रीवा जिले के गोविंदगढ़ में किसान सौरभ सिंह बघेल अपने तीन एकड़ के बाग से आम की भरी कैरेट निकलवा रहे हैं। यह बाग रीवा की पहचान बन चुके सुंदरजा आम का है। बघेल के दादा ने करीब 40 साल पहले इसी जमीन पर सुंदरजा के पौधे रोपे थे। वर्ष 2023-24 में इस आम को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग मिला। उस वक्त उम्मीद थी कि गोविंदगढ़ के इस आम को वैश्विक पहचान मिलेगी। दो साल बाद तस्वीर अलग है। सरकारी नीलामियों में इसके दाम बढ़े हैं, लेकिन इसे उगाने वाले स्थानीय किसान खुद को हाशिये पर पाते हैं।

अनोखी मिठास वाला आम, ‘सुंदरजा’
बघेल के अनुसार सुंदरजा मूल रूप से गोविंदगढ़ की देन है। उनका कहना है कि रीवा के महाराज वेंकट रमण सिंह आम के शौकीन थे। उनके कार्यकाल में, साल 1925 के आसपास, स्थानीय बागवान बेनी माधव को बडिंग यानी ग्राफ्टिंग की आधुनिक तकनीक सीखने उत्तर प्रदेश भेजा गया था। बघेल बताते हैं कि लौटकर बेनी माधव ने गोविंदगढ़ की मिट्टी में यह आम तैयार किया। जब पहली खेप राजदरबार में पेश हुई, तो महाराज के मुंह से निकला, “यह बहुत सुंदर है।” बघेल के मुताबिक तभी से इसका नाम सुंदरजा पड़ा।

फल वैज्ञानिक टी.के. सिंह आम की प्रोफाइल बताते हुए कहते हैं कि, पकने पर यह आम सुर्ख पीले रंग का हो जाता है और इसके ऊपरी हिस्से पर हल्की लाल धारियां उभरती हैं। एक फल का वजन 250 से 450 ग्राम तक होता है, जिसमें करीब 76 प्रतिशत हिस्सा गूदे का होता है। इसकी खुशबू इतनी गहरी होती है कि खाने के बाद भी 40 से 60 मिनट तक हाथों में महक बनी रहती है। सामान्य तापमान पर इसे नौ दिन तक और फ्रीजर में करीब एक महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

स्थानीय फल विक्रेता शैलेंद्र कुमार मिश्रा इसके स्वाद का श्रेय गोविंदगढ़ तालाब की नजदीकी को देते हैं। उनका कहना है, “यहां का पानी मीठा है, इसलिए यहां का आम मीठा है।”
सिंह अपने अवलोकनों के आधार पर बताते हैं कि गोविंदगढ़ तालाब से जैसे-जैसे दूरी बढ़ती जाती है, सुंदरजा का स्वाद फीका पड़ता जाता है। हालांकि उनका कहना है कि इसके पीछे की वजह जानने की लिए अभी और शोधकार्य की जरूरत है। सिंह कहते हैं कि अगर पर्याप्त शोध किया जाए तो सुंदरजा का भौगोलिक क्षेत्र और उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है।

स्वाद को लेकर एक और दावा स्थानीय बोलचाल में आम है, सुंदरजा को शुगर-फ्री आम कहा जाता है, जिसके चलते मधुमेह के मरीजों में इसकी मांग ज्यादा रहती है। टी.के. सिंह इसे खारिज करते हैं। उनके अनुसार वैज्ञानिक अध्ययनों में सुंदरजा के शुगर-फ्री होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। सिंह बताते हैं कि इसका टोटल सॉल्युबल सॉलिड्स यानी ब्रिक्स 19.8 डिग्री होता है, जो काफी मीठा माना जाता है। वे सलाह देते हैं कि शुगर के मरीजों को इसे डॉक्टर की सलाह पर ही सीमित मात्रा में खाना चाहिए।
किसानों की उपेक्षा
सुंदरजा के पेड़ आज मुख्यतः सरकारी जमीन और कुछ निजी बागों तक सिमटे हैं। स्थानीय विभागों से मिले आंकड़ों के अनुसार, उद्यानिकी विभाग के गोविंदगढ़ केंद्र में करीब 1,200 पेड़ फल दे रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के कुठुलिया फार्म में करीब 2,500 पेड़ हैं, जबकि विश्वविद्यालय के अन्य हिस्सों में करीब 100 पेड़ और मौजूद हैं। राजस्व विभाग के अंतर्गत गोविंदगढ़ तालाब के किनारे और त्रिदंडी मठ परिसर में भी पेड़ लगे हैं, लेकिन देखरेख की कमी के चलते इनकी हालत बिगड़ रही है। सरकार के पास सुंदरजा की खेती करने वाले पंजीकृत किसानों का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है।
इसी अनदेखी की कीमत स्थानीय किसान चुका रहे हैं। बघेल कहते हैं कि जब सरकार पुराने पेड़ों को संरक्षित करने में रुचि नहीं ले रही, तो नए पेड़ लगाने का प्रोत्साहन किसानों को नहीं मिलता। उनके अनुसार किसानों के लिए कोई विशेष अनुदान योजना नहीं है। बघेल यह भी बताते हैं कि रीवा के किसान कृषि तकनीक के मामले में काफी पीछे हैं। उनके अनुसार अगर यहां स्मार्ट तकनीक उपलब्ध होती, तो खेती और देखरेख दोनों आसान होते। स्थानीय किसानों के पास न तो ड्रिप सिंचाई की ट्रेनिंग है, न आधुनिक सेंसर आधारित पंप की जानकारी। टी.के. सिंह भी इस बात की पुष्टि करते हैं। उनके अनुसार सुंदरजा की खेती को लेकर स्थानीय किसानों में जागरूकता की कमी है, जिसके चलते बाहरी क्षेत्रों के किसान और व्यापारी इसमें ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
यह दिलचस्पी हाल की नीलामियों में साफ दिखी। कुठुलिया फार्म के 2,500 पेड़ों का ठेका बिहार के एक किसान ने 20 लाख रुपए की सबसे ऊंची बोली लगाकर हासिल किया। गोविंदगढ़ उद्यानिकी विभाग के बगीचे का ठेका शहडोल जिले के व्यौहारी के एक व्यापारी को 18 लाख रुपए में मिला। वहीं देखरेख की कमी के चलते राजस्व विभाग के पेड़ों की बोली महज 3.31 लाख रुपए पर सिमट गई।

मौसम की मार
पेड़ की देखरेख के अलावा सुंदरजा की सबसे बड़ी चुनौती मौसम है। टी.के. सिंह के अनुसार सुंदरजा का पेड़ पर्यावरण के प्रति संवेदनशील है और अन्य आमों की तुलना में आसानी से टिक नहीं पाता, क्योंकि इसकी प्राकृतिक बढ़वार धीमी है। पौधा तीन साल का होते ही उसकी कैनोपी पर मोटे और उभरे स्पॉट्स दिखने लगते हैं, जो मैंगो मालफॉर्मेशन यानी बांध रोग के लक्षण हैं। सिंह यह भी बताते हैं कि फल पकने के समय अगर तीन से पांच दिन तक लगातार बादल छाए रहें, तो मक्खियां आकर्षित होती हैं और कीटों का हमला बढ़ जाता है। उनके अनुसार बादल छाए रहने की स्थिति में कीट संक्रमण से 50 प्रतिशत तक फसल का सीधा नुकसान हो सकता है। इस साल गोविंदगढ़ के आसपास के बागों में कीटों से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ, जहां किसी स्प्रे का असर नहीं हुआ। तापमान 44 डिग्री सेल्सियस पार करने पर अत्यधिक गर्मी से फल की गुणवत्ता अलग से गिरने लगती है।

गर्मी और कीटों से बचाव के लिए सिंह फ्रूट बैगिंग की सलाह देते हैं, यानी फलों को विशेष बैग से ढंकना, जिससे कम से कम 20 प्रतिशत फसल सुरक्षित रह सकती है।

बाजार में भी सुंदरजा की स्थिति उलझी हुई है। यह आम स्थानीय बाजार में शुरुआत में 100 रुपए प्रति किलो बिकता है और जुलाई के अंत तक इसका दाम 500 से 600 रुपए प्रति किलो तक पहुंच जाता है। इसके बावजूद गोविंदगढ़ में इसे बेचने के लिए कोई व्यवस्थित बाजार नहीं है। मिश्रा प्रशासन से मांग करते हैं कि गोविंदगढ़ में एक व्यवस्थित फल मंडी बनाई जाए, जहां सुंदरजा सहित अन्य फलों के व्यापार के लिए पक्की दुकानें हों। उनका कहना है कि व्यापारी और विक्रेता तय की गई किसी भी दर पर दुकान लेने को तैयार हैं, चाहे वह 200 रुपए हो या 2,000 रुपए।
फल वैज्ञानिकों के अनुसार जीआई टैग और सरकारी नीलामियों से विभाग का राजस्व भले बढ़ा हो, लेकिन इस विरासत का असली लाभ तभी मिलेगा जब स्थानीय किसान आर्थिक और तकनीकी रूप से सक्षम होंगे। इसके लिए सुंदरजा के पौधों को लखनऊ और जबलपुर जैसी अलग-अलग जगहों पर लगाकर इसकी अनुकूलनशीलता का अध्ययन किया जाना जरूरी है। साथ ही किसानों को फसल बीमा, ड्रिप सिंचाई की ट्रेनिंग और आधुनिक उपकरणों पर सब्सिडी जैसी सुविधाएं चाहिए। सुंदरजा उगाने वाले किसानों का डिजिटल डेटाबेस भी अब तक तैयार नहीं हुआ है, जिसके बिना सरकारी योजनाओं का लाभ असली किसानों तक पहुंचना मुश्किल है।

फिलहाल गोविंदगढ़ के बागों में सुंदरजा के पेड़ फल दे रहे हैं, लेकिन इसे उगाने वाले किसान खुद इसके भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।
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