पर्यावरण आज | यमुना बेसिन के छह राज्यों में सालों से अटकी किशाऊ बांध परियोजना पर सहमति बनी। बिहार, यूपी, उत्तराखंड और राजस्थान में भारी बारिश और बाढ़ से लाखों लोग प्रभावित, कई जगह लैंडस्लाइड और नुकसान। महाराष्ट्र में वैज्ञानिकों ने नई बिना पैर वाली उभयचर प्रजाति खोजी। दिल्ली हाई कोर्ट में समलैंगिक जोड़े की याचिका का केंद्र सरकार ने समर्थन किया। आज की चर्चा में समझेंगे कि क्या अल नीनो की वजह से पहाड़ों में इस वर्ष कम बर्फबारी होगी।
आज की प्रमुख हेडलाईन्स
किशाऊ जल विवाद सुलझा
मंगलवार को लंबे समय से अटकी किशाऊ मल्टीपर्पस प्रोजेक्ट को लेकर यमुना बेसिन के छह राज्यों के बीच का मतभेद सुलझ गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे “ऐतिहासिक” बताया और कहा कि यह 10वां जल विवाद है जो उनकी सरकार ने सुलझाया है।
यमुना बेसिन पर प्रस्तावित 422 मेगावॉट की यह बांध परियोजना हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान — इन छह राज्यों के बीच मतभेद के चलते पिछले आठ साल से ज़्यादा समय से रुकी हुई थी। इस समझौते के बाद परियोजना के जल्द शुरू होने का अनुमान है।
बिहार में बाढ़
बिहार के 15 जिलों की 575 पंचायतों में करीब 50 लाख आबादी अभी भी बाढ़ के पानी से घिरी हुई है। कटिहार में सरकारी स्कूल और कोचिंग सेंटर बाढ़ के पानी में डूब गए हैं, और बच्चे नाव में बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं। प्रदेश के 26 जिलों में बारिश का यलो अलर्ट है और आकाशीय बिजली गिरने की चेतावनी भी जारी की गई है।
यूपी में बारिश से नदियां उफनी
यूपी में बारिश से नदियां उफान पर हैं। 26 जिलों में बाढ़ के हालात हैं और करीब 4 लाख आबादी प्रभावित है। वहीं, लखीमपुर में शारदा नदी का कटान तेज होने से 24 घंटे में 7 मकान नदी में समा गए हैं।
पिथौरागढ़ में लैंडस्लाईड
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में आदि कैलाश मार्ग पर दोबाट में लैंडस्लाइड से सड़क फिर बंद हो गई। रुद्रप्रयाग में केदारनाथ पैदल मार्ग पर चीरबासा के पास सुरक्षा के मद्देनज़र यात्रियों को हेलमेट पहनाकर भेजा जा रहा है। चार दिन पहले हुए लैंडस्लाइड में कई घोड़े-खच्चर मारे गए थे, और अब रास्ते में पड़े शवों से बदबू और सांस लेने में परेशानी की शिकायतें सामने आ रही हैं।
उधर राजस्थान के 26 जिलों में 17 सितंबर तक बारिश का यलो अलर्ट है। मंगलवार को अजमेर, पाली समेत कुछ अन्य जिलों में हल्की से मध्यम बारिश हुई। वहीं, मध्य प्रदेश के पश्चिमी हिस्सों में 17 से 19 सितंबर तक और पूर्वी हिस्सों में 18 से 21 सितंबर तक बारिश हो सकती है।
नये एंफीबियन की खोज
वैज्ञानिकों ने महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट में एक नए बिना पैर वाले उभयचर ‘गेजेनियोफिस चंदगाडी’ की खोज की है।
यह प्रजाति ‘सीसिलियन’ है, जो बिना पैर वाले उभयचरों का एक ऐसा समूह है जो ज़्यादातर समय ज़मीन के नीचे बिताते हैं और अक्सर इन्हें केंचुआ समझ लिया जाता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज खेती और रिहायशी इलाकों में छिपी जैव-विविधता को उजागर करती है, और उत्तरी पश्चिमी घाट में और अधिक सर्वेक्षण करने की ज़रूरत को भी दिखाती है।
समलैंगिकों के स्वास्थ्य संबंधी अधिकार पर याचिका
दिल्ली हाई कोर्ट में एक समलैंगिक जोड़े की याचिका का समर्थन करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने कहा है कि समलैंगिक संबंधों में रहने वाले लोगों को अपने पार्टनर के लिए मेडिकल फ़ैसले लेने के मौजूदा कानूनी अधिकार से बाहर नहीं रखा जा सकता।
जुलाई 2025 में एक समलैंगिक जोड़े ने यह याचिका दायर की थी, जिनकी शादी दिसंबर 2023 में न्यूज़ीलैंड में हुई थी। याचिका में कहा गया है कि “ऐसा कोई ढांचा नहीं है जो नॉन-हेट्रोसेक्शुअल कपल्स को मेडिकल इलाज या इमरजेंसी के दौरान अपने पार्टनर के मेडिकल प्रतिनिधि के तौर पर काम करने का अधिकार देता हो या उसे मान्यता देता हो।”
आज की चर्चा
अल नीनो प्रभावित कर सकता है पहाड़ों में बर्फबारी
भारत में मॉनसून में औसत से कम वर्षा हुई है और दुनियाभर में चरम मौसमी घटनाएँ दर्ज हो रही हैं। अनुमान है कि इसका असर पहाड़ों में होने वाली बर्फबारी पर भी देखने को मिल सकता है।
वाहिद भट, ग्राउंड रिपोर्ट

कश्मीर में सर्दियां आने में अभी थोड़ा वक्त बाकी है, लेकिन इस बार बर्फबारी को लेकर अभी से सवाल उठने लगे हैं। मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, दुनियाभर के मौसमी संकेत इशारा कर रहे हैं कि इस साल कश्मीर में सर्दी सामान्य से कुछ गर्म और हल्की रह सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सर्दी या बर्फबारी होगी ही नहीं।
श्रीनगर मौसम विभाग के निदेशक डॉ. मुख्तार अहमद के मुताबिक, ला नीना समेत दुनियाभर के मौसमी असर को देखते हुए इस साल कश्मीर की सर्दी थोड़ी गर्म रह सकती है। हालांकि उन्होंने साफ कहा कि सर्दी ज़रूर आएगी, बस बर्फबारी कितनी होगी — यह ज़्यादातर पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) पर निर्भर करेगा।
कश्मीर की सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ की बहुत अहम भूमिका होती है। ये मौसम प्रणालियां भूमध्यसागर और आसपास के इलाकों से दक्षिण एशिया की ओर आती हैं और कश्मीर के ऊंचाई वाले इलाकों में बारिश और बर्फबारी लाती हैं।
डॉ. अहमद के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में कश्मीर में बर्फबारी काफी कम रही है, और इस साल भी कुछ ऐसा ही हो सकता है। पर उन्होंने यह भी कहा कि बर्फबारी कश्मीर की सर्दियों का एक ज़रूरी हिस्सा है।
वहीं, स्वतंत्र मौसम विश्लेषक फैज़ान आरिफ का कहना है कि कश्मीर की सर्दी को सीधे एल नीनो या ला नीना से जोड़ने में सावधानी बरतनी चाहिए। उनके मुताबिक, पुराने आंकड़ों में एल नीनो और ला नीना का कश्मीर की सर्दी से कोई पक्का और लगातार संबंध नहीं दिखता, जिससे भरोसे से अनुमान लगाया जा सके।
फैज़ान आरिफ बताते हैं कि कुछ एल नीनो वाली सर्दियों में सामान्य से ज़्यादा बारिश हुई, तो कुछ में सामान्य से कम या बराबर। ला नीना और सामान्य सालों में भी मौसम अलग-अलग तरह का रहा।
इसकी वजह यह है कि जम्मू-कश्मीर का मौसम बहुत जटिल है। एल नीनो-ला नीना के अलावा पोलर वोर्टेक्स, साइबेरियन हाई, नॉर्थ अटलांटिक ऑसिलेशन और इंडियन ओशन डाइपोल जैसे कई बड़े मौसमी असर भी यहां के मौसम को प्रभावित करते हैं। इसलिए सिर्फ एक मौसमी घटना के आधार पर यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि इस साल कश्मीर में सर्दी और बर्फबारी कैसी रहेगी।
फिलहाल इतना तय है कि इस साल कश्मीर में सर्दी ज़रूर आएगी। बड़े मौसमी संकेत हल्की और गर्म सर्दी की ओर इशारा कर रहे हैं, लेकिन असल बर्फबारी कितनी होगी — यह पश्चिमी विक्षोभ की गतिविधि पर काफी हद तक निर्भर करेगा।
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