Skip to content

बाघों के कॉरिडोर के करीब कोयला खनन को मंजूरी पर उठते सवाल

Image
प्रस्तावित खनन क्षेत्र का जंगल, जहां परियोजना के लिए 1753 पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव रखा गया है।

मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में स्थित बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व को घुंघुटी वन परिक्षेत्र से गुजरने वाला वाइल्डलाइफ कॉरिडोर छत्तीसगढ़ के अचनकमार टाइगर रिज़र्व से जोड़ता है। केंद्र सरकार की वन सलाहकार समिति (FAC) ने इस कॉरिडोर के मुहाने के पास भूमिगत कोयला खनन को सैद्धांतिक मंजूरी (Stage-1 Clearance) दे दी है। इस निर्णय से पर्यावरणविदों, वन्यजीव विशेषज्ञों और संरक्षण कार्यकर्ताओं में भारी नाराज़गी है।

क्या है पूरा मामला

यह मामला मध्य प्रदेश के उमरिया जिले की पाली तहसील के घुंघुटी वन परिक्षेत्र का है। यहां पथोरा वेस्ट कोल ब्लॉक (सोहागपुर कोलफील्ड) के लिए खनन की योजना बनाई गई है। इसके लिए मेसर्स श्री बजरंग पावर एंड इस्पात लिमिटेड ने कुल 149.6878 हेक्टेयर वन भूमि मांगी थी।

इसमें से 130.187 हेक्टेयर जमीन का उपयोग भूमिगत खनन के लिए किया जाएगा। वहीं 19.50 हेक्टेयर जमीन का उपयोग सतही अधिकारों (Surface Rights) के लिए होगा। इसमें सड़क, ऑफिस, कोयला डंप और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए जाएंगे।

यह प्रस्ताव 22 जनवरी 2026 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की सलाहकार समिति के सामने प्रस्तुत किया गया। समिति के सामने रखे गए दस्तावेज़ों में राज्य सरकार ने माना कि इस क्षेत्र में बाघ, तेंदुआ, स्लॉथ बियर और चीतल जैसे वन्यजीव नियमित रूप से दिखाई देते हैं।

हैरानी की बात यह है कि राज्य सरकार स्वयं स्वीकार करती है कि प्रस्तावित खदान क्षेत्र बांधवगढ़-अचनकमार वन्यजीव गलियारे से सटा हुआ है। प्रस्तावित खदान क्षेत्र से घुंघुटी वाइल्डलाइफ कॉरिडोर केवल 0.5 किलोमीटर (500 मीटर) दूर है। यही स्थानीय घुंघुटी कॉरिडोर आगे चलकर संवेदनशील बांधवगढ़-अचनकमार वन्यजीव गलियारे से जुड़ता है, जो लगभग 7.1 किलोमीटर दूर है।

पथोरा वेस्ट कोल ब्लॉक का स्थान मानचित्र, जो उमरिया जिले के घुंघुटी वन परिक्षेत्र में स्थित है और बांधवगढ़–अचनकमार वन्यजीव कॉरिडोर के पास पड़ता है।

इस स्पष्ट स्वीकारोक्ति के बावजूद, 22 जनवरी 2026 को हुई बैठक में समिति ने मेसर्स श्री बजरंग पावर एंड इस्पात लिमिटेड के पक्ष में फैसला दिया। कंपनी को 149.6878 हेक्टेयर (लगभग 370 एकड़) वन भूमि के डायवर्जन की सिफारिश मिल गई।

कॉरिडोर से सटा होना ही रेड फ्लैग था, फिर मंजूरी कैसे?

वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में दशकों से काम कर रहे विशेषज्ञ इस फैसले से नाराज़ हैं। उनका कहना है कि सरकार ने अपने ही बनाए नियमों को नजरअंदाज कर दिया। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि दो टाइगर रिज़र्व को जोड़ने वाले गलियारों के आसपास किसी भी तरह की भारी औद्योगिक गतिविधि को प्रतिबंधित या अत्यधिक नियंत्रित किया जाना चाहिए।

मध्य प्रदेश के पर्यावरण कार्यकर्ता और प्रयत्न संस्था के संस्थापक अजय दुबे इस फैसले को वन्यजीवों के खिलाफ एक आपराधिक साजिश बताते हैं। वे कहते हैं,

“जब अधिकारी लिखित में दे रहे हैं कि यह इलाका बांधवगढ़ और अचनकमार को जोड़ने वाले कॉरिडोर से सटा है, तो इसे नो-गो ज़ोन घोषित क्यों नहीं किया गया?”

दुबे आगे कहते हैं,

“कॉरिडोर कोई एक रास्ता नहीं होता। यह बाघों के जेनेटिक फ्लो की जीवन रेखा है। खदान शुरू होने से एज इफेक्ट पैदा होगा। ट्रकों का शोर, 24 घंटे की तेज रोशनी और विस्फोटों की धमक। यह सब बाघों को इस इलाके से हमेशा के लिए खदेड़ देगा।”

पर्यावरणविद तुषार दास भी इस चिंता को दोहराते हैं। उनका कहना है,

“यदि यह खदान शुरू होती है तो बाघ एक छोटे से क्षेत्र में कैद हो जाएंगे। इससे भविष्य में इनब्रीडिंग और महामारियों का खतरा बढ़ेगा।”

भूमिगत खनन ही सबसे बड़ा छलावा

प्रोजेक्ट को मंजूरी दिलाने के लिए भूमिगत खदान का तर्क दिया गया। कहा गया कि इससे जंगल को ऊपर से कोई नुकसान नहीं होगा। लेकिन पर्यावरणविद इस तर्क को पूरी तरह भ्रामक बताते हैं।

प्रोजेक्ट दस्तावेज़ों में दर्ज है कि 19.50 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग सतही अधिकारों के लिए किया जाएगा। इसमें कोयला डंप एरिया, विद्युत सब-स्टेशन, वेंटिलेशन शाफ्ट, वे-ब्रिज और भारी मशीनों के वर्कशॉप बनाए जाएंगे।

पर्यावरण मामलों के वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव कहते हैं,

“क्या खदान के अंदर का कोयला हवा से जाएगा? बाहर ट्रकों की लंबी कतारें लगेंगी, हजारों मजदूरों का आवागमन होगा। क्या उससे जंगल बचा रहेगा?”

वे आगे कहते हैं,

“भूमिगत खनन कई बार ओपन-कास्ट माइनिंग से भी ज्यादा खतरनाक साबित होता है। यह एक अदृश्य कैंसर की तरह काम करता है। आप सतह को नीचे से खोखला कर रहे हैं और ऊपर के पेड़ों से उम्मीद कर रहे हैं कि वे खड़े रहेंगे। यह विज्ञान और प्रकृति दोनों का मजाक है।”

सुदीप की बात को कई वैज्ञानिक अध्ययन भी समर्थन देते हैं। इन अध्ययनों के अनुसार भूमिगत खनन का प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई देता है। समय के साथ भूमि धंसाव, भूप्रदूषण और पारिस्थितिक क्षरण बढ़ता है। इसका प्रभाव कई दशकों तक बना रह सकता है।

खनन के लिए होगी 1753 पेड़ों की कटाई

इस प्रोजेक्ट के लिए 1753 पेड़ों को काटने की अनुमति मांगी गई है। इनमें महुआ, चार (चिरौंजी), जामुन, साल और सागौन के पेड़ शामिल हैं। वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार यहां जंगल का घनत्व 0.6 है, जो एक स्वस्थ और परिपक्व इकोसिस्टम की निशानी माना जाता है।

राजकुमार सिन्हा कहते हैं,

“महुआ और चार के पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं हैं। ये स्थानीय अर्थव्यवस्था और वन्यजीवों की फूड चेन का आधार हैं।”

स्थानीय वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट आदिल खान कहते हैं,

“यह कटाई लाखों जीवों के आवास को नष्ट करेगी। इको क्लास-III बताकर इस जंगल को कमतर आंकना वन विभाग की सबसे बड़ी बेईमानी है।”

इको क्लास-III जंगल आमतौर पर ट्रॉपिकल ड्राई डेसिडुअस यानी सूखे पर्णवाती जंगल होते हैं। यहां पेड़ों की छतरी का घनत्व मध्यम होता है। 0.4 से 0.6 घनत्व वाले वन को मध्यम से घना वन माना जाता है।

वैकल्पिक जमीन नहीं थी- तकनीकी अध्‍ययन या सुविधाजनक बहाना ?

समिति के सामने राज्‍य सरकार ने खदान के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के लिए वन भूमि के अलावा कोई तकनीकी रूप से व्‍यवहार्य विकल्‍प नहीं होने की दलील दी है। यह दलील  एनआईटी रायपुर की हाइड्रोलॉजिकल रिपोर्ट  के आकलन के आधार पर दी गई है।

एनआईटी रायपुर की हाइड्रोलॉजिकल रिपोर्ट के अनुसार पथोरा वेस्ट कोल ब्लॉक का भूभाग ऊबड़-खाबड़ है। यहां जमीन की ऊंचाई लगभग 480 मीटर से 548 मीटर के बीच है। इसी इलाके से बिजोरा नाला भी गुजरता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इस नाले का उच्चतम बाढ़ स्तर (Highest Flood Level) करीब 501.34 मीटर दर्ज किया गया है।

सरकार का तर्क है कि खदान के लिए जो गैर-वन भूमि उपलब्ध है, वह अधिकतर इसी नाले के पास के निचले और बाढ़ प्रभावित हिस्से में पड़ती है। अधिकारियों के मुताबिक अगर खदान का मुहाना, यानी शाफ्ट या इनक्लाइन इन निचले इलाकों में बनाया गया, तो बारिश के समय नाले का पानी सीधे भूमिगत खदान में भर सकता है। इससे दुर्घटना का खतरा पैदा हो सकता है।

इसी वजह से सरकार का कहना है कि बाढ़ के जोखिम से बचने के लिए खदान का प्रवेश बिंदु ऊंचाई पर स्थित वन भूमि में रखने का विकल्प चुना गया।

यह तर्क पर्यावरणविदों के गले नहीं उतरा रहा हैं। सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी की एनर्जी (थर्मल/आरई) टीम की प्रोग्रोम एसोसिएट दीपमाला पटेल इस पर तीखा पलटवार करती हैं। वे इस दलील को कॉपोरेट-परस्‍त बताते हुए पूछती हैं, 

क्‍या कॉर्पोरेट का मुनाफा सुनि‍श्चित करने और उनकी बाढ़ से सुरक्षा के लिए एक वाइल्‍डलाइफ कॉरिडोर को खतरे में डालना जायज है ?

वे आगे जोड़ती हैं, ” प्रोजेक्‍ट के लिए सुरक्षि‍त गैर-वन भूमि नहीं थी, तो प्रोजेक्‍ट को ही रद्द क्‍यों नहीं किया गया। क्‍या सरकार की नजर में 0.8 मिलिटन टन कोयला, भारत के राष्‍ट्रीय पशु (बाघ) के भविष्‍य से ज्‍यादा कीमती है।” 

मध्य प्रदेश सरकार बाघों की बढ़ती संख्या और पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करती है। इसी बीच बांधवगढ़-अचनकमार कॉरिडोर से सटे क्षेत्र में लगभग 150 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन और 1753 पेड़ों की कटाई के प्रस्ताव को वन सलाहकार समिति ने सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।

अब अंतिम फैसला केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) को लेना है, जिसे इस प्रस्ताव पर स्टेज-II मंजूरी देनी है या नहीं। पर्यावरणविद और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोग इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं।


भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।


यह भी पढ़ें 

कंपनी, कोयला, पुलिस: धिरौली से दिल्ली तक संघर्ष करते आदिवासियों की कहानी

बुंदेलखंड को पानी देने की कीमत चुकाते 20 गांव, जिन्हे मुआवजे की मांग पर मिली लाठी


पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुकट्विटरइंस्टाग्रामयूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें। 

Author

  • Based in Bhopal, this independent rural journalist traverses India, immersing himself in tribal and rural communities. His reporting spans the intersections of health, climate, agriculture, and gender in rural India, offering authentic perspectives on pressing issues affecting these often-overlooked regions.

    View all posts

Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

Connect With Us

Send your feedback at greport2018@gmail.com

Newsletter

Subscribe our weekly free newsletter on Substack to get tailored content directly to your inbox.

When you pay, you ensure that we are able to produce on-ground underreported environmental stories and keep them free-to-read for those who can’t pay. In exchange, you get exclusive benefits.

Your support amplifies voices too often overlooked, thank you for being part of the movement.

EXPLORE MORE

LATEST

mORE GROUND REPORTS

Environment stories from the margins