हर साल बुवाई के मौसम में देशभर के खाद वितरण केंद्रों के बाहर किसानों की लंबी-लंबी लाइनें लगती हैं। कई बार खाद खत्म हो जाने पर अफरा-तफरी मच जाती है, पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ता है, और कुछ मामलों में तो लाइन में खड़े-खड़े किसानों की मौत तक हो जाती है। देश के प्रमुख कृषि उत्पादक राज्यों में गिने जाने वाले मध्य प्रदेश में भी हर साल यही तस्वीर देखने को मिलती थी।
इस पुरानी और गंभीर समस्या को सुलझाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने एक डिजिटल रास्ता अपनाया, इसका नाम रखा गया ई-टोकन व्यवस्था। सरकार ने तकनीक का सहारा लेते हुए एग्रीस्टैक पर आधारित एक ई-विकास सिस्टम तैयार किया। इस सिस्टम के तहत, जो किसान एग्रीस्टैक पर पहले से रजिस्टर्ड थे, वे घर बैठे ही अपनी जरूरत की खाद पहले से बुक कर सकते थे। इसका मकसद यह था कि किसानों को अब टोकन लेने के लिए घंटों लाइन में खड़ा न होना पड़े।
इस योजना की शुरुआत सबसे पहले अक्टूबर 2025 में जबलपुर, शाजापुर और विदिशा जिलों में एक छोटे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर की गई। शुरुआती नतीजे अच्छे रहे, जिसके बाद सरकार ने भरोसे के साथ 1 अप्रैल 2026 को इसे पूरे राज्य के 55 जिलों में लागू कर दिया।
लेकिन सिर्फ तीन महीने के भीतर ही, 30 जुलाई 2026 को, सरकार को यह व्यवस्था स्थगित करनी पड़ी। वजह थी किसानों का उबलता गुस्सा, हजारों किसान नर्मदापुरम से पैदल मार्च करते हुए भोपाल तक जा पहुंचे और इस व्यवस्था को हटाने की मांग करने लगे।
आखिर परेशानी क्या थी?

ई-टोकन व्यवस्था किसानों को यह सुविधा देने का दावा करती थी कि वे अपनी पसंद के रिटेलर से, अपनी पसंद की खाद, पहले से बुक कर सकें। लेकिन किसानों के मुताबिक उन्हें खाद खरीदने की जगह और खाद के प्रकार चुनने की आज़ादी नहीं थी। सीहोर जिले की भैरुंदा तहसील के परमसुख पटेल के मुताबिक टोकन बुक करने पर नज़दीकी सहकारी सोसाईटी की जगह दूरस्थ शहरों की सोसाईटी के टोकन दिये जा रहे थे। किसानों के लिए इतनी दूर जाना संभव नहीं था। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि खाद कितनी और कौनसी मिलेगी यह भी सरकार ही तय कर रही थी। कई खाद उनपर थोपे जा रहे थे जिससे खर्च भी बढ़ रहा था।
इसकी वजह यह थी कि खाद का आवंटन पिछले साल की फसल के रिकॉर्ड के आधार पर किया जाता था। इससे कई तरह की दिक्कतें सामने आईं, जैसे पशुओं के चारे के लिए उगाई जाने वाली गैर-पंजीकृत फसलें, घर के इस्तेमाल के लिए उगाई गई फसलें, या मौसम की मार पड़ने के बाद जब किसान ने फसल बदल दी हो, ऐसे मामलों में सही खाद खरीदना बेहद मुश्किल हो गया।
इसके अलावा, यह पूरा सिस्टम आधार-आधारित पहचान पर टिका था। गांव-देहात में नेटवर्क की समस्या, समय पर OTP न आना, और बायोमीट्रिक्स का मैच न होना, ये सब रोजमर्रा की व्यावहारिक दिक्कतें किसानों को लगातार झेलनी पड़ीं। यही सारी वजहें मिलकर किसानों के गुस्से का कारण बनीं और आखिरकार वे सड़कों पर उतर आए।
सरकार का पक्ष

मध्य प्रदेश के कृषि सचिव निशांत वरवड़े ने योजना को लागू करते वक्त ईकोनॉमिक्स टाईम्स को दिए अपने इंटरव्यू में इस व्यवस्था के कई फायदे थे गिनाए थे। जैसे सब्सिडाइज्ड खाद की कालाबाजारी रोकने, लेन-देन में पारदर्शिता लाने, वेयरहाउस से रिटेलर तक स्टॉक की आवाजाही पर नजर रखने, और स्टॉक की उपलब्धता का डेटा रियल टाइम में मेंटेन करने में यह सिस्टम काफी मददगार था। साथ ही, किसान अब बिना सोचे-समझे खाद बुक करने के बजाय, फसल की ज़रूरतों और ICAR के बताए नियमों के हिसाब से खाद खरीद रहे थे जिससे मिट्टी की सेहत को नुकसान नहीं पहुंचता।
केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने संसद को दिए अपने लिखित जवाब में बताया कि सरकार देश के 20 राज्यों के 40 जिलों में भी सब्सिडाइज्ड खाद वितरण के लिए इसी तरह के डिजिटल फ्रेमवर्क पर पायलट प्रोजेक्ट चला रही है।
फिलहाल मध्य प्रदेश में यह व्यवस्था सिर्फ रोकी गई है, पूरी तरह बंद नहीं की गई है, यानी यह आने वाले समय में दोबारा लौट सकती है।
उम्मीद है कि जब यह वापस आएगी, तो मौसम और फसल की बदलती अवस्था के हिसाब से किसानों की जरूरतों का ख्याल रखा जाएगा, उन्हें केमिकल या बायो-फर्टिलाइजर के बीच चुनने का विकल्प मिलेगा। साथ ही यह भी जरूरी है कि खाद की भौतिक सप्लाई कम न हो, क्योंकि सिर्फ डिजिटाइजेशन से लंबे समय में खाद की कमी जैसी बुनियादी समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता।
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