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खनन मंजूरी में ढील से पर्यावरणीय जोखिम बढ़ने की आशंका

यह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के डेली मॉर्निंग पॉडकास्ट का एपिसोड-108 है। मंगलवार, 06 जनवरी को देश भर की पर्यावरणीय ख़बरों के साथ पॉडकास्ट में जानिए खनन के नए नियमों को लेकर उपजी चिंताएं और बीते साल हुई मौसमी परिवर्तनों के बारे में।


मुख्य सुर्खियां

2025 भारत के लिए अब तक का आठवां सबसे गर्म साल रहा। औसत तापमान सामान्य से करीब 0.3 डिग्री ज्यादा रहा। खास बात ये है कि रातें ज्यादा गर्म रहीं, जिससे शरीर को राहत ही नहीं मिली और साल भर गर्मी का असर बना रहा।

सर्दी का मौसम भी 124 साल में सबसे ज्यादा गर्म रहा। फरवरी में पहली बार हीटवेव देखी गई। गर्मी के महीनों में मई में रिकॉर्ड बारिश हुई, लेकिन मानसून असमान रहा और उत्तर-पश्चिम भारत में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। बारिश से जुड़ी आपदाओं में 1,372 लोगों की मौत हुई। यह कुल जलवायु मौतों का लगभग आधा है। इस बार आकाशीय बिजली से भी ज्यादा जानें बारिश और बाढ़ ने लीं।


केंद्र सरकार ने सलाल बांध से गाद निकालने का काम तेज करने को कहा है। चूंकि सिंधु जल संधि फिलहाल लागू नहीं है, इसलिए अब पहले जैसी पाबंदियां नहीं हैं। इससे बांध की पानी रोकने की क्षमता बढ़ेगी और बिजली उत्पादन बेहतर होगा। सरकार इसी तरह रैटल और दुलहस्ती परियोजनाओं पर भी तेजी से काम कर रही है।


भोपाल में इंदौर जैसी पानी की बीमारी फैलने का खतरा बताया जा रहा है। शहर के ओवरहेड टैंक महीनों से साफ नहीं हुए हैं, पाइपलाइनों में सीवर मिल रहा है और कई बोरवेल बिना जांच के पानी सप्लाई कर रहे हैं। सरकार कहती है कि बड़े तालाब, नर्मदा और केरवा का पानी सुरक्षित है, लेकिन 80% टैंक लंबे समय से गंदे हैं। अगर समय रहते सफाई नहीं हुई तो फीकल कोलीफॉर्म जैसी बीमारी फैल सकती है, जैसी इंदौर में जानें ले चुकी है।


दिल्ली के शाहीन बाग, सरीता विहार जैसे इलाकों में कचरा लंबे समय से नहीं उठ रहा। लोगों का कहना है कि बदबू घरों में घुस रही है और बीमारी फैलने का डर है। कचरा उठाने वाली कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो चुका है और नया फैसला अटका है। इस पर NGT ने खुद मामला उठाया और प्रदूषण बोर्ड व MCD से जवाब मांगा है।


2025-26 के पहले 9 महीनों में भारत में 26.6 लाख करोड़ रुपये का निवेश आया। मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी इसमें सिर्फ 3.2% रही। सेवा क्षेत्र में सबसे ज्यादा निवेश आया, जिसमें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात आगे रहे। भास्कर के विश्लेषण के मुताबिक, MP के पास संसाधन होने के बावजूद निवेश नहीं खींच पा रहा।


केंद्र सरकार ने नए नियम बनाए हैं, जिनसे कोयला और खनन कंपनियों को मंजूरी जल्दी मिलेगी। अब जंगल की जमीन के लिए पहले से जमीन अधिग्रहण के पूरे कागज़ देना जरूरी नहीं होगा। आलोचकों का कहना है कि इससे संवेदनशील इलाकों में पारदर्शिता कम होगी और पर्यावरण पर खतरा बढ़ेगा।


इंदौर में लिए गए 69 पानी के सैंपल में से 35 में E.coli बैक्टीरिया मिला है। ये सैंपल ज़्यादातर मल्टी-स्टोरी इमारतों के बोरवेल से लिए गए थे। जिला प्रशासन मान रहा है कि सीवर मिला पानी इसकी वजह है। कई इलाकों में आधे से ज्यादा सैंपल रोज़ाना फेल हो रहे हैं।


विस्तृत चर्चा

खनन परियोजनाओं को ग्रीन क्लीयरेंस में ढील

पर्यावरण मंत्रालय ने हाल ही में एक अहम नीति बदलाव किया है, जिसके तहत अब कोयले को छोड़कर किसी भी अन्य खनिज के खनन के लिए डेवलपर्स को पर्यावरणीय मंजूरी पाने से पहले ज़मीन अधिग्रहण का पुख्ता सबूत देना जरूरी नहीं होगा। पहले ग्रीन क्लीयरेंस के लिए यह एक अनिवार्य शर्त थी। मंत्रालय का कहना है कि इस बदलाव का मकसद ऑफशोर और ऑनशोर ऑयल एक्सप्लोरेशन, तेल और गैस उत्पादन, गैस ट्रांसपोर्टेशन, इको-सेंसिटिव ज़ोन से गुजरने वाली पाइपलाइनों, हाईवे प्रोजेक्ट्स और मिनरल माइनिंग जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी प्रोजेक्ट्स की मंजूरी की प्रक्रिया को तेज़ करना है।

अब तक, खासकर निजी डेवलपर्स के मामलों में, पर्यावरण मंत्रालय ज़मीन अधिग्रहण से जुड़े ठोस दस्तावेज़ मांगता था। इसके लिए 2014 में जारी एक ऑफिस मेमोरेंडम में साफ़ तौर पर बताया गया था कि कौन-कौन से दस्तावेज़ मान्य होंगे। इनमें भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम 2013 के तहत राज्य सरकार की शुरुआती अधिसूचना या निजी मामलों में ज़मीन मालिकों के साथ किया गया ऐसा विश्वसनीय समझौता शामिल था, जिससे यह साबित हो कि ज़मीन मालिक अपनी ज़मीन बेचने को तैयार हैं।

फरवरी 2024 में मंत्रालय ने इस व्यवस्था में एक और ढील दी थी, जिसमें कहा गया कि अगर राज्य सरकार या उसकी अधिकृत एजेंसी यह पुष्टि कर दे कि पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट में बताए गए प्रोजेक्ट के लिए ज़मीन अधिग्रहण का इरादा है, तो उसे भी पर्याप्त माना जाएगा। अब नए बदलाव के बाद स्थिति यह हो गई है कि केवल राज्य सरकार या उसकी एजेंसी की एक कंफर्मेशन से ही ग्रीन क्लीयरेंस की प्रक्रिया शुरू हो सकती है, भले ही ज़मीन अधिग्रहण से जुड़ा कोई ठोस और भरोसेमंद दस्तावेज़ मौजूद न हो।

इस बदलाव को लेकर चिंता यह जताई जा रही है कि ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया अब पर्यावरणीय मंजूरी के बाद शुरू होगी, जिससे इसमें देरी हो सकती है। पहले डेवलपर्स पर दबाव होता था कि वे ग्रीन क्लीयरेंस से पहले ज़मीन अधिग्रहण और मुआवज़े की शर्तें काफी हद तक तय कर लें। अब आशंका है कि प्रोजेक्ट्स तो तेज़ी से आगे बढ़ जाएंगे, लेकिन ज़मीन अधिग्रहण, मुआवज़ा और पुनर्वास के मामले लंबे समय तक लटके रह सकते हैं। इसका सीधा नुकसान उन लोगों को हो सकता है जिनकी ज़मीन ली जानी है, क्योंकि पहले भी ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जहां प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद भी मुआवज़े और पुनर्वास के सवाल सालों तक अनसुलझे रहे हैं। सरकार के लिए यह बदलाव भले ही प्रोजेक्ट्स को फास्ट ट्रैक करने का ज़रिया हो, लेकिन ज़मीन मालिकों के अधिकारों को लेकर यह नई चिंताएं पैदा करता है।

आईएमडी रिपोर्ट: 2025 भारत के सबसे गर्म वर्षों में

वहीं भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की 2025 की वार्षिक जलवायु रिपोर्ट ने देश की जलवायु स्थिति को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। आईएमडी के मुताबिक 2025 भारत के इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में से एक रहा। राष्ट्रीय औसत तापमान सामान्य से 0.28 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। यह आंकड़ा सुनने में भले छोटा लगे, लेकिन इसके असर पूरे साल देश भर में देखने को मिले—तूफानों, बाढ़, भूस्खलन और हीट स्ट्रेस की घटनाओं के रूप में।

रिपोर्ट के अनुसार फरवरी 2025 असामान्य रूप से गर्म रहा और पहली बार सर्दियों के मौसम में हीट वेव दर्ज की गई। 25 फरवरी को गोवा और महाराष्ट्र में हीट वेव देखी गई, जो पिछले 125 वर्षों में एक दुर्लभ घटना मानी जा रही है। यह इस बात का संकेत है कि मौसम के पैटर्न कितनी तेजी से बदल रहे हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि असली खतरा सिर्फ दिन के तापमान से नहीं, बल्कि रात के बढ़ते तापमान से है। दिन के अधिकतम तापमान में जहां लगभग 0.89 डिग्री प्रति सदी की दर से बढ़ोतरी हो रही है, वहीं रात का न्यूनतम तापमान भी करीब 0.47 डिग्री प्रति सदी की रफ्तार से बढ़ रहा है। जब रात में ठंडक नहीं मिलती, तो शरीर को हीट स्ट्रेस से उबरने का मौका नहीं मिलता, जिससे अचानक मौत और हार्ट अटैक जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ जाता है।

बारिश के आंकड़े भी उतने ही चिंताजनक हैं। मई 2025 में देश में 1901 के बाद सबसे ज्यादा बारिश दर्ज की गई, लेकिन यह बारिश अचानक और बेहद तीव्र थी, जिसने कई इलाकों में भारी तबाही मचाई। हिमाचल प्रदेश में मानसून के 122 दिनों में से लगभग आधे दिन भारी या बेहद भारी बारिश वाले रहे। पंजाब को 1988 के बाद सबसे खराब बाढ़ का सामना करना पड़ा, जबकि जम्मू-कश्मीर और अन्य उत्तर भारतीय इलाकों में अचानक आई बाढ़ ने हजारों लोगों की ज़िंदगी प्रभावित की।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2025 में कुल 2,760 लोगों की मौत मानसून से जुड़ी घटनाओं में हुई, जिनमें से करीब 1,372 लोग बाढ़ और भूस्खलन की वजह से मारे गए। बिजली गिरने से 1,317 लोगों की जान गई, जो यह दिखाता है कि जलवायु से जुड़ी आपदाओं का स्वरूप किस तरह बदल रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर बारिश का वितरण भी असमान रहा। उत्तर-पश्चिम भारत में सामान्य से 27 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई, मध्य और दक्षिण भारत में भी अधिक वर्षा दर्ज की गई, जबकि पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत में कमी रही। यह साफ़ संकेत है कि सिर्फ कुल बारिश के आंकड़े नहीं, बल्कि उसका असमान वितरण भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है।

आईएमडी का कहना है कि हीट वेव, कोल्ड वेव और अत्यधिक बारिश जैसी घटनाएं अब ज़्यादा बार और ज़्यादा तीव्रता के साथ सामने आ रही हैं। यह रिपोर्ट साफ़ तौर पर बताती है कि देश एक गहरे जलवायु संकट की ओर बढ़ रहा है, जिसके असर अब रोज़मर्रा की ज़िंदगी, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर साफ़ दिखाई देने लगे हैं।

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