तीन साल से इंदौर में रह रहे राजगढ़ (ब्यावरा) से आये दीपांशु मीणा के कुछ दोस्त पानी की कमी के चलते शहर छोड़कर घर लौट गए हैं। जो गांव कुछ साल पहले शहरी सीमा में शामिल किए वहां आज भी पानी की व्यवस्था नदारद है। शहर की हालत यह है कि लोगों के घर या तो खाली बर्तन पड़े है या फिर चंदा करके टैंकर की व्यवस्था की जा रही है।
लोग नेताओं से जवाबदेही मांगते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं, पार्षद-महापौर की कहासुनी हो रही है, चक्काजाम और एफ़आईआर भी हो रही है। मगर सबका नतीजा फिलहाल सूखे बोर, दौड़ते टैंकर और वापस घर लौटने को मजबूर लोग हैं।
विरोध में पार्षद-विधायक
इंदौर में यह मुद्दा तब गहराया जब विधानसभा क्षेत्र 05 के विधायक महेंद्र हार्डिया ने इंदौर नगर निगम को जल संकट के लिए दोषी ठहराते हुए सार्वजनिक आलोचना की। जबकि नगर निगम के मेयर और विधायक दोनों ही भारतीय जनता पार्टी से तअल्लुक़ रखते हैं।
यही नहीं वार्ड 26 के भाजपा पार्षद लालबहादुर वर्मा स्थानीय लोगों के साथ बीजेपी विधायक रमेश मेंडोला के घर के बाहर धरने पर बैठ गए। इस संकट की वजह से कुछ जगहों पर प्रॉपर्टी को नुकसान हुआ है और लॉ-एंड-ऑर्डर की दिक्कतें भी आईं। तापेश्वरी बाग जलाशय पर प्रदर्शनकारियों ने एक सरकारी हाइड्रेंट को नुकसान पहुंचाया, जिसके बाद नगर निगम को पुलिस में शिकायत दर्ज करवानी पड़ी। वार्ड 75 से कांग्रेस पार्षद कुणाल सोलंकी ने भी 24 मई को चक्का-जाम किया।
सोलंकी बताते हैं कि उनके वार्ड में अन्य राज्यों और आसपास के ग्रामीण इलाकों से आये मज़दूर परिवार रहते हैं। वह कहते हैं, “केवल दो कॉलोनी में नर्मदा लाइन है जहां दिन में 15 मिनट नर्मदा पाइप लाइन से पानी सप्लाई होता है बाकी पूरा क्षेत्र टैंकर भरोसे है।”
वो दावा करते हैं कि उनके क्षेत्र में रहने वाले 10% मज़दूर पानी की कमी के चलते अपने घर चले गए हैं। वह कहते हैं, “निगम का बजट 8500 करोड़ का है, उसके बावजूद बोरवेल, टैंकर और हाईड्रेन्ट की कमी है।” वहीं स्थानीय लोग कहते हैं कि उन्हें पैसे दे कर पानी लाना पड़ रहा है।
इंदौर के कुल 85 वार्ड के लिए नगर निगम 616 टैंकर सुलभ करवा रहा है। यानी एक वार्ड पर 7 टैंकर। लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट को प्राप्त हुई लिस्ट के अनुसार शहर में कई वार्ड हैं जहां केवल दो टैंकर मिलते हैं तो ऐसे वार्ड भी हैं जहां दस-बारह टैंकर दौड़ रहे है।

बोरवेल भी सूखे
इंदौर जिले में 05 नदियां कुल 348 किमी तक बहती हैं। 60 झीलें और तालाब 2767.37 हेक्टेयर में फैले हुए हैं। पानी के सोर्स के तौर पर जिले में लगभग 1 लाख 51 हज़ार 939 बोरवेल मौजूद हैं। जबकि शहर के ग्राउंडवॉटर सोर्स में 4945 ट्यूबवेल और 1004 हैंडपंप शामिल हैं।
इंदौर शहर के वार्ड 51 के पार्षद मलखान कटारिया बताते हैं कि 55 हज़ार की आबादी में कुल 115 बोरिंग है, लेकिन सिर्फ तीन-चार में ही पानी है।
वार्ड 74 के पार्षद प्रतिनिधि सुनील हार्डिया (53) हाईड्रेन्ट खोदाई की साइट पर मौजूद हैं। क्षेत्र में यह दूसरा हाईड्रेन्ट है। हार्डिया बताते हैं कि उनके वार्ड में पचास से ऊपर निजी और शासकीय बोरिंग सूख गए हैं।
वह कहते हैं, “पानी की व्यवस्था ज़रूरी है। वार्ड की आबादी तीस से पैंतीस हज़ार हैं, और इसके अतिरिक्त तीस हज़ार विद्यार्थी रहते हैं जो बाहर से पढ़ने आये हैं। सुबह से रात तक क्षेत्र में टैंकर चल रहे हैं।”
उनके वार्ड के अंतर्गत भंवरकुआं इलाका आता है जो छात्रों की आबादी के लिए जाना जाता है। यहां रहने वाले दीपांशु मीणा का कहना है कि टैंकर महंगे हो रहे हैं और मकान मालिकों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। हर महीने 6-7 हज़ार का निर्धारित बजट आता है मह्गर पानी की कमी ने खर्च हज़ार रुपया महीना बढ़ा दिया है। छात्रों को सार्वजनिक शौचालय जाना पड़ रहा है।
यह समस्या अप्रैल महीने से ही हो रही है। छात्र हर कहीं पानी लेने नहीं जा पाते। पानी दूषित आता है तब भी काम चलाना पड़ता है।
शाम में कई कोचिंग क्लास जब बंद हो जाती है उसके बाद बाहर विद्यार्थियों की लंबी कतार लगी रहती है। हाथ में बोतल, कैन, जार और पानी भरने की तमाम चीज़ें होती हैं। कुछ कोचिंग क्लास इलाके में निःशुल्क जल वितरण कर रही हैं।
पीजी-हॉस्टलों वाले इस इलाके में पानी की समस्या बारह महीने की दिक्कत हो गयी है। एक अन्य छात्र रविराज बताते हैं, “बिल्डिंग में ख़राब वाटर कूलर और आरओ है। एक टैंकर, दो बिल्डिंग और 50-60 विद्यार्थी! क्या होगा एक टैंकर में? नहाने-खाने तक के लिए पानी नहीं है।”
ऐसे में 24 मई तक इंदौर नगर निगम के पास सीएम हेल्पलाइन द्वारा पानी की सक्रिय शिकायतों की संख्या 2437 हो गयी। इस फेहरिस्त में आगे वार्ड 75 बारह साल पहले ही इंदौर शहर में शामिल हुआ है। मगर यहां आज भी मूलभूत शहरी सुविधाएं- सड़क, बिजली, ड्रैनेज और पानी के इंतज़ाम नहीं हैं। यह इलाका औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों से भरा है। गौरतलब है कि ऐसे कुल 29 गांव बारह साल पहले शहरी सीमा में शामिल हुए थे।

अधूरे काम, सूखे नल और पानी का बिल
वार्ड 64 की अंसारी कॉलोनी और एकमात्र चलने वाले हैंडपंप के बीच एक लंम्बी दौड़ती सड़क है जिस पर दिन भर भारी वाहन निकलते हैं। यानि पानी लाना सहज नहीं है। ऐसे में यहां हर दूसरे दिन टैंकर के लिए चंदा होता है। 1000-1500 का टैंकर आता है मगर मुश्किल से सभी घरों में पानी मिलता है।
इसी वार्ड के श्रीराम नगर के रहवासी राहुल गांगले (30) बताते हैं, “सालों से नर्मदा लाइन मांग रहे हैं लेकिन आज तक नहीं मिली। पानी का एक टैंकर भले रोज़ आ रहा है, लेकिन फिर भी पानी की मगजमारी है।”
यहां मज़दूरी कर रात को आते ही लोग गाड़ी पर छह-सात पानी की कैन ढो कर पानी ढूंढने जाते हैं।
नर्मदा की पाईप लाइन पर शिकायत का यह अकेला मामला नहीं है। वार्ड 52 के पार्षद प्रतिनिधि सुदामा चौधरी कहते हैं, “कई जगहें हैं जहां नर्मदा की लाइन का काम हो गया है लेकिन नगर निगम अभी तक उसे जोड़ने का काम नहीं कर पाया।” वहीं वार्ड 64 के लोगों ने बताया कि उनके इलाके में नर्मदा पाइपलाइन का काम पूरा हुए पांच साल हो गए हैं लेकिन आज तक कनेक्शन नहीं जोड़ा गया।
गौरतलब है कि नर्मदा पाइप लाइन से शहर को हर दिन 360 एमएलडी पानी सप्लाई होता है।

संकट अप्रत्याशित नहीं
वॉटर कंज़र्वेशन एक्सपर्ट सुरेश एमजी का मानना है कि शहर के जल संकट की कई वजहे हैं। वह कहते हैं, “मालवा बेसाल्टिक क्षेत्र है। जियोलाजिकल रेसिस्टिविटी सर्वे किये बिना बोरिंग खोद देते हैं। पानी नहीं निकलता, पैसा बर्बाद होता है और ज़मीन को नुकसान पहुंचता है।”
वो कहते हैं, “शहर कंक्रीट का है तो ज़मीन में पानी जाने की कोई जगह नहीं बची है। अधिकारीयों का बार-बार बदलना और अनुभव की कमी पानी के समुचित प्रबंधन पर मार करती है। शहर में हरित क्षेत्र की अनियंत्रित कटाई और पानी की बर्बादी भी वजह है।”
उनके अनुसार वर्षा जल संचयन और पानी को प्राथमिकता कभी भी नीतियों और योजनाओं का हिस्सा नहीं रही जिसके चलते यह हालात निर्मित हुए हैं।
इंदौर में बढ़ता जल संकट और शहरवासियों के हालात अनूठे नहीं है बल्कि देश के कई हिस्सों का प्रतिबिंब है। असामान्य गर्मी और तापमान ने यह स्थिति मुश्किल कर दी है। ऐसे में इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि किसी भी परियोजना या नीति में शासन–प्रशासन को पर्यावरण को केंद्र में रखकर ही सोचना होगा।
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
यह भी पढ़ें
क्या किसान और व्यापारियों की मुसीबत हल कर सकेगा कपास मिशन 2026?
एफपीओ: साथ आए तो बढ़ी आमदनी, मिलकर करोड़ों कमा रहे ये किसान
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।



