आज के एपिसोड में बात करेंगे अंडमान की 16,000 कोरल कॉलोनियों पर मंडराते खतरे की, केरल में फैल रहे शिगेला बैक्टीरिया की, और उन बच्चों की जान लेने वाले दूषित कफ सिरप पर आए नए सरकारी नियम की। साथ ही जानेंगे खरीफ बुवाई के धीमे आँकड़े और मॉनसून की ताज़ा स्थिति।
आज की हेडलाईन्स
1. अंडमान में 16,000 कोरल कॉलोनियों को हटाने की तैयारी
ज़ूलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया जल्द ही अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पर्यावरण विभाग से 16,000 से ज़्यादा कोरल कॉलोनियों को ट्रांसलोकेट करने की मंज़ूरी माँगेगा। ये कॉलोनियाँ ग्रेट निकोबार ट्रांसशिपमेंट प्रोजेक्ट की वजह से प्रभावित होंगी। कोरल कॉलोनी समुद्र के अंदर जीवों की एक जटिल और आपस में जुड़ी हुई व्यवस्था होती है — एक बार तोड़ने के बाद इन्हें जीवित रखना लगभग नामुमकिन होता है। फिर भी, प्रोजेक्ट की पर्यावरण मंज़ूरी के लिए यह ट्रांसलोकेशन एक ज़रूरी शर्त है।
2. केरल में शिगेला बैक्टीरिया का प्रकोप, पाँच की मौत
केरल में शिगेला बैक्टीरियल इन्फेक्शन तेज़ी से फैल रहा है। राज्य में अब तक 146 कन्फर्म मामले सामने आए हैं, जिनमें से 70 मामले सिर्फ इसी महीने के पहले दो हफ्तों में दर्ज हुए। इस साल अब तक पाँच लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें से चार मौतें इसी महीने हुईं। कोझिकोड में 74 और वायनाड में 16 मामले दर्ज हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, पानी की खराब गुणवत्ता इस बीमारी के फैलने की मुख्य वजह है।
3. मानसिक बीमारी से आत्महत्याएँ — चौंकाने वाले आँकड़े
‘स्टेट ऑफ़ इंडियाज़ एनवायरनमेंट 2026’ रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में भारत में बीमारी से जुड़ी कुल 30,617 आत्महत्याएँ हुईं। इनमें से 14,305 यानी करीब 47 प्रतिशत मौतें मानसिक बीमारी के कारण हुईं — यानी हर दूसरी आत्महत्या के पीछे मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ा कारण रहा।
4. खरीफ बुवाई धीमी, मॉनसून की चिंता बरकरार
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, इस साल खरीफ की बुवाई धीमी शुरुआत के साथ हुई है। 5 जून 2026 तक किसानों ने 72.5 लाख हेक्टेयर में बुवाई की है, जो पिछले साल की तुलना में करीब 2 लाख हेक्टेयर कम है। अल-नीनो की स्थिति के चलते दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की प्रगति को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं, जो खरीफ फसलों के लिए बेहद अहम होता है।
5. मध्य प्रदेश में मॉनसून दस्तक देने को तैयार
मध्य प्रदेश में अगले 72 घंटों में मॉनसून आने की उम्मीद है, जिससे तापमान में राहत मिलेगी। वहीं दिल्ली-NCR में आज शाम धूल भरी आँधी, तेज़ हवाएँ और हल्की बारिश की संभावना के चलते येलो अलर्ट जारी किया गया है।
कफ सिरप को लेकर नया नियम क्या है?
चंद्रप्रताप तिवारी, संवाददाता ग्राउंड रिपोर्ट

सरकार ने ड्रग्स रूल्स की अनुसूची K में बदलाव करते हुए “कफ सिरप” को उस सूची से हटा दिया है जिसके तहत छोटे गाँवों की सामान्य दुकानों को कुछ छूट मिली हुई थी। पहले भी अधिकतर कफ सिरप के लिए डॉक्टर की पर्ची ज़रूरी होती थी, लेकिन अनुसूची K में एक प्रावधान था जिसके तहत एक हज़ार से कम आबादी वाले गाँवों में सामान्य दुकानें भी कुछ शर्तों के साथ ये सिरप बेच सकती थीं। अब यह छूट पूरी तरह खत्म हो गई है। अब केवल लाइसेंस प्राप्त मेडिकल स्टोर या फार्मेसी ही कफ सिरप बेच सकेंगे।
यह फैसला उन दर्दनाक घटनाओं के बाद आया है जिनमें दूषित कफ सिरप पीने से बच्चों की जान गई। पिछले साल नवंबर में Drugs Technical Advisory Board — DTAB की एक अहम बैठक हुई थी, और यह बैठक मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले में 22 से अधिक बच्चों की मौत के बाद बुलाई गई थी। इन मौतों का संबंध कथित रूप से “कोल्ड्रिफ” कफ सिरप के सेवन से जोड़ा गया था। हमने इसे ग्राउंड ज़ीरो से कवर भी किया था।
विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या तब पैदा होती है जब सिरप बनाने में इस्तेमाल होने वाले कुछ रसायन — खासकर डाइएथिलीन ग्लाइकोल और एथिलीन ग्लाइकोल — दूषित हो जाते हैं। यह मिलावट तब होती है जब कच्चे माल की ठीक से जाँच नहीं होती या सप्लाई चेन में गुणवत्ता की निगरानी कमज़ोर रहती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ और उद्योग प्रतिनिधि लंबे समय से सख्त जाँच और बेहतर निगरानी की माँग करते आए हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि हर खाँसी के लिए कफ सिरप ज़रूरी नहीं होती। अलग-अलग तरह की खाँसी का इलाज अलग होता है और कई मामलों में खाँसी खुद-ब-खुद ठीक हो जाती है। लोग अक्सर बिना किसी सलाह के सिरप लेना शुरू कर देते हैं — यह आदत खतरनाक हो सकती है। डॉक्टर यही सलाह देते हैं कि भरोसेमंद ब्रांड की दवाएँ खरीदें और ज़रूरत पड़ने पर हमेशा डॉक्टर से राय लें।
यह कदम सही दिशा में है — लेकिन काफी नहीं। मैं अभी मध्य प्रदेश के रीवा ज़िले में हूँ और यहाँ ज़मीनी हकीकत बहुत अलग है। यहाँ न सिर्फ बिना पर्ची के दवाएँ मिल जाती हैं, बल्कि प्रतिबंधित दवाएँ भी खुलेआम उपलब्ध हैं। एक बड़ी आबादी इन्हें नशे के तौर पर इस्तेमाल करती है। यह सब इशारा करता है कि देश में दवाओं के निर्माण से लेकर वितरण तक — पूरी व्यवस्था में बहुत सख्ती की ज़रूरत है। सिर्फ कागज़ पर नियम बदलने से काम नहीं चलेगा।
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