हसदेव में कोयला खनन को मंज़ूरी, हाइड्रोपॉवर में 19% तक की गिरावट, मध्य भारत में 45% कम बारिश, सूखे के लिए मप्र का इमरजेंसी फंड। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य जंगलों में केंटे एक्सटेंशन ब्लॉक में सालाना 9 मिलियन टन कोयला खनन के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने हरी झंडी दे दी है। इस परियोजना के लिए लगभग 1,742 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग किया जाएगा, जिसका स्थानीय समुदायों द्वारा भारी विरोध हो रहा है।
कम बारिश के कारण इस साल जून में हाइड्रो पॉवर उत्पादन में 19.5% की भारी गिरावट दर्ज की गई है। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत की कोयला आधारित बिजली पर निर्भरता बढ़ी है, जिसका उत्पादन जून में बढ़कर 1 लाख 17 हज़ार 677 मिलियन यूनिट तक पहुँच गया है।
भीषण गर्मी के लंबे दौर के बाद मानसून अपनी सामान्य तारीख से 5 दिन की देरी के साथ आखिरकार दिल्ली पहुंच गया है। हालांकि, देशभर में अब तक मानसून की बारिश सामान्य से 38% कम रही है, जिसमें मध्य भारत में सबसे अधिक 45% की कमी है।
बेंगलुरु के बाहरी इलाके में एक ग्रेनाइट खदान धंसने से 7 प्रवासी मजदूरों की मौत हो गई, जिनमें से 5 मजदूर मध्य प्रदेश के रहने वाले थे। कर्नाटक सरकार ने मृतकों के परिजनों को 10-10 लाख रुपये और घायलों को 5-5 लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की है।
मानसून अब मध्य प्रदेश के 99% हिस्से को कवर कर चुका है और मौसम विभाग ने राज्य के 44 जिलों में बारिश का ‘येलो अलर्ट’ जारी किया है। राजधानी भोपाल में हुई बारिश के कारण तापमान में 5 डिग्री सेल्सियस तक की बड़ी गिरावट देखी गई है।
कम बारिश और अल-नीनो के प्रभाव को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने 20.9 करोड़ रुपये का इमरजेंसी फंड जारी किया है। राज्य के 19 जिलों में स्थिति गंभीर है, जहाँ औसत से 60% तक कम बारिश हुई है, जिसके लिए हर जिले को क्राइसिस मैनेजमेंट प्लान बनाने के निर्देश दिए गए हैं।
विस्तृत चर्चा
आज की चर्चा में हमारे एडिटर इन चीफ पल्लव जैन से जानिए जून के सूखे से किन किन राज्यों में कम हुई खरीफ की बोवाई।
जून का सूखा और बोवनी में कमी
इस साल पूरे भारत में खरीफ़ की बुआई में भारी कमी देखी जा रही है। 25 जून तक खेती का कुल रकबा 18.27 मिलियन हेक्टेयर (mha) रहा, जो पिछले साल इसी अवधि के 23.6 mha के मुकाबले लगभग 23 प्रतिशत कम है।
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, धान, कपास, तिलहन और दालों की बुवाई पिछले साल के मुकाबले पीछे चल रही है, और यह ट्रेंड लगभग सभी खरीफ फसलो की बुवाई में देखा जा रहा है।
जून में 40% कम हुई बारिश
दरअसल इस बार दक्षिण-पश्चिम मॉनसून देरी से आया है और कमजोर है इसके कारण खेती प्रधान राज्यों में बुआई का काम रुका हुआ है। जून का महीना मुख्य होता है जब किसान पहली बारिश के बाद फसल की बुवाई शुरु करता है लेकिन भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, जून के महीने में 40 प्रतिशत कम बारिश हुई है।
मौसम विभाग के अनुसार बारिश में कमी का कारण इक्वेटोरियल पैसिफिक क्षेत्र में अल-नीनो की स्थिति का मज़बूत होना है। आम तौर पर इस स्थिति का संबंध भारत में कमज़ोर मॉनसून बारिश से होता है, जिससे यह आशंका बढ़ गई है कि जुलाई में भी किसानों को ज़्यादा राहत नहीं मिलेगी।
भारत में खेती साउथ वेस्ट मॉनसून से जुड़ी हुई है। खरीफ़ की बुआई का समय ठीक मॉनसून के समय ही होता है और खरीफ की फसलें भारत के सालाना अनाज उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा होता है।
सूखे का संकट
यह तो हो गई खाद्य सुरक्षा की बात अब बारिश नहीं होगी तो उसका परिणाम यह होगा की हम सूखे की स्थिति देखेंगे। IIT गांधीनगर द्वारा संचालित ‘नेशनल ड्रॉट मॉनिटर’ के अनुसार, 1 जुलाई तक भारत का 41.2 प्रतिशत इलाका सूखे या सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहा है।
भारत का पश्चिमी हिस्सा — जिसमें महाराष्ट्र और गुजरात जैसे प्रमुख कृषि राज्य और कर्नाटक के कुछ हिस्से शामिल हैं — सबसे ज़्यादा प्रभावित है; यहां का 71 प्रतिशत इलाका सूखे की चपेट में है। सेंट्रल इंडिया भी इससे ज़्यादा पीछे नहीं है, यहां 53 प्रतिशत इलाका सूखाग्रस्त है, और पूर्वोत्तर में यह आंकड़ा 62 प्रतिशत है। उत्तर भारत में यह 46 प्रतिशत है।
हाई रिस्क वाले जिले चिह्नित
अब इस स्थिति को देखते हुए केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने देश भर के 111 ज़िलों को ‘हाई-रिस्क’ (ज़्यादा जोखिम वाले) और ‘हाई-प्रायोरिटी’ (उच्च प्राथमिकता वाले) ज़िलों के तौर पर चिह्नित किया है। ये वे ज़िले हैं जहां दो तरह की मुश्किलें एक साथ आ रही हैं — एक तो IMD ने पहले ही कमज़ोर मॉनसून का अनुमान लगाया है, और दूसरा, यहां सिंचाई की सुविधा 25 प्रतिशत से भी कम है; यानी अगर बारिश नहीं होती है, तो किसानों के पास खेती के लिए कोई दूसरा सहारा नहीं बचता। इनमें से ज़्यादातर ज़िले 12 राज्यों में स्थित हैं: मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा।
ग्राउंड रिपोर्ट मध्य प्रदेश में लगातार इस समस्या पर नज़र बनाए हुए हैं, हम आने वाले समय में ज़मीन पर उतरकर किसानों की स्थिति अपने पाठकों तक पहुंचाएंगे।
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
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