केंद्रीय मंत्री ने असम बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया, महाराष्ट्र में 7 हज़ार डॉक्टर हड़ताल, सर्दियों में निर्माण गतिविधियों पर रोक न लगाने की मांग, मप्र में बसों का किराया बढ़ा। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने असम के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में चल रहे राहत और पुनर्वास कार्यों की समीक्षा की। उन्होंने शिवसागर का दौरा किया और डिब्रूगढ़ में मुख्यमंत्री व अन्य अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक की।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने मुल्लापेरियार बांध के जल स्तर को 152 फीट तक बढ़ाने की मांग की है। वहीं, केरल सुरक्षा कारणों और बांध की 130 साल पुरानी जर्जर स्थिति का हवाला देते हुए नए बांध के निर्माण की मांग कर रहा है।
महाराष्ट्र के लगभग 7,000 रेजिडेंट डॉक्टर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए हैं। इससे जेजे और नायर जैसे बड़े अस्पतालों की ओपीडी (OPD) सेवाओं में 50% की कमी आई है। डॉक्टर राज्य सरकार द्वारा बीएचएमएस (BHMS) चिकित्सकों को पंजीकृत करने के निर्णय का विरोध कर रहे हैं।
राष्ट्रीय रियल एस्टेट डेवेलपमेंट काउंसिल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सर्दियों में निर्माण गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध (1 नवंबर से 31 जनवरी) पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है। संस्था का कहना है कि यह प्रतिबंध वैज्ञानिक आधार पर नहीं है और इससे आर्थिक बोझ बढ़ता है।
भोपाल और इंदौर में पायलट प्रोजेक्ट के तहत राशन कार्ड धारकों को अब ‘सीबीडीसी टोकन’ (डिजिटल रुपया) उनके मोबाइल वॉलेट में भेजा जाएगा। लाभार्थी इस टोकन को राशन की दुकान पर स्कैन करके गेहूं और चावल प्राप्त कर सकेंगे, जिससे फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी।
राज्य में साधारण बसों का किराया ₹1.25 से बढ़ाकर ₹2 प्रति किलोमीटर कर दिया गया है। न्यूनतम किराया ₹7 से बढ़ाकर ₹10 हो गया है, जबकि 100 किमी की यात्रा पर स्लीपर बस में ₹80 और सुपर लग्जरी में ₹150 अतिरिक्त लगेंगे।
विस्तृत चर्चा
बाढ़ से बेहाल केरल
केरल के कई इलाके अगस्त के शुरुवात में हुई भारी बारिश की वजह से बाढ़ की चपेट में हैं। इनमें कौट्टायम,पथाननथीट्टा, अलापूज़ा, जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। मुख्यमंत्री वी.डी. सतीसन के मुताबिक बुधवार (5 अगस्त) तक मॉनसून से जुड़ी घटनाओं में 26 लोगों की मौत हो गई, 11 घायल हैं और चार लोग लापता हैं, जबकि 27,000 से ज़्यादा लोग लगभग 460 राहत शिविरों में शरण लिए हुए हैं।
कहां कितना नुकसान?
केरल सरकार के मुताबिक 1 अगस्त से अब तक 52 घर पूरी तरह नष्ट हो गए और 565 घरों को आंशिक रूप से नुकसान पहुंचा है।
उत्तरी केरल के कुछ हिस्सों में भारी बारिश हुई है जिसमें कोरिकोड और कन्नूर के ऊंचे इलाके भी शामिल हैं। ज़्यादातर निचले इलाकों से बाढ़ का पानी अभी तक नहीं उतरा है और कई घरों में पानी भरा हुआ है।
आईएमडी के बुधवार सुबह के बुलेटिन के अनुसार 5 अगस्त से 11 अगस्त के बीच केरल, तटीय कर्नाटक और तेलंगाना में वाईडस्प्रेड रेनफॉल की संभावना है। मौसम विभाग ने शनिवार तक राज्य के कुछ हिस्सों में भारी बारिश का भी अनुमान जताया है।
क्यों आई बाढ़?
अगर केरल में बाढ़ के कारणों पर गौर करें तो केरल के सिंचाई विभाग द्वारा की गई स्टडी के मुताबिक नदियों और वॉटर बॉडीज़ में गाद यानी सेडीमेंटेशन बढ़ा है।
2018 की बाढ़ ने नदियों में भारी मात्रा में गाद जमा कर दी थी, इसके साथ ही हिल्ली एरियाज़ में लैंडस्लाईड की वजह से मिट्टी नदियों और जलाशयों में भर गई है। कई जगहों पर नदियों के रास्ते में डेल्टा तैयार हो गए हैं जो बाढ़ के पानी को रोकते हैं।
2021 की कैग रिपोर्ट में कहा गया कि डैम्स में सेडिमेंटेशन के कारण स्टोरेज कैपेसिटी बहोत कम हो गई है। केरल राज्य बिजली बोर्ड ने 2011 के बाद अपने जलाशयों में सेडीमेंटेशन की स्टडी ही नहीं की है। रिपोर्ट के अनुसार 45 सालों में कलारकुट्टी डैम की स्टोरेज कैपेसिटी 47 फीसदी कम हुई है, ऐसी ही स्थिति अन्य बांधों की भी है।
ऐसे में अब जब एक्सट्रीम रेनफॉल हो रहा है तो स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज काम नहीं कर रहा है। बांध तेज़ी से भर रहे हैं। हर जगह वॉटरलॉगिंग की समस्या है।
तेज़ी से बदलता लैंड यूज़ पैटर्न
एक और बात जिसपर मेरा ध्यान गया है शिशिर वो यह है कि तेज़ी से हो रहे शहरीकरण और लैंड यूज़ पैटर्न में चेंज भी इस फ्लड का कारण है। केरल में पैड्डी फील्ड, मार्शलैंड और वेटलैंड तेज़ी से कम हुए हैं। केरल सांख्यिकी विभाग के मुताबिक केरल में वर्ष 1980 तक करीब 8 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर धान की खेती होती थो जो अब सिकुड़कर 2 लाख हेक्टेयर से कम रह गई है।
दलदली इलाका यानी मार्शलैंड 2006 तक 974 हेक्टेयर था अब केवल 11 हेक्टेयर रह गया है। वहीं वेटलैंड्स वर्ष 2006 तक 5950 हेक्टेयर था वह अब घटकर करीब 3000 हेक्टेयर पर आ गया है।
यानी बहुत बड़ा बदलाव यहां लैंड यूज़ में दिखाई देता है।
हम सभी जानते हैं कि जब बाढ़ आती है तो धान के खेत, वेटलैंड, मार्शलैंड, खुली ज़मीन जलग्रहण में मदद करती है। जब यहां कंक्रीट बिछा दिया जाता है तो यह पानी बह जाता है और आपके ड्रेनेज सिस्टम पर प्रेशर डालता है। ऐसे में उनकी यह क्षमता नहीं बचती कि वो फ्लड कंट्रोल कर सके और हम हर तरफ जल भराव की स्थिति देखते हैं।
हालांकि केरल तो बस उदाहरण है, हमारे सभी राज्यों में शहरीकरण इसी तरीके से हो रहा है। सभी इसके परिणाम भुगत रहे हैं और कोई भी कुछ सीख नहीं रहा है।
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
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