...
Skip to content

देश का पहला ‘समृद्धि केंद्र’ अपने दावों पर कितना कायम?

गुना के उमरी में स्थापित यह देश का पहला समृद्धि केंद्र एक 'फिटिकल हब' है। मगर तमाम दावों के बरक्स धरातलीय हकीकत कुछ और ही कहती है।
Watch On YouTube

स्विट्जरलैंड के जिनेवा में जब संयुक्त राष्ट्र के डब्लूएसआईएस पुरूस्कार 2026 (World Summit on Information Society) के विजेताओं के नाम की घोषणा हो रही थी। तब भारतीय दूरसंचार विभाग और केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का ‘समृद्ध ग्राम’ विजन वैश्विक मंच पर एक मिसाल बनकर उभरा। इस पहल को ‘इनएबलिंग एनवायरनमेंट’ (अनुकूल वातावरण निर्माण) श्रेणी में दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मॉडल चुनते हुए ‘ग्लोबल विनर’ घोषित किया गया। इस ऐतिहासिक पुरस्कार की गूंज मध्य प्रदेश के गुना जिले के एक छोटे से गांव उमरी तक पहुंची, जहां 15 मार्च 2026 को आधिकारिक रूप से देश का पहला ‘समृद्धि केंद्र’ लॉन्च किया गया।

यह केंद्र असल में एक ‘फिजिटल’ यानि फिज़िकल और डिजिटल दोनों तरह की सुविधा देने की जगह है। आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक भौतिक रूप से यह गांव की चौपाल या पंचायत भवन में मौजूद होता है। मगर हाई-स्पीड भारतनेट (BharatNet) ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के ज़रिए यह टेलीमेडिसिन और बैंकिंग से लेकर कृषि जैसी तमाम सुविधाएं ग्रामीणों तक पहुंचाता है। 

मगर ‘ग्लोबल अवार्ड’ और तमाम सरकारी दावों के बरक्स असल में ये केंद्र कैसे काम करता है? क्या वाकई अब ग्रामीणों को एक छत के नीचे वो सारी सुविधाएं मिल रही हैं जिसके लिए यह परिकल्पना की गई है? जो लोग इस केंद्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं उनका क्या हाल है? और अगर केंद्र में कमियां हैं तो यह ग्लोबल अवार्ड मिला कैसे? आइए जानते हैं।   

Samriddhi Kendra 2
समृद्धि केंद्र में ऑनलाइन सुविधा के माध्यम से अपना काम करवाता युवक | गुना | फ़ोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

अब भी पूरे अधिकारी नहीं

भारत सरकार के दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा जारी की गई आधिकारिक PIB समृद्ध ग्राम प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, इस समृद्धि केंद्र को एक ‘वन-स्टॉप हब’ के रूप में इसीलिए डिजाइन किया गया है ताकि ग्रामीणों को जिला मुख्यालयों के चक्कर न काटने पड़ें। 

इस मॉडल का प्राथमिक नियम यह है कि यहां सिर्फ तकनीकी मशीनें नहीं रखी जाएंगी, बल्कि ग्रामीणों की सीधी मदद के लिए विभिन्न विभागों के सरकारी अधिकारी भी खुद इस भवन में बैठेंगे। 

नाम न छापने की शर्त पर एक शख्स ने बताया कि वह अपनी ज़मीन से संबंधित समस्या के निदान के लिए बीते 10 दिनों से केंद्र के चक्कर काट रहा है मगर यहां सम्बंधित हल्के का पटवारी मौजूद नहीं है। 

इसे लेकर डिजिटल एंपावरमेंट फाउंडेशन के सीनियर प्रोजेक्ट ऑफिसर विपुल यशवा कहते हैं, “यहां तहसीलदार मैडम समय-समय पर आकर बैठती हैं, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के वैज्ञानिक भी आते हैं। लेकिन पटवारी अभी यहां नियमित रूप से नहीं बैठते।” 

उन्होंने बताया कि फाउंडेशन द्वारा यहां आकर अपनी सेवाएं देने के बारे में बात की जा रही है। वह कहते हैं, “जैसे ही व्यवस्था बनेगी, पटवारी भी यहां बैठेंगे, क्योंकि समृद्धि केंद्र के माध्यम से पूरी ग्राम पंचायत को ही पुनर्विकसित किया गया है।”

डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन (DEF) को फील्ड ऑपरेशन और कम्युनिटी मोबिलाइज़ेशन पार्टनर के तौर पर इस कार्यक्रम में शामिल किया गया है।

‘डिजिटल उद्यमिता’ का आकर्षण या आर्थिक असुरक्षा?

इस समृद्धि केंद्र की सफलता के दावों का दूसरा स्तंभ इसका ‘बिजनेस मॉडल’ बताया जा रहा है। यशवा के अनुसार, “इस मॉडल की सबसे बड़ी खूबी इसकी ‘सेल्फ-सस्टेनेबिलिटी’ है।” 

दरअसल यहां काम करने वाले युवा नियमित कर्मचारी की तरह वेतन नहीं पाते बल्कि “वे स्वतंत्र ग्रामीण युवा उद्यमी हैं जो तकनीकी सेवाओं से होने वाले मुनाफे से अपनी आय अर्जित करते हैं।” यश्व कहते हैं कि इससे वे अधिक काम करने के लिए प्रेरित रहते हैं। 

केंद्र में काम करने वाले दीपक धाकड़ खेतों में कीटनाशकों के छिड़काव के लिए ड्रोन पायलट की सेवा देते हैं। केंद्र से यह सुविधा लेने के लिए किसान को प्रत्येक एकड़ पर 200 रूपए का भुगतान करना होगा। मगर धाकड़ के हिस्से केवल 100 रूपए ही आएंगे।

वह बताते हैं किसान द्वारा किए गए कुल भुगतान में से भी 50 प्रतिशत हिस्सा सीधे समृद्धि केंद्र के खाते में चला जाता है। हमने पूछा कि यदि किसी सीजन में मौसम खराब होने के कारण ऑर्डर्स न आएं, तो उस स्थिति में क्या मिलेगा? दीपक जवाब देते हैं, “कुछ नहीं।”

यानि समृद्धि केंद्र का यह मॉडल युवाओं को ‘उद्यमी’ का नाम तो देता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से उन्हें बिना किसी वित्तीय सुरक्षा के बाजार के भरोसे छोड़ देता है।

Samriddhi Kendra 3
समृद्धि केंद्र में जन औषधि केंद्र सहित स्वास्थ्य, कृषि और बैंकिंग की सुविधाएं उपलब्ध हैं | गुना | फ़ोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

कैसे मिला पुरूस्कार?

दरअसल भारत की इस पहल को ‘ग्लोबल पुरूस्कार’ वोटिंग के ज़रिए मिला है। यशवा ने बताया कि जिनेवा के मंच पर अवॉर्ड पक्का करने के लिए उनके संगठन और सरकारी विभाग ने मिलकर एक बड़ा वोटिंग अभियान चलाया था। 

उनके शब्दों में, “हमारी संस्था ने बड़े पैमाने पर वोटिंग कराई, हमारे पैरेंट डिपार्टमेंट (दूरसंचार विभाग) ने अपने पूरे सरकारी नेटवर्क का इस्तेमाल किया, और जितने भी लोग इस प्रोजेक्ट में जुड़े हुए हैं, सबने अधिक से अधिक वोट इकट्ठा करवाए। इसी सामूहिक पुशिंग के माध्यम से हमें यह ग्लोबल विनर का अवार्ड मिला।”

यह बयान साफ करता है कि जिनेवा में मिला यह अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार केवल उमरी गांव के स्वतः स्फूर्त डिजिटल बदलाव को देखकर नहीं मिला, बल्कि इसके पीछे सरकारी विभागों और एनजीओ नेटवर्क द्वारा चलाई गई संस्थागत वोटिंग का एक बड़ा योगदान था।

बीएसएनएल कर रहा तकनीकी सहयोग

इंटरनेट कनेक्टिविटी की निरंतरता पर बात करते हुए यशवा ने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) के भारतनेट (BharatNet) परियोजना के अंतर्गत उमरी गांव के समृद्धि केंद्र को पूरा तकनीकी सपोर्ट मिला है। उनके मुताबिक, यदि कभी फाइबर कट या इंटरनेट फेलियर जैसी समस्या आती भी है, तो बैकएंड पर बीएसएनएल का एक आधिकारिक शिकायत निवारण तंत्र (Redressal Mechanism) और सर्विस लेवल एग्रीमेंट (SLA) काम करता है, जो बहुत ही कम समय (डाउनटाइम को न्यूनतम रखकर) में तकनीकी खामियों को ठीक करके नेटवर्क को बहाल कर देता है।

उमरी गांव का यह ‘समृद्धि केंद्र’ निश्चित रूप से तकनीकी रूप से एक महत्वाकांक्षी कदम है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सर्वोच्च सराहना मिली है। लेकिन जब तक ऐसे तकनीकी समाधानों को स्थानीय प्रशासनिक जवाबदेही जैसे अधिकारीयों की नियमित उपस्थिति और स्थानीय युवाओं की आर्थिक सुरक्षा से नहीं जोड़ा जाता तब तक यह ग्रामीण विकास की अवधारणा को साकार होने में सहयोग देते हुए नहीं दिखाई दे सकेंगे। डिजिटल इंडिया की असल सफलता केवल डेटा शीट और पीआर (PR) अभियानों में नहीं, बल्कि कतार में खड़े अंतिम ग्रामीण के जीवन में आने वाले वास्तविक और व्यावहारिक बदलाव से ही मापी जानी चाहिए।


भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट का आर्थिक सहयोग करें।


अन्य वीडियो रिपोर्ट्स

केन-बेतवा लिंक: चिता आंदोलन के साथ अमित भटनागर का आमरण अनशन

बुंदेलखंड को पानी देने की कीमत चुकाते 20 गांव, जिन्हे मुआवजे की मांग पर मिली लाठी


पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुकट्विटरइंस्टाग्रामयूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें। 


Author

  • Abdul Wasim Ansari is an independent journalist based in Rajgarh, Madhya Pradesh, bringing nearly a decade of experience in journalism since 2014. His work focuses on reporting from the grassroots level in the region.

    View all posts

Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

Connect With Us

Send your feedback at greport2018@gmail.com

Newsletter

Subscribe our weekly free newsletter on Substack to get tailored content directly to your inbox.

When you pay, you ensure that we are able to produce on-ground underreported environmental stories and keep them free-to-read for those who can’t pay. In exchange, you get exclusive benefits.

Your support amplifies voices too often overlooked, thank you for being part of the movement.

EXPLORE MORE

LATEST

mORE GROUND REPORTS

Environment stories from the margins