार में से लगभग तीन पद खाली हैं। स्पेशलिस्ट के लिए मंज़ूर किए गए 5,443 पदों में से सिर्फ़ 1,495 पद भरे हुए हैं, जिससे 3,948 पद खाली हैं।
तो अब सरकार को लगता है कि वह पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप से शायद इस समस्या का हल निकाल लेगी। हालांकि यहां सवाल यही रहेगा कि जो भी प्राईवेट संस्था यह सुविधा देगी वह अपने आर्थिक हित कैसे पूरे करेगी?
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