मध्य भारत के बालाघाट के जंगलों में लगाए गए कैमरा ट्रैप में 18 अलग-अलग बाघ और 27 तेंदुए दर्ज हुए। ये जानवर यहां प्रजनन कर रहे हैं, अपना इलाका बना रहे हैं और सामान्य वन क्षेत्रों में रह रहे हैं। ये ऐसे वन क्षेत्र हैं जिनका प्रबंधन मुख्य रूप से लकड़ी और भूमि के लिए किया जाता है।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और मध्य प्रदेश वन विभाग की नई रिपोर्ट, “स्टेटस ऑफ लार्ज कार्निवोर्स एंड वाइल्ड हूफ स्पीशीज इन द नॉर्थ एंड साउथ बालाघाट फॉरेस्ट डिवीजन्स”, उत्तर और दक्षिण बालाघाट वन मंडलों में हो रहे इन बदलावों को दर्ज करती है।
मध्य प्रदेश में देश में सबसे ज्यादा 785 बाघ हैं। लेकिन भारत के लगभग 40 प्रतिशत बाघ केवल 11 प्रतिशत टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में रहते हैं।बालाघाट से लगे कान्हा टाइगर रिजर्व में 105 बाघ हैं। पेंच टाइगर रिजर्व में 77 बाघ हैं। बालाघाट कान्हा टाइगर रिजर्व और पेंच टाइगर रिजर्व (मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र) के बीच स्थित है। यह लगभग 9,200 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र है, जो दोनों रिजर्वों को जोड़ता है।
कई वर्षों से बालाघाट को एक महत्वपूर्ण वन गलियारे यानी कॉरिडोर के रूप में देखा जाता रहा है। यह ऐसा वन क्षेत्र है जो बाघों को कान्हा और पेंच के बीच आने-जाने का रास्ता देता है। इससे अलग-अलग बाघ आबादियों के बीच आनुवंशिक विविधता बनी रहती है।
नवंबर 2021 में शोधकर्ताओं ने दक्षिण बालाघाट के लालबर्रा और कटंगी क्षेत्र में 215 वर्ग किलोमीटर इलाके में 71 कैमरा ट्रैप लगाए। ये कैमरे 25 दिनों तक सक्रिय रहे।
इन कैमरों में बाघों की 262 तस्वीरें और तेंदुओं की 154 तस्वीरें दर्ज हुईं। शोधकर्ताओं ने 18 अलग-अलग बाघों और 27 अलग-अलग तेंदुओं की पहचान की। इनमें से 12 बाघ कई बार कैमरों में दिखाई दिए। दो स्थानों पर बाघों के प्रजनन की पुष्टि हुई।
रिपोर्ट के अनुसार, बाघ यहां अपना स्थायी इलाका भी बना रहे हैं। इससे यह बात और मजबूत होती है कि बालाघाट केवल एक आवागमन मार्ग (corridor) नहीं है, बल्कि बाघों और तेंदुओं का सक्रिय निवास क्षेत्र बन चुका है।
अध्ययन के अनुसार, यहां बाघों का घनत्व 3.72 बाघ प्रति 100 वर्ग किलोमीटर और तेंदुओं का घनत्व 6.67 प्रति 100 वर्ग किलोमीटर है। यह संख्या टाइगर रिजर्वों की तुलना में कम है, लेकिन ऐसे वन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है जिसे कोई संरक्षित दर्जा प्राप्त नहीं है। सर्वेक्षण में कुल 24 स्तनधारी प्रजातियां दर्ज की गईं। इनमें जंगली कुत्ते, भेड़िए, स्लॉथ भालू, गौर, सांभर और चीतल भी शामिल हैं।

मध्य प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक शुभरंजन सेन ने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा, “वन्यजीवों की सुरक्षा केवल संरक्षित क्षेत्रों के भीतर नहीं की जा सकती। इसकी जरूरत पूरे वन परिदृश्य में है।”
बालाघाट के इन सामान्य वन क्षेत्रों में बाघ प्रजनन कर रहे हैं, जबकि यहां न तो संरक्षित क्षेत्र का दर्जा है और न ही संरक्षण के लिए अलग से कोई विशेष फंड। ये बाघ कान्हा और पेंच टाइगर रिजर्व से यहां पहुंचे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रिजर्वों में बढ़ती संख्या और जगह की कमी के कारण वे बाहर निकल रहे हैं।
भारत की संरक्षण व्यवस्था मूल रूप से ऐसी स्थिति के लिए तैयार नहीं की गई थी। अब उसे जल्द यह तय करना होगा कि वह इस बदलाव के अनुसार खुद को ढाल सकती है या नहीं।
भीड़ से भरते टाइगर रिजर्व
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और भारतीय वन्यजीव संस्थान की 2022 की अखिल भारतीय बाघ गणना रिपोर्ट के अनुसार, पेंच में 77 और कान्हा में 105 बाघ हैं।
कान्हा के मुख्य क्षेत्र में 940 वर्ग किलोमीटर में 105 बाघ हैं। यानी लगभग 11 बाघ प्रति 100 वर्ग किलोमीटर। पेंच के मुख्य क्षेत्र में 411 वर्ग किलोमीटर में 77 बाघ हैं। यानी लगभग 18 बाघ प्रति 100 वर्ग किलोमीटर। 2018 की एनटीसीए रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह के वन क्षेत्र की वहन क्षमता 6 से 10 बाघ प्रति 100 वर्ग किलोमीटर मानी जाती है।

सतपुड़ा फाउंडेशन के उपनिदेशक मंदार पिंगले का कहना है कि बालाघाट की ओर बाघों का जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो टाइगर रिजर्वों के मुख्य क्षेत्रों में बढ़ती भीड़ के कारण हो रही है।
उन्होंने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा, “कम उम्र के बाघों को आमतौर पर सबसे अच्छे बाघ आवासों से बाहर धकेल दिया जाता है। वे या तो रिजर्व के बफर क्षेत्र में चले जाते हैं या फिर क्षेत्रीय वन मंडलों में पहुंचते हैं, जिन्हें हम कॉरिडोर कहते हैं।”
पिंगले ने कहा कि इन कॉरिडोरों का उपयोग सामान्य तौर पर अस्थायी रूप से होना चाहिए। बाघ कुछ समय यहां बिताते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं।
उन्होंने इन क्षेत्रों की तुलना “स्टेपिंग स्टोन” यानी बीच के पड़ावों से की। उनका कहना है कि इन पड़ावों को वन्यजीव अभयारण्यों में बदला जाना चाहिए।
2022 की अखिल भारतीय बाघ गणना रिपोर्ट के अनुसार, मध्य भारत और पूर्वी घाट के कई रिजर्वों, जिनमें कान्हा, बांधवगढ़, पेंच और ताडोबा शामिल हैं, में बाघों की संख्या 2018 के 1,033 से बढ़कर 2022 में 1,161 हो गई। यानी केवल चार वर्षों में लगभग 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2014 से 2018 के बीच मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या 71 प्रतिशत और महाराष्ट्र में 64 प्रतिशत बढ़ी थी।
द कॉर्बेट फाउंडेशन के निदेशक केदार गिरीश गोरे ने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा, “आज भारत के लगभग 35 प्रतिशत जंगली बाघ संरक्षित क्षेत्रों के बाहर रहते हैं।”
पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों की वापसी का नेतृत्व कर चुके भारतीय वन सेवा के अधिकारी आर. श्रीनिवास मूर्ति ने कहा, “जहां आवास की स्थिति बेहतर होती है, बाघ वहां रुकना शुरू कर देते हैं।”
उन्होंने कहा कि जो क्षेत्र पहले केवल आवाजाही का रास्ता था, वह अब एक स्थायी बाघ आबादी वाले क्षेत्र में बदल गया है।
मूर्ति ने कहा कि भारत में बाघ कई वर्षों से रिजर्वों के बाहर भी घूमते और प्रजनन करते रहे हैं।
उन्होंने कहा, “आप उत्तर, दक्षिण, पूर्व या पश्चिम कहीं भी देख लें, ऐसे कई कॉरिडोर मिलेंगे जहां बाघ प्रजनन कर रहे हैं और एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जा रहे हैं।”
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि चंद्रपुर का एक बाघ 600 किलोमीटर से अधिक दूरी तय कर संभाजीनगर तक पहुंच गया था। एक अन्य बाघ महाराष्ट्र से ओडिशा तक चला गया था। उन्होंने कहा, “बाघों का लंबी दूरी तय करना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।”
बालाघाट में ऐसा क्या है?
द कॉर्बेट फाउंडेशन के निदेशक केदार गिरीश गोरे ने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा, “बालाघाट केवल कान्हा और पेंच को ही नहीं जोड़ता, बल्कि छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व और महाराष्ट्र के नवगांव-नागजीरा टाइगर रिजर्व से भी महत्वपूर्ण जुड़ाव प्रदान करता है।”
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया की संरक्षण विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. दीप्ति गुप्ता ने कहा, “बालाघाट बड़े मांसाहारी वन्यजीवों, खासकर बाघ और तेंदुओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र है।”
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की रिपोर्ट के अनुसार, बालाघाट के कुछ हिस्सों में चीतल और सांभर की संख्या मध्य भारत के कुछ संरक्षित क्षेत्रों के बराबर या उनसे भी अधिक है। इनमें संजय-डुबरी टाइगर रिजर्व, वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व और गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान शामिल हैं।

बालाघाट में चीतल सबसे आम शिकार प्रजाति है। इसके बाद जंगली सूअर का स्थान है। सांभर और गौर की संख्या अपेक्षाकृत कम है।
बाघ जैसे शिकारी जानवर आमतौर पर सांभर और चीतल का शिकार करना पसंद करते हैं, लेकिन दोनों वन मंडलों में इनकी संख्या सीमित है।
कान्हा में प्रति वर्ग किलोमीटर लगभग 40 चीतल हैं। दक्षिण बालाघाट में यह संख्या 14 है, जबकि उत्तर बालाघाट में केवल 4 चीतल प्रति वर्ग किलोमीटर हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यही अंतर बाघों को मवेशियों की ओर धकेलता है।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के एक अलग और अभी अप्रकाशित अध्ययन में पाया गया कि कान्हा-पेंच कॉरिडोर में बाघों के भोजन का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मवेशियों से आता है।
मंदार पिंगले का कहना है कि जब बाघ संरक्षित क्षेत्रों से बाहर आते हैं तो उनका मवेशियों की ओर जाना एक स्वाभाविक स्थिति है।
उन्होंने कहा, “संरक्षित क्षेत्रों के बाहर मवेशी आसानी से उपलब्ध होते हैं। उनका शिकार करना भी आसान होता है क्योंकि उनमें जंगली जानवरों जैसी सतर्कता नहीं होती। वे शिकारी को देखकर उसी तरह नहीं भागते जैसे जंगली शिकार भागते हैं।”
उन्होंने कहा कि यह समस्या समय के साथ और बढ़ सकती है।
“जब नई पीढ़ी के बाघ मवेशियों का शिकार करने की आदी हो जाती है, तो वे जंगली शिकार की तुलना में मवेशियों को ज्यादा पसंद करने लगते हैं।”
बढ़ते खतरे
रिपोर्ट के अनुसार, बालाघाट के जंगलों पर चार बड़े दबाव तेजी से बढ़ रहे हैं और संरक्षण के प्रयास उनकी गति के साथ नहीं चल पा रहे हैं।सड़कें और रेलवे लाइनें सीधे जंगलों के बीच से गुजर रही हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-543 इस वन मंडल के भीतर लगभग 77 किलोमीटर तक जाता है। जबलपुर, बालाघाट और गोंदिया को नैनपुर के जरिए जोड़ने वाली रेलवे लाइन भी वन्यजीवों की आवाजाही को प्रभावित करती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जब भी वन क्षेत्र में कोई नया ढांचागत प्रोजेक्ट प्रस्तावित हो, तो भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के दिशा-निर्देशों के अनुसार स्थान विशेष के उपाय अपनाए जाने चाहिए।

बालाघाट में मलांजखंड तांबा खदान स्थित है, जो भारत का सबसे बड़ा एकल तांबा भंडार है। यहां भरवेली मैंगनीज खदान भी है, जो एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत मैंगनीज खदान मानी जाती है। दोनों खदानें वन क्षेत्रों के पास स्थित हैं। रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि सूर्यास्त से सूर्योदय के बीच खनिजों का परिवहन बंद किया जाए और महत्वपूर्ण वन्यजीव क्षेत्रों में नई खनन पट्टियां आवंटित न की जाएं।
जंगल में लैंटाना जैसी बाहरी पौध प्रजातियां भी तेजी से फैल रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ये पौधे स्थानीय घासों को दबा रहे हैं और शिकार प्रजातियों के लिए उपलब्ध आवास को कम कर रहे हैं। वन आग की घटनाएं इस समस्या को और गंभीर बनाती हैं।
रिपोर्ट में आग वाले संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, समुदाय आधारित शुरुआती चेतावनी व्यवस्था और बाहरी पौध प्रजातियों को हटाने जैसे कदमों की सिफारिश की गई है। इन उपायों को व्यापक आवास सुधार कार्यक्रम का हिस्सा बनाने की बात कही गई है।
संरक्षित क्षेत्रों के बाहर की चुनौतियां
टाइगर रिजर्व से बाहर निकलने के बाद बाघ खेतों, बिजली के तारों और लोगों के बीच पहुंच जाते हैं। नवंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच बांधवगढ़ और उसके आसपास आठ बाघों की मौत हुई। इनमें से चार बाघों की मौत अवैध बिजली के करंट से हुई। किसानों ने अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए खेतों के आसपास बिजली वाले तार लगा रखे थे।
वर्ष 2023 में मध्य प्रदेश में 55 बाघों की मौत दर्ज की गई, जो देश के किसी भी राज्य में सबसे अधिक थी। उसी वर्ष देशभर में कुल 166 बाघों की मौत हुई थी। इनमें से लगभग 60 प्रतिशत मौतें संरक्षित क्षेत्रों के बाहर हुईं।
पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों की वापसी का नेतृत्व कर चुके भारतीय वन सेवा के अधिकारी आर. श्रीनिवास मूर्ति ने कहा कि करीब डेढ़ साल पहले बालाघाट में शिकार की एक घटना हुई थी, जिसे अधिकारियों ने दबाने की कोशिश की थी।
उन्होंने कहा, “वन रक्षकों ने मामले को दबाने की कोशिश की। यहां तक कि लापरवाही के कारण डीएफओ के खिलाफ भी आरोप पत्र जारी किया गया था, क्योंकि मामला अदालत तक नहीं पहुंचाया गया था।”
बालाघाट जैसे क्षेत्रीय वन मंडल उन बाघों को जगह देते हैं जो भीड़भाड़ वाले टाइगर रिजर्वों से बाहर निकलते हैं। लेकिन ऐसे क्षेत्रों को भी वही सुरक्षा, कर्मचारी और शिकार प्रजातियों की बहाली की जरूरत है जो टाइगर रिजर्वों को मिलती है।
“ब्रिजिंग द गैप 2024” प्रबंधन प्रभावशीलता रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 20 टाइगर रिजर्वों में शिकार रोकने वाले पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं। दस रिजर्वों में कर्मचारियों की संख्या कम से कम 40 प्रतिशत तक घट चुकी थी।
मूर्ति ने कहा, “मैदान स्तर पर प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी है। मुख्यालयों में भी यही स्थिति है। प्रशिक्षित और अप्रशिक्षित अधिकारी के बीच का अंतर समय के साथ दिखाई देता है और यही अंतर कई बार जान बचाने या गंवाने का कारण बन सकता है।”
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया की डॉ. दीप्ति गुप्ता ने कहा कि क्षेत्रीय वन का दर्जा होने के कारण वन्यजीवों के प्रबंधन और निगरानी के लिए जरूरी वित्तीय संसाधन सीमित हो जाते हैं।
रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि बालाघाट को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के “टाइगर्स आउटसाइड टाइगर रिजर्व्स” कार्यक्रम के तहत प्राथमिकता वाला क्षेत्र घोषित किया जाए। ऐसा होने पर सुरक्षा ढांचे और कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने के लिए विशेष फंड उपलब्ध हो सकेगा।
मूर्ति का कहना है कि किसी क्षेत्र को संरक्षित घोषित कर देना ही पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, “जैसे ही किसी क्षेत्र को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाता है, कई तरह की पाबंदियां लागू हो जाती हैं। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि वहां रहने वाले लोग इसके लिए तैयार हैं या नहीं।”
उन्होंने कहा कि अगर कोई बाघ गांव में पहुंचता है तो तुरंत बचाव दल उपलब्ध होना चाहिए। साथ ही यदि किसी तरह का मानव-वन्यजीव संघर्ष होता है तो प्रभावित लोगों को समय पर मुआवजा मिलना चाहिए।
मई 2025 में मध्य प्रदेश राज्य वन्यजीव बोर्ड ने दक्षिण बालाघाट के 163 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले सोनवानी संरक्षण रिजर्व को औपचारिक संरक्षित क्षेत्र के रूप में मंजूरी दी।
मंदार पिंगले का कहना है कि बालाघाट यह परखने का अवसर है कि क्या भारत का बाघ संरक्षण मॉडल टाइगर रिजर्व की सीमाओं से आगे बढ़ सकता है। उन्होंने कहा, “हम केवल अलग-अलग राष्ट्रीय उद्यानों या टाइगर रिजर्वों के भरोसे नहीं रह सकते।” “हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ये कॉरिडोर सुरक्षित रहें और टाइगर रिजर्व आपस में अच्छी तरह जुड़े रहें।” उन्होंने कहा, “इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।”
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
यह भी पढ़ें
रीवा के जंगल में हाथी, ग्रामीण और विभाग दोनों के लिए परेशानी का सबब
छत्तीसगढ़ के जंगलों में ‘हाथी मित्रों’ के भरोसे सुलगती ज़िंदगी: जुनून, जोखिम और ₹10,000 का संघर्ष
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।
Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India
We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.
Connect With Us
Send your feedback at greport2018@gmail.com
Newsletter
Subscribe our weekly free newsletter on Substack to get tailored content directly to your inbox.
When you pay, you ensure that we are able to produce on-ground underreported environmental stories and keep them free-to-read for those who can’t pay. In exchange, you get exclusive benefits.
Your support amplifies voices too often overlooked, thank you for being part of the movement.




