दुनिया का हर चौथा व्यक्ति सुरक्षित पेयजल से वंचित, नीट परीक्षा के दौरान बनेंगे ‘कूलिंग ज़ोन’, मुंबई में गहराया जल संकट, टाटा केमिकल्स के खिलाफ गुजरात हाईकोर्ट का आदेश। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 2.1 अरब लोग (हर चौथा व्यक्ति) अभी भी सुरक्षित पेयजल से वंचित हैं। इनमें 10.6 करोड़ लोग सीधे नदियों, तालाबों और अन्य असुरक्षित सतही जल स्रोतों का पानी पीने को मजबूर हैं।
दिल्ली सरकार ने 21 जून को होने वाली नीट परीक्षा के दौरान 97 परीक्षा केंद्रों पर अभिभावकों के लिए विशेष ‘कूलिंग ज़ोन’ बनाने का निर्णय लिया है। यहां छाया, बैठने की व्यवस्था, ठंडा पानी, ओआरएस, शिकंजी, चाय और प्राथमिक उपचार जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
मुंबई को पानी देने वाले सात प्रमुख जलाशयों में जल भंडार 10 प्रतिशत से नीचे पहुंच गया है। कमजोर मानसून के कारण बीएमसी जुलाई से जलापूर्ति में अतिरिक्त 10 प्रतिशत कटौती लागू कर सकती है। पहले ही निर्माण कार्यों और स्विमिंग पूलों के लिए पानी की आपूर्ति पर प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं।
गुजरात उच्च न्यायालय ने टाटा केमिकल्स को गल्फ ऑफ कच्छ मरीन सैंक्चुअरी को हुए पर्यावरणीय नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराया है। अदालत ने ‘पॉल्यूटर पेज़’ सिद्धांत लागू करते हुए गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नुकसान का वैज्ञानिक आकलन करने और मुआवजे की राशि तय करने का निर्देश दिया है।
मध्य प्रदेश में अब तक औसत से 39% कम बारिश दर्ज की गई है, जबकि राजधानी भोपाल में सामान्य से 94% अधिक वर्षा हुई है। देश के 19 राज्यों में बारिश की कमी बनी हुई है, जिसमें गुजरात और महाराष्ट्र सबसे अधिक प्रभावित हैं।
मध्य प्रदेश के गांधी सागर अभयारण्य में जुलाई माह में दो चीते छोड़े जाएंगे और वन अपराधों की निगरानी के लिए भोपाल में एक अत्याधुनिक कंट्रोल सेंटर स्थापित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, सरकार ने इस मानसून में 5.40 करोड़ पौधे लगाने और तेंदूपत्ता संग्राहकों को बोनस देने की मंजूरी दी है।
विस्तृत चर्चा
आज की चर्चा में हमारे असोसिएट एडिटर वाहिद भट बता रहे हैं मानसून के महाराष्ट्र में अटकने का कारण। साथ ही हमारे एडिटर इन चीफ पल्लव जैन से जानिए पेड़ कटाई के नए विश्लेषण के बारे में।
महाराष्ट्र में मानसून अटकने का क्या है कारण?
मानसून 4 जून को केरल पहुंचा और शुरुआत में इसने कर्नाटक, गोवा और पश्चिमी तट के कुछ हिस्सों में तेजी से प्रगति की। हालांकि, 8 जून के बाद, महाराष्ट्र के पास पहुंचते ही इसकी गति काफी धीमी हो गई। परिणामस्वरूप, 1 जून से 17 जून के बीच भारत में औसत से 38% कम बारिश दर्ज की गई है।
सुस्त रफ्तार के मुख्य कारण
विशेषज्ञों ने इस “ठहरे हुए” मानसून के पीछे पांच प्राथमिक कारकों की पहचान की है:
अरब सागर की हवाओं का कमजोर होना: अरब सागर से आने वाली नमी से भरी हवाएं, जो मानसून को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक हैं, अपनी ताकत खो चुकी हैं।
उत्तर-पश्चिमी हवाओं का हस्तक्षेप: वर्तमान में उत्तर और उत्तर-पश्चिम दिशा से आने वाली शुष्क हवाएं महाराष्ट्र के ऊपर चल रही हैं। ये हवाएं एक “दीवार” की तरह काम करती हैं, जो नमी वाले बादलों को देश के आंतरिक हिस्सों में जाने से रोक रही हैं।
कमजोर क्रॉस-इक्वेटोरियल हवाएं: ये वे हवाएं हैं जो दक्षिणी गोलार्ध से अरब सागर के रास्ते भारत आती हैं। इस साल ये हवाएं काफी कमजोर हैं, जिससे मानसून को मिलने वाली गति प्रभावित हुई है।
निम्न दबाव प्रणालियों का अभाव: आमतौर पर, बंगाल की खाड़ी या अरब सागर में बनने वाले कम दबाव के क्षेत्र या चक्रवातीय परिसंचरण मानसून को आगे धकेलते हैं। फिलहाल, ऐसा कोई मजबूत सिस्टम सक्रिय नहीं है जो मानसून को सहारा दे सके।
प्रतिकूल वैश्विक पैटर्न (MJO): मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO)—जो दुनिया के उष्णकटिबंधीय इलाकों में घूमने वाला बादलों और हवाओं का एक पैटर्न है—वर्तमान में भारतीय मानसून के पक्ष में काम नहीं कर रहा है।
कृषि और क्षेत्रों पर प्रभाव
मानसून की इस धीमी गति के कारण कुछ क्षेत्रों में भारी कमी देखी गई है। महाराष्ट्र और गोवा में 80% से अधिक बारिश की कमी दर्ज की गई है, जबकि अन्य इलाकों में यह कमी 65% से 70% के बीच है।
यह देरी किसानों के लिए बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि फसलों की बुवाई काफी हद तक मानसून की बारिश पर निर्भर करती है। यदि देरी जारी रहती है, तो यह कृषि चक्र और कुल पैदावार को प्रभावित कर सकती है।
भविष्य का अनुमान
मौसम विभाग को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में मानसून धीरे-धीरे तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ की ओर बढ़ेगा। महाराष्ट्र के लिए 24 या 25 जून के आसपास कुछ बारिश की उम्मीद जताई गई है, हालांकि फिलहाल किसी बहुत मजबूत मानसूनी सिस्टम के संकेत नहीं हैं।
हालांकि मानसून की देरी का मतलब यह नहीं है कि पूरा सीजन खराब रहेगा; कभी-कभी देरी से आने वाला मानसून भी बाद में अच्छी बारिश कर सकता है। फिलहाल, किसान और आम जनता मानसून के अगले कदम का इंतजार कर रहे हैं।
3 साल में कटे 28 लाख से ज्यादा पेड़
डाउन टू अर्थ ने सरकारी फॉरेस्ट डायवर्जन रिकॉर्ड्स का एनालिसिस किया उससे पता चला है कि जुलाई 2023 और मई 2026 के बीच फॉरेस्ट लैंड पर 28 लाख से ज़्यादा पेड़ों को काटने की मंज़ूरी दी गई या उन्हें कटा हुआ दर्ज किया गया।
यह एनालिसिस ‘वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980’ के तहत बनाई गई एडवाइज़री कमेटी के मीटिंग मिनट्स पर आधारित है, जिन्हें केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पब्लिश किया था।
एनालिसिस से पता चला कि इनमें से 242 प्रपोज़ल को मंज़ूरी मिली, जिससे मंज़ूरी की दर 80 प्रतिशत से ज़्यादा रही। रिकॉर्ड्स से यह भी पता चला कि 22,000 हेक्टेयर से ज़्यादा फॉरेस्ट लैंड को नॉन-फॉरेस्ट्री प्रोजेक्ट्स (जैसे माइनिंग, हाइड्रोपावर और ट्रांसमिशन लाइन) के लिए डायवर्ट किया गया।
सबसे ज्यादा माइनिंग प्रोजेक्ट के भेंट चढ़े पेड़
इस तीन साल की अवधि में 27 सेक्टर में फॉरेस्ट लैंड को डायवर्ट किया गया।
काटने के लिए मंज़ूरी पाने वाले या काटे गए पेड़ों में सबसे ज़्यादा संख्या माइनिंग प्रोजेक्ट्स की थी, जो 1.35 मिलियन थी। इसके बाद हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स का नंबर था, जिनमें 0.93 मिलियन पेड़ शामिल थे, जबकि रिहैबिलिटेशन प्रोजेक्ट्स में 0.23 मिलियन पेड़ शामिल थे।
इन तीनों सेक्टरों को मिलाकर, फॉरेस्ट डाइवर्जन प्रपोज़ल के विश्लेषण में दर्ज कुल पेड़ कटाई का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं का था।
छत्तीसगढ़ में सबसे ज़्यादा पेड़ों को काटने की मंज़ूरी दी गई। सरगुजा डिवीज़न में ‘केंटे एक्सटेंशन ओपनकास्ट कोल माइनिंग’ और ‘पिट-हेड कोल वॉशरी’ प्रोजेक्ट के लिए 4 लाख से ज़्यादा पेड़ों को काटने की मंज़ूरी दी गई।
यह विश्लेषण ऐसे समय में आया है जब देश में विकास परियोजनाओं को लेकर कई विरोध-प्रदर्शन हुए हैं; ये परियोजनाएं अक्सर उस इलाके के मूल निवासियों और स्थानीय लोगों के नुकसान की कीमत पर शुरू की जाती हैं। इससे पहले डाउन टू अर्थ की ही रिपोर्ट में बताया गया था कि 2016 और 2019 के बीच, MoEF&CC ने 69 लाख से ज़्यादा पेड़ों को काटने की मंज़ूरी दी थी।
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
पर्यावरण सिर्फ खबर नहीं, यह हमारी सांसों का सवाल है। ग्राउंड रिपोर्ट की कोशिश है कि इन मुद्दों को ज़मीनी स्तर पर उठाया जाए और चुनावी एजेंडे का हिस्सा बनाया जाए। अगर आप पर्यावरण पत्रकारिता को ज़रूरी मानते हैं, तो इस एपिसोड को शेयर करें और हमें अपना फीडबैक भेजें।
ग्राउंड रिपोर्ट का डेली इंवायरमेंट न्यूज़ पॉडकास्ट ‘पर्यावरण आज’ Spotify, Amazon Music, Jio Saavn, Apple Podcast, पर फॉलो कीजिए।






