यह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के डेली मॉर्निंग पॉडकास्ट का एपिसोड-198 है। बुधवार, 22 अप्रैल को देश भर की पर्यावरणीय ख़बरों के साथ पॉडकास्ट में जानिए अभयारण्यों पर चरवाहों की निर्भरता पर होने वाले अध्ययन और क्यों किसान गेहूं सस्ते दाम पर बेच रहे हैं?
मुख्य सुर्खियां
केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने सुझाव दिया है कि भारत को तेल आयात पर निर्भरता कम करने के लिए 100% एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखना चाहिए। सरकार जल्द ही ई-85 ईंधन के लिए नियम जारी कर सकती है।
केरल के गुरुवायूरा में हाथियों और मवेशियों के लिए मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल बनाने की योजना बनाई गई है। वंतारा की विशेषज्ञ टीम ने इसके लिए संभावनाओं की जांच की है।
केंद्र सरकार ने दिल्ली में गेहूं की खरीद फिर से शुरू करने के मुख्यमंत्री के अनुरोध को स्वीकार कर लिया है। लगभग पांच साल के अंतराल के बाद 24 अप्रैल से नरेला और नजफगढ़ मंडियों में खरीद शुरू होगी।
भोपाल में एनजीटी ने पेड़ों के चारों ओर किए गए कंक्रीटीकरण पर सख्ती दिखाई है। एनजीटी ने निर्देश दिया है कि पेड़ों की सुरक्षा के लिए उनके चारों ओर 1 मीटर की जगह खाली छोड़ी जाए।
सीहोर स्थित वीआईटी यूनिवर्सिटी में पिछले 10 दिनों में 250 से ज्यादा छात्र बीमार पड़ गए हैं। इनमें से 23 छात्रों की रिपोर्ट टाइफाइड पॉजिटिव आई है, जिसके बाद प्रबंधन ने एहतियातन छुट्टी घोषित कर दी है।
भोपाल में मौसम विभाग ने 10 जिलों में लू का अलर्ट जारी किया है। यहां रात के तापमान में गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन दिन का पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है।
विस्तृत चर्चा
संरक्षित वन और पशुपालकों के अधिकार
यह चर्चा इस मुद्दे पर केंद्रित है कि कैसे शहरीकरण और खेती के विस्तार के कारण चराई वाली भूमि कम हो गई है, जिससे घुमंतु समुदायों (Nomadic Tribes) की आजीविका संकट में आ गई है।
अध्ययन की पहल: ‘नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ’ की स्टैंडिंग कमेटी ने ‘वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया’ को निर्देश दिया है कि वह संरक्षित क्षेत्रों (Protected Areas) पर चरवाहों और घुमंतु समुदायों की निर्भरता पर एक विस्तृत अध्ययन करे। इस अध्ययन में कानूनी मुद्दों, सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक पहलुओं की जांच की जाएगी।
प्रभावित समुदाय और उनका महत्व: भारत में लगभग 1.3 करोड़ चरवाहे हैं जो 46 विभिन्न समूहों (जैसे गुर्जर, बकरवाल, भोटिया, गद्दी, रायका आदि) में बंटे हुए हैं। ये समुदाय डेयरी उत्पाद, मांस, ऊन और चमड़े के माध्यम से देश की पशुधन अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
पर्यावरणीय तर्क: चरवाहा समुदायों का तर्क है कि चराई से जंगलों को नुकसान नहीं बल्कि फायदा होता है, क्योंकि इसके बाद घास बेहतर ढंग से उगती है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में थार मरुस्थल से लेकर हिमालय के मैदानों तक ये चरवाहे 12 करोड़ हेक्टेयर भूमि का उपयोग करते हैं।
अध्ययन का उद्देश्य: यह अध्ययन मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में किया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य एक ऐसा सिस्टम बनाना है जिससे चराई के माध्यम से ‘हैबिटेट मैनेजमेंट’ भी हो सके और चरवाहों की आजीविका भी सुरक्षित रहे।
मध्य प्रदेश में गेहूं खरीदी की चुनौतियां
इस चर्चा में मध्य प्रदेश के किसानों द्वारा अपनी गेहूं की फसल को सरकारी समर्थन मूल्य से कम दाम पर बेचने की मजबूरी को रेखांकित किया गया है।
ई-उपार्जन सॉफ्टवेयर और कैपिंग: सरकार ने ई-उपार्जन सॉफ्टवेयर में ‘कैपिंग’ लागू कर दी है, जिसके तहत वर्तमान में केवल 2 हेक्टेयर (लगभग 5 एकड़) तक की जमीन वाले किसानों का ही गेहूं खरीदा जा रहा है। इससे बड़े किसानों के स्लॉट बुक नहीं हो पा रहे हैं।
खरीदी की सीमा और विसंगतियां: एक केंद्र पर अधिकतम 1000 क्विंटल गेहूं खरीदने की सीमा तय की गई है। इसके अलावा, प्रति एकड़ वास्तविक उत्पादन 18-20 क्विंटल होने के बावजूद सरकार केवल 16 क्विंटल ही खरीद रही है।
सर्वेक्षण और सत्यापन की समस्याएं: फसल के डबल वेरिफिकेशन और गलत सेटेलाइट मैपिंग के कारण किसानों को भारी परेशानी हो रही है। सरकार दोबारा सर्वे की बात कह रही है, लेकिन किसानों का सवाल है कि फसल कटने के बाद यह कैसे संभव होगा।
बारदाने की कमी और गुणवत्ता: बारदाने की कमी के कारण खरीदी की तारीखें बार-बार आगे बढ़ाई गई हैं। अब सरकार लगभग 297 करोड़ रुपये खर्च कर 9 करोड़ बैग खरीद रही है, लेकिन इनकी गुणवत्ता को लेकर भी शिकायतें आ रही हैं, जिसकी जांच जारी है।आर्थिक प्रभाव: इन समस्याओं के कारण किसान मंडियों में व्यापारियों को गेहूं कम दाम (2100 से 2350 रुपये प्रति क्विंटल) पर बेचने को मजबूर हैं। मार्च से अब तक लगभग 4400 करोड़ रुपये का गेहूं व्यापारियों को बेचा जा चुका है।
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