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गैस संकट के बीच वेस्‍ट ऑयल भट्टी से चल रहे रेस्‍टोरेंट, सस्‍ती लेकिन खतरनाक 

Desi waste engine oil bhatti
इंजन ऑयल से चलने वाली भट्टी, भोपाल में एक मैकेनिक द्वारा तैयार की गई देसी जुगाड़ है

ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच तनाव का असर अब मध्‍य प्रदेश के शहरों में दिखाने लगा है। तेल सप्‍लाई रूट्स के दवाब के चलते रसोई गैस (LPG) की उपलब्‍धता और कीमत दोनों प्रभावित हो रही हैं। ऐसे में लोग गैस के विकल्‍प तलाश रहे हैं। इसी तलाश में भोपाल में एक नया जुगाड़ मॉडल सामने आया है। भोपाल के कौसर हुसैन ने कबाड़ से एक ऐसी ऑयल भट्टी बनाई है। जो वेस्‍ट ऑयल (गाड़ि‍यों से निकला खराब ऑयल) से चलती है। यह भट्टी अब शहर के कई छोटे रेस्‍टोरेंट और ढाबों में इस्‍तेमाल होने लगी है। 

क्‍या है देसी ऑयल भट्टी 

इस्तेमाल किये जा चुके इंजन ऑयल से खाना बनता है इस भट्टी में, फोटो सनव्वर शफी, भोपाल
इस्तेमाल किये जा चुके इंजन ऑयल से खाना बनता है इस भट्टी में, फोटो सनव्वर शफी, भोपाल

यह एक देसी तकनीक है। जिसमें पाइप, लौहे के एंगल, ब्‍लोअर और टंकी का इस्‍तेमाल कर एक चैंबर तैयार किया जाता है। इसमें इस्‍तेमाल किया हुआ इंजन ऑयल या अन्‍य वेस्‍ट ऑयल डाला जाता है और हवा के दबाव से इसे जलाया जाता है। 

कौसर हुसैन बताते हैं, ”मैंने सोशल मीडिया पर ईरान का वीडियो देखा था, उसी से आइडिया मिला। भट्टी बिजली या बैटरी से चल सकती है और रेगुलेटर से आग को कम या ज्‍यादा किया जा सकता है।” 

कौसर दावा करते हैं, ”इस भट्टी का तापमान 900 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तक पहुंच सकता है। जिससे खाना जल्‍दी तैयार हो जाता है।” 

रेस्‍टोरेंट्स संचालकों को कैसे मिल रही राहत

रेस्टोरेंट संचालक भोपाल जो एलपीजी संकट के चलते अलग अलग विकल्पों की तलाश कर रहे हैं
रेस्टोरेंट संचालक भोपाल जो एलपीजी संकट के चलते अलग अलग विकल्पों की तलाश कर रहे हैं

गैस सिलेंडर की कमी के चलते कई रेस्‍टोरेंट संचालक सीम‍ित मात्रा में ही एलपीजी का इस्‍तेमाल कर रहे है। बाकी काम ऑयल भट्टी और पारंपरिक ईंंधनों (लकड़ी-कोयला) से किया जा रहा है। 

रेस्‍टोरेंट संचालक जसवीर सिंह बताते हैं, ”हमारे पास बड़ी संख्‍या में स्‍टाफ है। जो गांवों से यहां काम करने आए हैं। दुकान बंद नहीं कर सकते है। मजबूरी में यह रास्‍ता चुनना पड़ा।”   

सिंह आगे कहते हैं, ”पहले रोज 3 से 4 सिलेंडर लगते थे, अब 2 में काम चल जाता है। बाकी काम भट्टी से हो जाता है। गैस मिलना मुश्किल है और ब्‍लैक में बहुत महंगी है।” 

वहीं रेस्‍टोरेंट संचालक मारूफ कहते है, ”यह ऑयल भट्टी गैस सिलेंडर के मुकाबले सस्‍ती पड़ रही है। काम भी जल्‍दी हो जाता है और खाने के स्‍वाद में भी कोई अंतर नहीं है।” 

जबकि जसवीर सिंह कहते हैं कि वे भट्टी का इस्‍तेमाल ग्रेवी, चावल और उबालने वाले कामों में कर रहे है। 

नियम क्‍या कहते हैं ?

भोपाल के होटल संचालक रोटियां तैयार करते हुए
भोपाल के होटल संचालक रोटियां तैयार करते हुए

भारत में इस्‍तेमाल किया हुआ इंजन ऑयल खतरनाक कचरे ( hazardous waste) की श्रेणी में आता है। इसे संभालने और उपयोग करने के लिए सख्‍त नियम बनाए गए है। नियमों के मुताबिक वेस्‍ट ऑयल को केवल अधिकृत एजेंसि‍यां ही इकट्ठा और प्रोसेस कर सकती हैं। इसका उपयोग केवल नियंत्रित औद्योगिक इकाइयों (जैसे बॉयलर या सीमेंट प्‍लांट) में ही किया जा सकता है। खुले या अनि‍यमित तरीके से जलाना इसे नियमों के खिलाफ माना जाता है। 

इस मामले में मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB), भोपाल के क्षेत्रीय अधिकारी (RO) डॉ. एसएन द्विवेदी का रूख साफ है। वे कहते हैं, ”इसे खुले में या भट्टी में ईंधन के रूप में उपयोग करना पर्यावरण संरक्षण अधिनियम का सीधा उल्‍लंघन है। इससे निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्‍साइड और सल्‍फर जैसी गैसें हवा की गुणवत्ता को गंभीर रूप से खराब करती हैं।” 

उन्‍होंने नगर निगम के साथ मिलकर जल्‍दी ही निरीक्षण और कार्रवाई की बात भी कही है। 

हालांकि भोपाल रेस्‍टोरेंट एंड होटल्‍स एसोसिएशन, अध्‍यक्ष तेजकुलपाल सिंह पाली का कहना है कि कारोबारी मजबूरी में यह रास्‍ता अपना रहे हैं। वे आगे कहते हैं, ”कमर्शियल सिलेंडर महंगे हो गए हैं। डिलीवरी में 5 से 7 दिन की देरी हो रही है। दुकान बंद करेंगे तो किराया और स्‍टाफ को वेतन कैसे देंगे? सरकार को राहत देनी चाहिए।” 

वहीं रेस्‍टोरेंट चलाने के लिए खाद्य विभाग और नगर निगम से मिलने वाला NOC स्‍वच्‍छ ईंधन के आधार पर जारी किया जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ईंधन बदलने पर, सुरक्षा और प्रदूषण मानकों की दोबारा जांच जरूरी होती है। यानी बिना अनुमति इस तरह का बदलाव लाइसेंस पर भी सवाल खड़ा कर सकता है। 

कैसे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरनाक ?

यह सस्‍ती देसी तकनीक बड़े स्‍वास्‍थ्‍य जोखिम के साथ सामने आई है। श्वसन रोग विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि वेस्‍ट ऑयल जलने से निकलने वाला धुआं सामान्‍य ईंधन जैसा नहीं होता, बल्कि कई जहरीले तत्‍वों का मिश्रण होता है। शोध भी इस बात की पुष्टि करते हैं। PM2.5 इन इंडिया : हेल्‍थ इम्‍पेक्‍ट्स स्‍टडी के अनुसार, पीएम 2.5 जैसे महीन कण भारत में वायु प्रदूषण का बड़ा स्रोत हैं। इनका सीधा संबंध श्वसन रोग, दिल की बीमारि‍यों और समय से पहले मृत्‍यु से है। सबसे अधिक जोखिम किचन में काम करने वाले कुक और हेल्‍पर को है। जो रोज 8 से 10 घंटे इस धुएं के संपर्क में रहते हैं। 

निष्‍कर्ष 

भोपाल में वेस्‍ट ऑयल भट्टी एक सस्‍ता और आसान विकल्‍प बनकर उभरी है। लेकिन कानून, पर्यावरण और स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़े गंभीर सवाल भी खड़े हो गए है। गैस की किल्‍लत से राहत जरूर मिल रही है। परंतु यह राहत कितनी महंगी साबित होगी, यह तो आने वाला समय ही तय करेगा।

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  • Based in Bhopal, this independent rural journalist traverses India, immersing himself in tribal and rural communities. His reporting spans the intersections of health, climate, agriculture, and gender in rural India, offering authentic perspectives on pressing issues affecting these often-overlooked regions.

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