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न अधिकारी न किसान, फाइलों में बुने जा रहे ‘रेशमी सपने’

प्रदेश में कई जिलों में रेशम केंद्र स्थापित किए गए हैं। इनको लेकर कई सरकारी दावे और आंकड़े भी हैं। मगर ज़मीनी हकीकत इनसे जुदा है।
Silk Production MP Rajgarh Sericulture story

गोपालपुरा गांव की रंभा बाई पिछले 7-8 वर्षों से राजगढ़ जिले के सारंगपुर में स्थित रेशम केंद्र से जुड़ी हैं। वो और उनके पति पहले विभाग में मजदूरी पर काम करते थे। मगर 2021 में उन्हें रेशम उत्पादन के लिए संचालित सिल्क समग्र योजना का हितग्राही बना दिया गया। दोनों एक हेक्टेयर में रेशम उत्पादन का काम करने लगे। मगर 3 महीने पहले पति की मौत के बाद अब वो यह काम अकेले संभालती हैं।  

रंभा बाई बताती हैं कि उन्हें यहां काम करते हुए सुबह से शाम हो जाती है। वह कहती हैं, “सौ बीज से पैदा होने वाले कृमि की पत्तियां एक इंसान अकेले नहीं काट सकता। गर्मी के कारण कृमि ज्यादा मरते हैं, जिससे समस्या आती है।” 

सरकारी दावों के बरक्स राजगढ़ और अन्य जिलों में भी रेशम उत्पादन का बुरा हाल है। आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में उत्पादन घट रहा है। जहां एक ओर केंद्र से राज्य सरकार को बजट बाकी राज्यों की तुलना में बेहद कम मिला है वहीं रेशम केंद्र और विभाग भी पर्याप्त कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं।

Sericulture cultivator Rajgarh MP
रंभा बाई कभी रेशम केंद्र में मज़दूर थीं मगर अब वो बतौर किसान इससे जुड़ी हुई हैं | राजगढ़ | फ़ोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

पहले जान लीजिए कैसे बनता है रेशम? 

रेशम बनाने की प्रक्रिया, जिसे सेरीकल्चर कहते हैं, मुख्य रूप से चार चरणों में पूरी होती है। इसकी शुरुआत शहतूत (मलबरी) या अर्जुन जैसे विशिष्ट पौधों की खेती से होती है, जिनकी ताजी पत्तियों को रेशम के कीड़े भोजन के रूप में खाते हैं। 

लगभग एक महीने तक निरंतर पत्तियां खाने के बाद ये कीड़े अपने मुंह से एक विशेष प्रोटीन (तरल) निकालते हैं जो हवा के संपर्क में आते ही महीन धागे का रूप ले लेता है। कीड़ा इस धागे को अपने चारों ओर लपेटकर एक सुरक्षा कवच बनाता है जिसे ककून (कोया) कहा जाता है। 

इसके बाद इन ककूनों को इकट्ठा कर पानी में उबाला जाता है ताकि रेशम के रेशे नरम हो जाएं और आसानी से अलग हो सकें। अंत में, इन बारीक रेशों को मशीनों या चरखों की मदद से खींचकर निकाला जाता है, इसे रीलिंग कहते हैं। फिर कताई व रंगाई के बाद करघों पर बुनकर शानदार रेशम का कपड़ा तैयार किया जाता है।

किसानों में रेशम के लिए कितना उत्साह?

रंभा बाई राजगढ़ के उन 30 हितग्राहियों में से एक हैं जो जिले में रेशम उत्पादन का काम करते हैं। 

वह साल भर में 200 किलो रेशम का उत्पादन कर लेती हैं। इसे वह मध्यप्रदेश सिल्क फेडरेशन को 200 से 250 रूपए प्रति किलो के भाव से बेचती हैं। हालांकि वह कहती हैं कि इस भाव में लागत निकालना मुश्किल होता है। वो मज़दूर के रूप में काम करने को बेहतर मानती हैं। 

मध्य प्रदेश के कुटीर एवं ग्रामोद्योग राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिलीप जायसवाल के अनुसार पिछले दो वर्षों में 2.64 लाख किलोग्राम मलबरी कोकून का उत्पादन किया गया है। मगर प्रदेश का कुल रेशम उत्पादन वर्ष 2018-19 के 100 मीट्रिक टन से गिरकर दिसंबर 2022 तक मात्र 15 मीट्रिक टन पर सिमट गया है।

राजगढ़ में कार्यरत जूनियर इंस्पेक्टर दिलीप जैन किसानों की बेरुखी और कम उत्पादन पर कहते हैं, “राजगढ़ में बढ़ते तापमान और पर्याप्त पानी व टेंपरेचर मेंटेन न होने से कृमि जिंदा नहीं रह पाता या उसे बीमारी लग जाती है, जिसका कोई इलाज नहीं है।” वे बताते हैं कि पहले विभाग निंदाई-गुड़ाई से लेकर मजदूरी तक सब करवाता था, लेकिन अब पूरी जिम्मेदारी किसान की है। विभाग केवल ‘चाकी अवस्था’ (कीटों की शुरुआती नाजुक अवस्था) तक साथ देता है।

दरअसल अब विभाग केवल शुरुआती 8-10 दिनों तक कीड़ों को पालकर किसान को सौंप देता है। उसके बाद की जिम्मेदारी पूरी तरह किसान की होती है। इस दौरान कीड़ों को पत्तियां खिलाते हुए उनको तय तापमान और नमी में विकसित करना पड़ता है। 

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किसानों और अधिकारियों के अनुसार बढ़ता तापमान रेशम के उत्पादन को प्रभावित कर रहा है | राजगढ़ | फ़ोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

मौसमी परिवर्तन और रेशम

शहतूत रेशम के कीड़ों को पालने के लिए सबसे सही और सबसे अच्छा तापमान 24ºC से 26ºC के बीच होता है। वहीं इन्हें 70 से 85% आर्द्रता की आवश्यकता होती है। रेशम के कीड़े एक्टोथर्मिक होते हैं, इसलिए वे मौसम के उतार-चढ़ाव और खराब हालात जैसे ज़्यादा तापमान के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। 

बहुत ज़्यादा गर्मी का तनाव लार्वा की ताकत और खाने की क्षमता पर बुरा असर डाल सकता है। हल्के तापमान में बढ़ोतरी होने पर, मेटाबोलिक एक्टिविटी बढ़ने से कीटों के बचने की दर बेहतर हो सकती है। मगर ज़्यादा तापमान में लंबे समय तक रहने से शरीर पर तनाव, इम्यूनिटी कम होना और बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

शहतूत रेशम चार तरह की बीमारियां ग्रासरी, फ्लैचेरी, मस्कार्डिन और पेब्राइन, का शिकार होता है। इसके मुख्य कारण भी तापमान और नमी में बदलाव हैं।  

डिप्टी डायरेक्टर योगेश परमार गिरते उत्पादन पर तर्क देते हैं कि,”यह पूरा काम पानी पर निर्भर है। राजगढ़ और गुना में पानी की समस्या है, इसलिए रुझान कम है। चंबल क्षेत्र में भी पानी न होने के कारण सेरीकल्चर है ही नहीं।”

एक कर्मचारी के भरोसे जिला

राजगढ़ जिले के सारंगपुर में स्थित रेशम केंद्र लगभग 50 एकड़ भूमि में फैला है। यहां एक अकेला तृतीय श्रेणी कर्मचारी ही पूरे जिले की बागडोर संभाल रहा है। वर्तमान में जो अधिकारी यहां तैनात हैं, उनके पास तीन-तीन जिलों का प्रभार है। 

जैन इसकी पुष्टि करते हुए कहते हैं “यहां पहले 10 से 12 लोगों का स्टाफ था, वर्तमान में पूरे जिले में मैं अकेला हूं। उत्पादन न होने पर हमारी सीआर खराब होती है। वह कहते हैं कि बीते कुछ सालों में रेशम उत्पादन की लागत बढ़ गई मगर कोकून के दाम नही बढ़े हैं।

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अधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि रेशम केंद्र अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो रहे हैं | राजगढ़ | फ़ोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

वहीं विभाग के एक रिटायर्ड अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि, “राजगढ़, उज्जैन, धार और गुना जैसे जिलों में उत्पादन न के बराबर है। संसाधनों की कमी है और बस कागजी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं। वरिष्ठ अधिकारी इन केंद्रों को बंद करना चाहते थे पर कुछ बदलावों के बाद ये चल रहे हैं। कोई अफसर ऐसा नहीं है जिसके पास 3-4 जिलों का चार्ज न हो।”

राजगढ़ के अलावा दूसरे जिलों में भी रेशम उत्पादन की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार इंदौर के चार में से दो रेशम केंद्रों पर ताले लग गए हैं। खबर के अनुसार बचे हुए दो केंद्रों में भी साल भर में 60 हज़ार का उत्पादन भी नहीं हो रहा है।

4000 करोड़ में प्रदेश के लिए 4 करोड़ भी नहीं

मध्य प्रदेश के कुटीर एवं ग्रामोद्योग राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिलीप जायसवाल के अनुसार प्रदेश के 3,600 मलबरी (शहतूत) एवं 850 टसर (कोसा) कोकून उत्पादक कृषकों को स्व-रोजगार से जोड़ा गया है। उनके अनुसार प्रदेश में दो वर्षों में रेशम संचालनालय द्वारा निजी क्षेत्र में 231 एकड़ क्षेत्र में एवं शासकीय रेशम केन्द्रों पर 200 एकड़ क्षेत्र में नवीन मलबरी पौधरोपण किया गया है।

मगर एक सच्चाई ये भी है कि 2020-21 में विभाग को रेशम उद्योग के विकास कार्यों के लिए आवंटित बजट का लगभग 60 प्रतिशत (59.58%) सरकार को वापस (सरेंडर) करना पड़ा। इसी तरह रेशम केंद्रों पर सिंचाई सुविधाओं के बजट का 50 प्रतिशत (50.70%) हिस्सा बिना उपयोग के ही सरकार को वापस (सरेंडर) करना पड़ा।

किसानों और बुनकरों की आय बढ़ाने और देश में सेरिकल्चल को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार सिल्क समग्र-2 योजना संचालित कर रही है। इसका उद्देश्य रेशम उत्पादन, उत्पादकता और गुणवत्ता को बढ़ाना है। 2021 से जनवरी 2026 के लिए केंद्र ने इस योजना के तहत कुल 4424.90 करोड़ रूपए के बजट का प्रावधान रखा है।

‘सिल्क समग्र-2’ योजना के तहत देश के 26 राज्यों को कुल 1374.44 करोड़ रूपए आवंटित किए गए हैं। मगर मध्यप्रदेश के हिस्से में मात्र ₹2.93 करोड़ रूपए ही आए। यह केरल (2.44 करोड़ रु) के बाद सबसे कम है। 

यानि रेशम के लिए न तो राज्य में पर्याप्त बजट है, न पर्याप्त खर्च हो रहा है और ना ही उत्पादन हो रहा है। 

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सरकार के आकांक्षी लक्ष्यों के बरक्स ज़मीन पर मिशन फेल होता हुआ दिखता है | राजगढ़ | फ़ोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

4 लाख किलोग्राम का लक्ष्य

राजगढ़ की इस बदहाल तस्वीर के बीच ‘बैतूल मॉडल’ एक उम्मीद की किरण है। बैतूल में प्रदान (PRADAN) जैसी संस्थाओं और रेशम विभाग के सहयोग से किसानों को महज ‘हितग्राही’ नहीं बल्कि ‘उद्यमी’ बनाया गया है। 

इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत ‘महिला रेशम समितियां’ (MRS) और ‘सीमांत कृषक शहतूत कृमि पालन संघ’ जैसे सहकारी समूह हैं। बैतूल में किसान ‘बैच रियरिंग’ (सामूहिक कृमि पालन) अपनाते हैं, जिससे पत्तियों के प्रबंधन का बोझ साझा हो जाता है। 

किसानों ने एक ‘आपातकालीन फंड’ बनाया है, जो बीमारी या मौसम से होने वाले नुकसान की भरपाई करता है। बैतूल मॉडल ने सामूहिक मार्केटिंग से किसानों की वार्षिक आय ₹40,000 से ₹1,00,000 तक सुनिश्चित की है।

राज्यमंत्री जायसवाल ने कहा कि आगामी तीन वर्षों में मलबरी कोकून उत्पादन में वर्तमान 1.50 लाख किलोग्राम से 4 लाख किलोग्राम स्तर तक वृद्धि की जायेगी। मलबरी पौधरोपण के क्षेत्र में अतिरिक्त नवीन 3500 एकड़ की वृद्धि की जाएगी। पचमढ़ी जिला नर्मदापुरम में रेशम इंटरप्रिटेशन सेंटर प्रारंभ होगा।

अब तक प्रदेश में 5 हजार कृषकों को नवीन कोकून उत्पादन तकनीकी से प्रशिक्षित किया गया है। आगामी तीन वर्षों में 6 हजार 200 हितग्राहियों को कौशल उन्नत प्रशिक्षण प्रदान करने की कार्य-योजना तैयार की गई है। 

मुख्यमंत्री की एक घोषणा के अनुसार ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन में ‘प्राकृत’ सिल्क शोरूम खोले जाएंगे। साथ ही पचमढ़ी के सिल्क टेक पार्क की तरह, रातापानी और अमरकंटक में भी इसी तरह के प्रोजेक्ट्स की संभावनाएं तलाशी जाएंगी। 

मगर जैन कहते हैं कि सरकार को रेशम के भाव पर ध्यान देना होगा। वह कहते हैं कि किसानों के मुनाफे को बढ़ाना होगा तभी इससे नए लोग जुड़ पाएंगे और योजना सफल हो पाएगी।

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  • Abdul Wasim Ansari is an independent journalist based in Rajgarh, Madhya Pradesh, bringing nearly a decade of experience in journalism since 2014. His work focuses on reporting from the grassroots level in the region.

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