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कीटनाशकों की कीमत- हज़ारों जानवरों की जान, क्या कोई बेहतर तरीका है?

भारत हर केमिकल के लिए हज़ारों जानवरों पर पेस्टिसाइड टेस्ट करता है। जबकि मॉडर्न साइंस से इसे बदला जा सकता है।
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भारत में किसान फसल के खेत में पेस्टीसाइड स्प्रे करने की तैयारी कर रहे हैं।

फसल पर लगे कीटों को मारने से पहले कीटनाशक जानवरों की मौत का कारण बनते हैं। रेगुलेटरी टॉक्सिकोलॉजी एंड फार्माकोलॉजी जर्नल में छपे एक नए पीयर-रिव्यूड पेपर के मुताबिक बाज़ार में आने वाले हर नए कीटनाशक की कीमत लगभग 20,000 जानवरों की जान होती है।

चूहों, खरगोशों और कुत्तों को रसायन की खुराक दी जाती है। उन पर होने वाले ज़हरीले असर का अध्ययन कर उन्हें मार दिया जाता है। इन रसायनों को परखने के लिए इस्तेमाल होने वाले ज़्यादातर टेस्ट 1950 और 1960 के दशक के हैं।

बाकी देशों ने यह तरीका बरसों पहले छोड़ दिया है। मगर भारत में यह इसके बाद भी जारी था।

कीटनाशक वे रसायन हैं जो कीड़े और फफूंद को खत्म करते हैं। भारत जेनेरिक कीटनाशकों का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक और चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है। यह बाज़ार 2024 में 2.83 अरब डॉलर का था और 2033 तक 4.79 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।

टॉक्सिसिटी टेस्ट यह बताते हैं कि इंसान बिना किसी नुकसान के इन रसायनों के कितने संपर्क में आ सकता है। दशकों तक यह जानवरों पर टेस्ट करके ही तय किया जाता रहा। 

वैज्ञानिक चूहों, खरगोशों और कुत्तों को रसायन की खुराक देते, उनके शरीर पर पड़ने वाले असर को ट्रैक करते, फिर उन्हें मारकर उनके टिशू का अध्ययन करते। 20वीं सदी के मध्य तक यही तरीका दुनिया भर में मानक बन गया।

जानवरों पर होने वाले इन टेस्ट की लंबे समय से आलोचना होती रही क्योंकि यह भरोसेमंद ढंग से नहीं बता पाते कि रसायन इंसानों को असल में कैसे प्रभावित करेंगे। किसी जानवर में दिखने वाला असर ज़रूरी नहीं कि इंसान में भी वैसा ही दिखे।

pesticides onion crop
मध्य प्रदेश के खरगोन में प्याज़ की फसल पर कीटनाशक का छिड़काव करता किसान | खरगोन | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि एक ही रसायन पर एक ही टेस्ट अलग-अलग लैब में करने पर कभी-कभी अलग नतीजे मिलते हैं। पेपर के मुताबिक यही अस्थिरता दुनिया को इंसानों से जुड़े ज़्यादा प्रासंगिक तरीकों की तरफ बढ़ने की एक बड़ी वजह है।

21वीं सदी में लैब अब रसायनों को सीधे इंसानी कोशिकाओं पर टेस्ट कर सकती हैं या कंप्यूटर मॉडल की मदद से उनका असर पहले से भांप सकती हैं। बाकी देश इन तरीकों की तरफ बढ़ना शुरू भी कर चुके हैं।

भारत ने 2017 से कुछ नॉन-एनिमल टॉक्सिसिटी टेस्ट को औपचारिक रूप से मान्यता दे रखी है। मगर जानवरों पर होने वाले प्रयोग अब भी डिफॉल्ट तरीका बने हुए हैं।

एक नए पीयर-रिव्यूड अध्ययन में सामने आया है कि भारत इनमें से कई टेस्ट को इंसानी कोशिकाओं पर आधारित मॉडल और कंप्यूटर सिमुलेशन से बदल सकता है, बिना सुरक्षा मानकों से समझौता किए।

मगर दो बातें कंपनियों को यह बदलाव करने से रोकती हैं – पहला, इस बात की अनिश्चितता कि रेगुलेटर नॉन-एनिमल डेटा को स्वीकार करेंगे भी या नहीं? दूसरा, आधुनिक टेस्टिंग के लिए ज़रूरी लैब सामग्री आयात करने की लागत, जिसे छोटी कंपनियां और लैब शायद वहन ही न कर पाएं।

अमेरिका, यूरोपीय संघ और दक्षिण कोरिया जैसे देश पहले ही जानवरों पर होने वाले टेस्ट को पूरी तरह खत्म करने की प्रतिबद्धता जता चुके हैं।

रेगुलेटरी अनिश्चितता

अंकिता पांडे ने ग्राउंड रिपोर्ट को भेजे एक मेल में बताया कि कंपनियों के सामने सबसे बड़ी अड़चन यही अनिश्चितता है कि रेगुलेटर नॉन-एनिमल डेटा को वाकई स्वीकार करेंगे या नहीं।

उन्होंने कहा, “जब स्थिति साफ नहीं होती, तो कंपनियां अक्सर एक सुरक्षित रास्ता चुनती हैं और परंपरागत एनिमल स्टडी पर ही भरोसा करती हैं, ताकि रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में देरी या डेटा रिजेक्शन का खतरा कम रहे।”

पांडे, पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) इंडिया में सीनियर साइंटिस्ट और रिसर्च पॉलिसी एडवाइज़र हैं और टॉक्सिसिटी टेस्टिंग में जानवरों के इस्तेमाल को घटाने और बदलने पर काम करती हैं। इस अध्ययन का नेतृत्व उन्होंने ही किया है।

यह पेपर बताता है कि बिना सुरक्षा मानकों से समझौता किए ज़्यादातर एनिमल टेस्ट को इंसानों से जुड़े आधुनिक तरीकों से कैसे बदला जा सकता है।

पेपर में एक नई तकनीक की श्रेणी का ज़िक्र है जिसे न्यू अप्रोच मेथडोलॉजीज़ (एनएएम) कहा जाता है। इसमें लैब में उगाए गए इंसानी कोशिका और टिशू मॉडल, रसायन की मॉलिक्यूलर बनावट से उसकी टॉक्सिसिटी का अंदाज़ा लगाने वाले कंप्यूटर मॉडल, और रीड-अक्रॉस शामिल हैं, जिसमें मिलते-जुलते रसायनों के मौजूदा डेटा की मदद से किसी नए रसायन की सुरक्षा का आकलन किया जाता है।

A pesticide sprayer rests against a tree beside an onion field. Farmers across India use chemicals whose safety was established through animal testing methods that date back to the mid-20th century.
स्प्रे करने से पहले कीटनाशक से भरा डिस्पेंसर | खरगोन | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

भारत की क़ानूनी स्थिति

भारत का सेंट्रल इंसेक्टिसाइड्स बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमेटी (सीआईबी एंड आरसी), जो इंसेक्टिसाइड्स एक्ट, 1968 के तहत कीटनाशकों को मंज़ूरी देता है, उसने 2017 के दिशा-निर्देशों में पहली बार औपचारिक रूप से नॉन-एनिमल तरीकों को स्वीकार किया। बाद में 2023 में बायोपेस्टिसाइड्स टेस्टिंग को भी इसमें शामिल किया गया। पेटा इंडिया ने 2017 और 2023, दोनों दिशा-निर्देशों में नॉन-एनिमल तरीकों को अपनाने में सीआईबी एंड आरसी के साथ मिलकर काम किया।

भारत में 24 लैब ऐसी हैं जिन्हें टॉक्सिसिटी डेटा तैयार करने की मान्यता मिली है, जो सीआईबी एंड आरसी को कीटनाशक रजिस्ट्रेशन के लिए चाहिए होता है। ये लैब गुड लैबोरेटरी प्रैक्टिस (जीएलपी) और नेशनल एक्रिडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लैबोरेटरीज़ (एनएबीएल) के तहत सर्टिफाइड हैं। मगर इन 24 में से चंद लैब ही नॉन-एनिमल टेस्टिंग के तरीके देती नज़र आती हैं।

नॉन-एनिमल तरीके जमा करने की छूट होने के बावजूद, अध्ययन बताता है कि रेगुलेटरी दिशा-निर्देशों में अब भी हर ज़रूरी टेस्ट के आगे जानवरों की खास प्रजाति का नाम लिखा होता है – जैसे “एक्यूट ओरल, रैट”। इससे यह गलत धारणा बन सकती है कि एनिमल टेस्टिंग अब भी अनिवार्य ही है।

2017 और 2023 के दिशा-निर्देश यह मानते हैं कि नॉन-एनिमल तरीके स्वीकार्य हैं, और रजिस्ट्रेशन कमेटी के मिनट्स में नॉन-एनिमल डेटा जमा किए जाने की कुछ मिसालें भी मिलती हैं। मगर यह अब भी साफ नहीं है कि व्यवहार में असल में कौन-से तरीके स्वीकार किए जाते हैं। पेपर एक सार्वजनिक वेबपेज बनाने की सिफारिश करता है जिसमें बताया जाए कि कौन-से नॉन-एनिमल तरीके मान्य हैं और उन्हें कहां इस्तेमाल किया जा सकता है, ताकि रेगुलेटरी प्रक्रिया और पारदर्शी बने।

इसके अलावा पेपर प्री-सबमिशन मीटिंग का भी सुझाव देता है, ताकि कंपनियां स्टडी शुरू करने से पहले ही रेगुलेटर के साथ अपनी टेस्टिंग योजना पर बात कर सकें। इससे समय बचेगा, अनिश्चितता घटेगी और सही नॉन-एनिमल तरीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा।

ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया में रिसर्च और टॉक्सिकोलॉजी की सीनियर प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ सूरत पर्वतम इस अध्ययन से नही जुड़ी हैं। ग्राउंड रिपोर्ट को भेजे मेल में उन्होंने बताया कि उनकी संस्था ने हाल ही में 22 एग्रोकेमिकल कंपनियों और कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च ऑर्गेनाइज़ेशन का सर्वे किया, यह समझने के लिए कि नियमों में छूट होने के बावजूद नॉन-एनिमल टेस्टिंग इतनी कम क्यों है।

पर्वतम के मुताबिक किसी ने भी कंपनियों को साफ-साफ नहीं बताया कि रेगुलेटर इसके बदले क्या स्वीकार करेंगे। उन्होंने कहा, “इसी वजह से इंडस्ट्री उसी आज़माए हुए रास्ते पर टिकी रहती है और जानवरों पर टेस्ट करना जारी रखती है।”

पर्वतम ने बताया कि ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स इंडिया – जो पहले ह्यूमेन सोसाइटी इंटरनेशनल इंडिया के नाम से जानी जाती थी – 2017 के सीआईबी एंड आरसी दिशा-निर्देश बनाने में शामिल थी, जिसने पहली बार भारत के कीटनाशक रेगुलेटरी ढांचे में नॉन-एनिमल तरीकों को मान्यता दी थी।

अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान के उलट, भारत में प्री-सबमिशन कंसल्टेशन जैसी कोई औपचारिक व्यवस्था नहीं है। कंपनियों को यह तभी पता चलता है कि उनका नॉन-एनिमल डेटा स्वीकार हुआ या रद्द, जब समीक्षा हो चुकी होती है। उस मोड़ पर रिजेक्शन का मतलब है पूरे सीज़न की संभावित बिक्री का नुकसान।

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खरगोन के कपास के खेत में खाली पड़े कीटनाशकों के डिब्बे | खरगोन | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

लागत भी एक वजह

इंसानी टिशू मॉडल अक्सर आयात करने पड़ते हैं, जिससे छोटी कंपनियों और कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च ऑर्गेनाइज़ेशन के लिए लागत काफी बढ़ जाती है।

हालांकि कुछ सस्ते विकल्प भी मौजूद हैं और इस्तेमाल हो रहे हैं। रीड-अक्रॉस और ओईसीडी क्यूएसएआर टूलबॉक्स जैसे कुछ टूल ऑनलाइन मुफ्त उपलब्ध हैं। कई बार वैज्ञानिक आधार पर छूट मिल जाने से नया टेस्ट करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि पहले से ही पर्याप्त टॉक्सिसिटी डेटा मौजूद होता है। रेगुलेटरी टॉक्सिकोलॉजी एंड फार्माकोलॉजी में 2019 में छपे एक पेपर के मुताबिक अमेरिका की एनवायर्नमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (ईपीए) ने वैज्ञानिक रूप से जायज़ छूट देकर 2012 से 2018 के बीच स्टडी लागत में 30 करोड़ डॉलर से ज़्यादा की बचत की।

ऑर्गेनाइज़ेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) दुनिया भर में सहमति से बने टेस्टिंग तरीके तैयार करता है, जिन्हें सदस्य और साझेदार देश बिना नए सिरे से जांच के स्वीकार कर लेते हैं।

भारत 2011 से ही म्यूचुअल एक्सेप्टेंस ऑफ डेटा (एमएडी) सिस्टम का हिस्सा है। यानी ओईसीडी टेस्ट गाइडलाइंस के तहत तैयार डेटा को भारत में बिना किसी नई जांच के पहले ही स्वीकार कर लिया जाना चाहिए था।

पर्वतम के मुताबिक पहले से मंज़ूर इन तरीकों को हर बार नई सफाई मांगे बिना स्वीकार करना ही भारत का सबसे बड़ा कदम हो सकता है।

जहां लैब उपकरण की ज़रूरत होती है, वहां जय रिसर्च फाउंडेशन, यूरोफिन्स एडविनस और बायोनीड्स जैसी कुछ भारतीय लैब पहले से ही ओईसीडी-मान्य नॉन-एनिमल तरीके दे रही हैं। टिशू मॉडल अब भी आयात करने पड़ते हैं, मगर पांडे के मुताबिक जैसे-जैसे और लैब यह क्षमता बनाएंगी और मांग बढ़ेगी, लागत घटने की उम्मीद है।

पांडे ने बताया कि पूरी तस्वीर देखने पर एनिमल टेस्टिंग ज़रूरी नहीं कि सस्ती ही पड़े। कुछ एनिमल स्टडी, खासकर कार्सिनोजेनिसिटी टेस्ट, पूरा होने में दो साल तक लग जाते हैं, जबकि कई नॉन-एनिमल तरीके दिनों या हफ्तों में नतीजे दे देते हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि ये तरीके इंसानी जीव विज्ञान से सीधे जुड़ा डेटा दे सकते हैं, जिससे असली दुनिया में इंसानों पर होने वाले असर का अंदाज़ा और सटीक हो जाता है।

पांडे ने कहा, “यह सिर्फ लागत बनाम लागत का सवाल नहीं है। यह तेज़, बेहतर और ज़्यादा कारगर विज्ञान में निवेश करने की बात है।”

बाकी दुनिया में क्या हो रहा है

कई देशों ने नॉन-एनिमल तरीकों को मंज़ूरी देने के साथ-साथ जानवरों पर होने वाले टेस्ट को पूरी तरह खत्म करने के लिए ढांचागत, फंडेड और कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रतिबद्धताएं भी जताई हैं।

मसलन, 1 जून 2026 को यूरोपीय आयोग ने कीटनाशक, औद्योगिक रसायन, दवाइयों और खाद्य योजकों समेत 15 क्षेत्रों में केमिकल सेफ्टी असेसमेंट के लिए एनिमल टेस्टिंग खत्म करने का पूरा रोडमैप अपनाया।

इस रोडमैप में एनिमल टेस्ट को बदलने या घटाने के 31 खास मौके गिनाए गए हैं और 2026 के अंत तक एक सार्वजनिक डैशबोर्ड लॉन्च करने की प्रतिबद्धता जताई गई है।

अमेरिका में एनवायर्नमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी ने 2026 में केमिकल असेसमेंट के लिए सभी स्तनपायी जानवरों पर होने वाली टेस्टिंग खत्म करने की प्रतिबद्धता दोहराई। साथ ही कंपनियों के लिए एक औपचारिक प्रक्रिया भी शुरू की गई, जिसके ज़रिए वे रेगुलेटरी मंज़ूरी के लिए खास नॉन-एनिमल तरीकों की सिफारिश कर सकती हैं।

मई 2025 में दक्षिण कोरिया सरकार ने इंचियोन में एक राष्ट्रीय एनिमल-फ्री टेस्टिंग फैसिलिटी का निर्माण शुरू किया, जिसका बजट करीब 2.4 करोड़ डॉलर है। इस फैसिलिटी में इंसानी कोशिकाओं, कृत्रिम अंगों, 3डी टिशू मॉडल और एआई आधारित टूल के इस्तेमाल की योजना है, जो 2030 तक 60 फीसदी से ज़्यादा केमिकल सेफ्टी टेस्टिंग को नॉन-एनिमल तरीकों से बदलने के दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय लक्ष्य में मदद करेगी।

दक्षिण कोरिया 2018 में ही कॉस्मेटिक्स के लिए एनिमल टेस्टिंग पर रोक लगा चुका है। कनाडा और ब्रिटेन ने भी 2025 में टॉक्सिसिटी टेस्टिंग में वर्टिब्रेट जानवरों के इस्तेमाल को बदलने, घटाने और परिष्कृत करने की औपचारिक राष्ट्रीय रणनीतियां प्रकाशित कीं।

भारत नॉन-एनिमल टेस्टिंग की इजाज़त तो देता है, मगर कंपनियों के लिए इसे पहले इस्तेमाल करना अनिवार्य नहीं बनाता। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन में आमतौर पर तभी एनिमल टेस्टिंग की इजाज़त होती है जब कोई मान्य नॉन-एनिमल तरीका मौजूद ही न हो।

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भारत में एक किसान अपने खेत में पेस्टीसाइड स्प्रेयर लेकर जा रहा है | खरगोन | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

अभी नीतिगत स्तर पर क्या हो रहा?

नया पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल, 2025, सार्वजनिक परामर्श 4 फरवरी 2026 को बंद होने के बाद सरकारी समीक्षा के दौर से गुज़र रहा है।

पेटा इंडिया ने उस समयसीमा से पहले ही औपचारिक सिफारिशें जमा कीं, जिनमें वैज्ञानिक रूप से मान्य नॉन-एनिमल तरीकों को बढ़ावा देने के लिए मज़बूत प्रावधानों की मांग की गई।

सरकार ने अब तक इन सिफारिशों पर सार्वजनिक रूप से कोई जवाब नहीं दिया है।

अप्रैल 2026 में सीआईबी एंड आरसी ने उस टेस्ट को हटा दिया जिसे लाइवस्टॉक मेटाबॉलिज्म टेस्ट कहा जाता था, जो तब लागू होता था जब कोई कीटनाशक किसी नए स्रोत से आयात किया जा रहा हो। इसे यह देखने के लिए किया जाता था कि रसायन खेत के जानवरों के भीतर कैसा व्यवहार करते हैं और क्या वे मांस, दूध या अंडे में अवशेष छोड़ते हैं। इस बदलाव में पेटा इंडिया की अहम भूमिका रही।

पांडे ने कहा, “विज्ञान स्थापित हो चुका है, मान्य ओईसीडी टेस्ट गाइडलाइंस मौजूद हैं, भारतीय लैब इनमें से कई तरीके कर सकती हैं, और इंडस्ट्री की दिलचस्पी भी बढ़ रही है। अब ज़रूरत एक ज़्यादा सहयोगी रेगुलेटरी माहौल की है, जो कंपनियों को इन तरीकों के इस्तेमाल का भरोसा दे सके।”


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  • Wahid Bhat is an environmental journalist with a focus on extreme weather events and lightning. He reports on severe weather incidents such as floods, heatwaves, cloudbursts, and lightning strikes, highlighting their growing frequency and impact on communities.

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