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नेपाल की बाढ़ के बाद भारत में हाइड्रो प्रोजेक्ट्स की निगरानी बढ़ाने की मांग

नेपाल की बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में तेज़ी से बढ़ते हाइड्रोपावर नेटवर्क को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। विशेषज्ञ बेहतर निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम की ज़रूरत पर जोर देते हैं।
Salal Dam J&K
चेनाब नदी पर स्थित सलाल बांध

पिछले हफ्ते हिमालय की ऊंचाई पर हुए एक ग्लेशियर हादसे ने नेपाल में भयंकर बाढ़ ला दी। इससे कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को नुकसान पहुंचा और सुरंगों के अंदर सैकड़ों मज़दूर फंस गए। माना जा रहा है कि नेपाल के 12 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के 900 से ज़्यादा मज़दूर उस वक़्त फंस गए जब बाढ़ का पानी और मलबा घाटियों में बहने लगा।

भारत की नेशनल डिज़ास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) से जुड़े और पूर्व आईपीएस अधिकारी सफी अहसन रिज़वी ने ग्राउंड रिपोर्ट को बताया कि नेपाल की यह आपदा एक ऐसी कमी को उजागर करती है जिसे भारत ने अब तक पूरी तरह से दूर नहीं किया।

भारत पहले से ही अपने नेशनल ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOF) रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम के तहत 195 ऐसी झीलों पर नज़र रखता है जिन्हें ज़्यादा खतरे वाली माना गया है। रिज़वी ने कहा कि किसी खतरनाक झील की पहचान करना ज़रूरी तो है, लेकिन सिर्फ एक लिस्ट से यह पता नहीं चलता कि अचानक टूटने की स्थिति में कोई झील या पहाड़ी ढलान कैसा बर्ताव करेगी।

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भारत के पास फ़िलहाल 98 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की योजना है, जिनकी कुल क्षमता 58,196 मेगावाट है। इनमें से 36 प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है, जिनकी कुल क्षमता 12,663 मेगावाट है। ज़्यादातर परियोजनाएं अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और जम्मू-कश्मीर में स्थित हैं।

भारत जिस तरह हिमालय में अपना हाइड्रोपावर नेटवर्क बढ़ा रहा है, सवाल यह है कि क्या वह पहाड़ों की ऊंचाई पर अचानक आने वाले खतरों का पता लगा सकता है और बाढ़ पहुंचने से पहले डैम, मज़दूरों और स्थानीय लोगों को आगाह कर सकता है?

Gangabal Lake sits beneath Mount Harmukh in Ganderbal district. Scientists warn the lake is expanding as glaciers melt, increasing flood risk for villages downstream.
गंगाबल झील गंदेरबल जिले में हरमुख पर्वत के नीचे है | फोटो: वाहिद भट

बढ़ता हाइड्रोपावर नेटवर्क

नेशनल हाइड्रो पॉवर कॉर्पोरेशन अपनी हाइड्रोपावर क्षमता 8.2 गीगावाट से बढ़ाकर 2027 तक लगभग 13 गीगावाट तक ले जाने की योजना बना रही है। यह करीब 59% की बढ़ोतरी है। इसमें अरुणाचल प्रदेश में 2,000 मेगावाट का सुबनसिरी लोअर प्रोजेक्ट और जम्मू-कश्मीर की चिनाब घाटी में पाकल दुल और किरु जैसे प्रोजेक्ट्स शामिल हैं।

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पूरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र की बात करें तो चीन, भारत, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान में 550 से ज़्यादा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स या तो चल रहे हैं, योजना में हैं, या निर्माणाधीन हैं।

भारत हाइड्रोपावर पर इसलिए ज़ोर दे रहा है क्योंकि उसे ज़्यादा बिजली चाहिए। साथ ही ऐसा ऊर्जा स्रोत भी चाहिए जो सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन कम होने पर ग्रिड को संभाल सके। हिमालय और पूर्वोत्तर भारत में देश की बची हुई ज़्यादातर हाइड्रोपावर क्षमता मौजूद है, इसलिए स्वच्छ ऊर्जा बढ़ाने की योजनाओं में यह पहाड़ी क्षेत्र केंद्र में है।

3 सितंबर को जम्मू के युवा और पर्यावरण संगठनों के एक गठबंधन ने, जिसमें क्लाइमेट फ्रंट जम्मू, यूथ फॉर हिमालया और गुज्जर बकरवाल स्टूडेंट अलायंस शामिल हैं, हिमालय भर में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को लेकर बढ़ते दबाव पर चिंता जताई।

एक प्रेस विज्ञप्ति में इन संगठनों ने हिमालय में मेगा-प्रोजेक्ट्स को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा पर सवाल उठाए।

उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी हिस्से में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन के प्रस्तावित मेगा-डैम की आलोचना करते हुए कहा कि हिमालय को “प्रतिस्पर्धी मेगा-प्रोजेक्ट्स के अखाड़े” में नहीं बदलना चाहिए। उनका कहना था कि हिमालयी नदियां साझा करने वाले देशों के बीच ग्लेशियर और नदी से जुड़े आंकड़ों पर ज़्यादा सहयोग होना चाहिए।

इन संगठनों ने यह सवाल भी उठाया कि क्या चिनाब घाटी के एक ही हिस्से में स्थित कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स जैसे पाकल दुल, किरु, क्वार और डंगडूरू, के मिले-जुले खतरे का आकलन प्रशासन ने किया है या नहीं।

उन्होंने स्वतंत्र जोखिम आकलन, ग्लेशियर झीलों की रियल-टाइम निगरानी और ऐसे चेतावनी सिस्टम की मांग की जिसमें गुज्जर-बकरवाल जैसे स्थानीय चरवाहा समुदायों को भी शामिल किया जाए।

Dulhasti Hydroelectric Power Station on the Chenab River in Jammu and Kashmir.
जम्मू और कश्मीर में चिनाब नदी पर बना दुलहस्ती हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर स्टेशन | फोटो: NHPC INDIA

तेज़ी से गर्म होता हिमालय

काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) में वरिष्ठ क्रायोस्फीयर विशेषज्ञ मोहम्मद फारूक आज़म ने बताया कि हिमालय पर्वत श्रृंखला बाकी जगहों के मुकाबले तेज़ी से गर्म हो रही है।

उन्होंने कहा कि इससे बर्फ का दायरा घट रहा है, ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं, और “ज़्यादा पथरीले या बंजर इलाके सामने आ रहे हैं। ये ज़्यादा गर्मी सोखते हैं, जिससे ढलानें और कमज़ोर हो जाती हैं।”

“…ग्लेशियर टूटने, लैंडस्लाइड और बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है।” “ये बढ़ते खतरे नीचे की तरफ बने हाइड्रोपावर डैम, टनल और पावर स्टेशन के लिए सीधा खतरा बन सकते हैं।” उन्होंने अपनी बात में जोड़ते हुए कहा।

आज़म के अनुसार, पहली बाढ़ के बाद भी इंफ्रास्ट्रक्चर पर खतरा बना रह सकता है, क्योंकि आस-पास का इलाका “आगे भूस्खलन की चपेट में आने लायक” हो जाता है।

जर्नल ऑफ ग्लेशियोलॉजी में जनवरी 2026 में छपे एक अध्ययन में कश्मीर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 1992 से 2024 तक के सैटेलाइट चित्रों की मदद से कश्मीर हिमालय की 155 ग्लेशियर झीलों की मैपिंग की। इसमें पाया गया कि इस दौरान बर्फ से बनी झीलों का आकार 26% बढ़ गया।

पांच झीलें- ब्रम्हसर, नुंदकोल, भागसर, चिरसर और गंगाबल- ग्लेशियर झील फटने (GLOF) के सबसे ज़्यादा खतरे में पाई गईं। इन झीलों के संभावित बाढ़-प्रभाव क्षेत्र में करीब 2,700 इमारतें, 15 पुल और एक हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट आते हैं।

Glaciers cling to the peaks above Kashmir's alpine meadows. Researchers say warming temperatures are causing rapid glacier retreat across the region.
कश्मीर के अल्पाइन घास के मैदानों के ऊपर चोटियों में स्थित ग्लेशियर | फोटो: वाहिद भट

सेंट्रल वॉटर कमीशन के GLOF से जुड़े दिशा-निर्देशों में छह हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 100 से ज़्यादा डैमों को ऐसी बाढ़ के लिहाज़ से असुरक्षित बताया गया है।

इन दिशा-निर्देशों में चेतावनी दी गई है कि झील का अचानक टूटना बड़ी मात्रा में पानी, मलबा और गाद छोड़ सकता है, जिससे नीचे मौजूद डैम और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर को खतरा हो सकता है।

हमने पहले भी एक रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह भारत की हिमालयी झीलों पर जांच बढ़ रही है, क्योंकि इन्हें भी कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में खतरा है।

समग्र निगरानी की ज़रूरत

रिज़वी ने कहा कि किसी खतरे की पहचान करना और उसकी रियल-टाइम निगरानी करना, ये दो अलग-अलग बातें हैं। उनके मुताबिक हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के लिए निगरानी में ऊपर मौजूद ग्लेशियर और अस्थिर ढलानों से लेकर नीचे प्रोजेक्ट और आबादी तक, पूरे रास्ते को कवर करना ज़रूरी है।

रिज़वी ने कहा, “हिमालय के जलग्रहण क्षेत्रों में हाइड्रोपावर क्लीयरेंस के लिए एक सर्टिफाइड अपस्ट्रीम-प्रोजेक्ट-डाउनस्ट्रीम सेंसर, अलार्म और इवैक्युएशन नेटवर्क की ज़रूरत होनी चाहिए, जो डैम सेफ्टी एक्ट के हिसाब से हो और मानसून से पहले हर साल टेस्ट किया जाए।”

उन्होंने डैम सेफ्टी एक्ट, 2021 की धारा 37 का हवाला दिया, जिसके तहत तय किए गए डैम मालिकों को हाइड्रो-मौसम विज्ञान नेटवर्क बनाना, इनफ्लो का अनुमान लगाना और नीचे के इलाकों के लिए इमरजेंसी बाढ़ चेतावनी सिस्टम स्थापित करना ज़रूरी है।

यह क़ानून यह भी कहता है कि इन सिस्टम की नियमित जांच हो और संभावित इनफ्लो, आउटफ्लो और उनके असर की जानकारी प्रशासन और आम जनता के साथ साझा की जाए।

सैटेलाइट इमेज में नेपाल-चीन सीमा के पास भूस्खलन और बाढ़ का रास्ता दिखाया गया है जिससे ल्हेन्डे नदी में आपदा आई | फोटो: @NDRRMA_Nepal

रिज़वी ने यह भी कहा कि नेपाल की आपदा ने सीमा पार चेतावनी सिस्टम में मौजूद कमी को भी उजागर किया है।

उन्होंने कहा, “नेपाल आपदा ने इस इलाके में एक बड़ी कमी को दिखाया है— अचानक आने वाली बाढ़ के लिए बॉर्डर पार पहले से चेतावनी देने के सही तरीके से डेवलप्ड सिस्टम की कमी।” “जब नदियां और खतरे खुद उन्हें पार करते हैं, तो राजनीतिक सीमाएं आपदा की तैयारी में रुकावट नहीं बननी चाहिए।”

आज़म ने बताया कि पहाड़ों में कुछ हादसे धीरे-धीरे बनते हैं, जिससे वैज्ञानिकों को चेतावनी के संकेत पकड़ने का समय मिल जाता है। जबकि कुछ हादसे मिनटों में हो जाते हैं। उनके मुताबिक चाहे जो भी हो, भारत सिर्फ जानी-पहचानी झीलों पर नज़र रखकर नहीं रुक सकता। उसे यह समझना होगा कि कौन-सी ढलानें अस्थिर हैं, बाढ़ का पानी कहां जाएगा इसकी मैपिंग करनी होगी, और यह भी ठीक-ठीक जानना होगा कि उस रास्ते में कौन लोग रहते हैं।


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  • Wahid Bhat is an environmental journalist with a focus on extreme weather events and lightning. He reports on severe weather incidents such as floods, heatwaves, cloudbursts, and lightning strikes, highlighting their growing frequency and impact on communities.

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