फरवरी के आखिरी हफ्ते में मऊगंज रेंज की रेंज ऑफिसर वर्षा सिंह को सुबह 8:30 बजे एक खबर मिली। एक हाथी उनकी रेंज में घुस आया था। वर्षा, उनके स्टाफ और उनके रेंज के गांव वालों के लिए यह पहली बार था जब कोई जंगली हाथी उनके इलाके में प्रवेश कर गया। रीवा और मऊगंज के इस इलाके में हाथी का आना एक सामान्य घटना नहीं है। यह क्षेत्र वन्यजीव प्रबंधन के नक्शे पर हाथियों के लिए कभी नहीं रहा। लेकिन पिछले एक महीने से भरत नाम का नर हाथी और उसका एक साथी इन जंगलों में भटक रहे हैं। और यह भटकना अब एक बड़े संकट की आहट बन गई है।

यह रास्ता नया है
दरअसल, मध्य प्रदेश में हाथियों की मौजूदगी अपेक्षाकृत नई है, दूसरी ओर इसका स्वरूप बदलता रहा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा जारी हालिया हाथी जनगणना रिपोर्ट में इसका जिक्र है। रिपोर्ट के मुताबिक़ मुगलकालीन अभिलेख बताते हैं कि 16वीं से 17वीं सदी में राज्य में हाथी पाए जाते थे, हालांकि 20वीं सदी की शुरुआत तक वे लगभग विलुप्त हो गए थे। इसके बाद लंबे अंतराल के बाद छत्तीसगढ़ से सटे जिलों सीधी, सिंगरौली और शहडोल में हाथियों की आवाजाही फिर से शुरू हुई, जहां वे आमतौर पर 2 से 3 महीने रुककर वापस लौट जाते थे।
लेकिन 2017 में स्थिति बदली, जब सात हाथियों का एक समूह मध्य प्रदेश से वापस नहीं लौटा और सीधी के संजय डुबरी टाइगर रिजर्व में ही रहने लगा। इसके बाद 2018 में करीब 40 हाथियों का एक और झुंड उमरिया के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व पहुंचा, जो अब बढ़कर लगभग 50 के आसपास हो चुका है। 2021 से 2022 के दौरान 10 से 12 हाथी अनूपपुर और डिंडोरी के रास्ते कान्हा टाइगर रिजर्व और फेन वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी तक पहुंचे, हालांकि ये समूह कुछ महीनों बाद वापस छत्तीसगढ़ लौट गया।
वर्तमान में मध्य प्रदेश में हाथियों की स्थायी मौजूदगी मुख्यतः बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व तक सीमित है, जबकि संजय डुबरी, सीधी, अनूपपुर, शहडोल और डिंडोरी के वन क्षेत्रों में उनकी अस्थायी आवाजाही बनी रहती है। राज्य में हाथियों की कुल संख्या 97 आंकी गई है।
एक सदी तक हाथियों की अनुपस्थिति के कारण स्थानीय समुदायों और वन अमले में उनके प्रबंधन का अनुभव भी सीमित है, जो स्थिति को और जटिल बनाता है।
अगर हालिया घटना के लिहाज से देखा जाए तो मऊगंज एक नया जिला है। यहां का भूगोल समझना जरूरी है। यह इलाका विंध्य पठार के उस हिस्से में पड़ता है जहां पहाड़, खड्ड और छोटे-छोटे गांव एक-दूसरे से उलझे हुए हैं। सड़कें कम हैं, पगडंडियां ज्यादा और जंगल बेहद सीमित।

भारत सरकार के ई-ग्रीन वॉच पोर्टल के आंकड़े बताते हैं कि मऊगंज में कुल 1,86,688 हेक्टेयर क्षेत्र में से केवल 14 हेक्टेयर संरक्षित वन है। वर्षा सिंह इसे सीधे शब्दों में कहती हैं। “मऊगंज में अधिकांशतः डिग्रेडेड और फ्रेग्मेंटेड फॉरेस्ट है।”
वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे कहते हैं कि इस स्थिति में हाथी खतरे में है। उनके शब्दों में, “क्षेत्र के जंगलों में भोजन और पानी की पर्याप्त उपलब्धता नहीं दिखती। इसीलिए हाथी बार-बार आबादी की ओर आ रहा है।”
महीने भर से ट्रैकिंग कर रहे वन कर्मी बताते हैं कि भरत का स्वास्थ्य गिर रहा है। वहीं मलकपुर गांव के राम गिरि गोस्वामी के गांव में हाथी तीन बार आ चुका है। वे बताते हैं, “पहले हाथी शांति से निकल जाता था। अब वह गुस्से से देखता है।”

एक महीने की भटकन
25 फरवरी से शुरू हुई यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। भरत को रेडियो कॉलर किया गया है लेकिन उसकी लोकेशन मिलना भी हमेशा आसान नहीं होता। वर्षा सिंह बताती हैं, “कई बार ऐसी स्थिति होती है कि हाथी हमारे सामने होता है और ट्रैकिंग डिवाइस पर उसकी लोकेशन नहीं मिलती।”
भरत मलकपुर, कांड़ी और बहेरा डाबर से होते हुए चुरहट रेंज तक गया। फिर रीवा। फिर वापस मऊगंज। 16 मार्च से वन बल लगातार उसे ट्रैक कर रहा है। 20 मार्च को वर्षा सिंह ने बताया कि वे पांच दिनों से ठीक से सोई नहीं हैं। 23 मार्च को भरत फिर रीवा चला गया। 30 मार्च तक वह वहीं था। इस पूरे रास्ते पर उसने जो निशान छोड़े हैं, वे टूटी बाड़ों, खराब हुई फसलों और डरे हुए लोगों की शक्ल में हैं। इसकी एक मिसाल मऊगंज के कांड़ी गांव से मिल सकती है।

मऊगंज के कांड़ी गांव तक सड़क नहीं जाती। पगडंडी से चढ़ाई करके पहुंचना पड़ता है। गांव के आखिरी छोर पर अशोक तिवारी की बगिया है। एक रात हाथी उनकी बगिया से गुजरे और 50 केले के पेड़ उखाड़ गए। गन्ने की फसल भी बर्बाद हुई। घर का एक कोना टूट गया।
उस रात अशोक ने खेत के पास आग जलाई। भाई रामशंकर ने टॉर्च से रोशनी की। तब जाकर हाथी हटा। अशोक कहते हैं, “हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।”
केसरा गांव के शंकर्षण पांडेय अपना घर छोड़ चुके हैं। वे परिवार और मवेशियों को लेकर घाट के नीचे बैठे हैं। महुआ बीनने नहीं जा पा रहे। बोलते हैं, “हाथी की वजह से डर का माहौल है।”
टकराव जो होना ही था
ग्रामीणों द्वारा किए जा रहे इन उपायों से वन विभाग वाकिफ है। वर्षा सिंह कहती हैं, “हम लोगों को यही समझाते हैं कि वे घरों में रहें, शोर न मचाएं और ऐसा कुछ न करें जिससे जानवर आक्रामक हो जाए।” लेकिन गांव वाले अपनी और अपनी संपत्ति की सुरक्षा के लिए ये उपाय अपना रहे हैं। इससे टकराव की स्थिति भी पैदा हो चुकी है।

मिसाल के तौर पर 19 मार्च की रात भरत सीतापुर गांव पहुंच गया। सीतापुर में बाजार, सड़क घनी और बसाहट है। उस रात हाथी बाजार तक आ गया।
भीड़ जमा हो गई। लोगों ने टॉर्च जलाई। वन कर्मियों ने रोकने की कोशिश की मगर उन पर हमला हो गया। गांव वालों पर आरोप है कि भीड़ ने डिप्टी रेंजर भैय्या लाल तिवारी की वर्दी और बैज उतार लिए थे। वन विभाग की गाड़ी क्षतिग्रस्त हुई। सीतापुर की शकुंतला सिंह भदौरिया, जो खुद इस घटना की गवाह हैं, कहती हैं कि जब उन्होंने वन कर्मी को अपने घर में आश्रय दिया तो उनके हृदय रोगी पति बलवान सिंह पर भी हमला हुआ।

वर्षा सिंह के लिए यही सबसे कठिन काम है। वे कहती हैं कि हाथी को संभालने से कहीं ज्यादा मुश्किल भीड़ को संभालना है। लेकिन शंकर्षण पांडेय इसे अलग नजरिए से देखते हैं। वे कहते हैं, “वन विभाग खुद कुछ नहीं कर पा रहा और हमें अपना बचाव भी नहीं करने दे रहा।”
वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे की चिंता इसी बिंदु पर है। वे कहते हैं कि पटाखे, आग और टॉर्च जैसी गतिविधियां हाथी के आक्रोश को बढ़ाती हैं। यह सिलसिला मध्य प्रदेश में शुरू होने से पहले ही रोकना होगा।
करंट जो मारता है
मलकपुर के रघुवीर साकेत की समस्या अलग है। हाथी के आवागमन की वजह से वन विभाग बिजली कटवा देता है। तीन-तीन दिन बिजली नहीं रहती। पहाड़ पर बसे गांव में बिजली न हो तो पानी भरने की मोटर भी नहीं चलती। रघुवीर कहते हैं, “कम से कम दिन में 3-4 घंटे बिजली दी जानी चाहिए, ताकि हम पीने का पानी भर सकें।” उन्होंने बिजली विभाग से शिकायत की। सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज नहीं हुई।

संसद में दिसंबर 2024 को पर्यावरण मंत्रालय द्वारा पेश किए गए आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में देशभर में बिजली के करंट से 392 हाथियों की मौत हुई। 2019-20 में 76, 2020-21 में 65, 2021-22 में 57, 2022-23 में 100 और 2023-24 में 94 हाथी करंट से मारे गए।
अगर मध्य प्रदेश से सटे हुए राज्य छत्तीसगढ़ की बात की जाए तो वहां भी ऐसी घटनाएं प्रकाश में आई हैं। 2022-23 में वहां 9 और 2023-24 में 10 हाथी करंट से मरे।
आंकड़े जो डराते हैं
मोंगाबे हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में मानव-हाथी संघर्ष में पहली मौत 2018 में दर्ज हुई थी जब दो लोग मारे गए। 2020 में चार और 2021 में छह लोगों की जान गई। यह तब की बात है जब हाथी मुख्यतः बांधवगढ़ और संजय डुबरी के आसपास थे। अब वे रीवा-मऊगंज तक पहुंच गए हैं।

फोटो क्रेडिट: चंद्र प्रताप तिवारी
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा नवंबर 2024 में लोकसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि 2019-20 से 2023-24 के बीच पांच वर्षों में हाथियों के हमले से देशभर में 2,853 लोगों की मौत हुई। अकेले 2023-24 में 628 और 2022-23 में 610 लोग मारे गए। दूसरी तरफ इसी अवधि में करंट, ट्रेन, शिकार और जहर से 528 हाथी मारे गए।
क्या होगा अगर यह नहीं सुलझा?
दुबे के मुताबिक अगर नुकसान का मुआवजा तुरंत नहीं मिला तो लोग हाथियों के प्रति आक्रामक हो जाएंगे। वे कहते हैं, “केवल तकनीकी प्रबंधन पर्याप्त नहीं है। नागरिकों में विश्वास बनाना भी उतना ही जरूरी है।”
वर्षा सिंह ने सभी प्रभावित ग्रामीणों को मुआवजे का आश्वासन दिया है। लेकिन अशोक तिवारी बताते हैं कि अब तक सर्वे भी नहीं हुआ।

बांधवगढ़ में 10 हाथियों की मौत के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य स्तरीय हाथी टास्क फोर्स गठित करने और हाथी मित्र बनाने की घोषणा की थी। लेकिन रीवा-मऊगंज के वन बल के सामने जो चुनौती आज है, उसके लिए वह तैयारी अभी जमीन पर नहीं उतरी है। दुबे की मांग है कि भोपाल से वाइल्डलाइफ विशेषज्ञों को अभी फील्ड में उतरना चाहिए।

शंकर्षण पांडेय कहते हैं, “अगर हाथी यहां कुछ सप्ताह और रहा तो उसे गोली मार दी जाएगी। अब हमारे पास कोई चारा नहीं बचा।”
दूसरी ओर वर्षा सिंह का दावा है कि भरत सुरक्षित वापस जाएगा।
लेकिन इन दोनों दावों के बीच जमीन पर अभी भी कोई हल नहीं दिखता। एक हाथी अनजान जंगलों में भटक रहा है। वन विभाग का अमला हाथी की सुरक्षा के लिए प्रयासरत है। और गांव वाले ऐसे जानवर से डरे हुए हैं जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा।
रिपोर्टिंग के दौरान जमीनी सहयोग के लिए पत्रकार लवकुश पांडेय का आभार।
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