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2 साल बाद किस हाल में है देश की पहली सोलर सिटी?

Production: Himanshu Narware

यह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के डेली मॉर्निंग पॉडकास्ट का 88वां एपिसोड है। गुरुवार, 11 दिसंबर को देश भर की पर्यावरणीय ख़बरों के साथ पॉडकास्ट में जानिए 2 साल बाद किस हाल में है देश की पहली सोलर सिटी और क्यों जीवों की 8000 प्रजातियों पर मंडरा रहा है अस्तित्व का खतरा?


मुख्य सुर्खियां

राजस्थान के हनुमानगढ़ में निजी एथेनाल फैक्ट्री का विरोध हिंसक हो गया। किसानों ने फैक्ट्री में घुसकर 3 बुलडोज़र को क्षतिग्रस्त और करीब 10 वाहनों को आग लगा दी।


महाराष्ट्र में एक विधायक तेंदुए की कॉस्ट्यूम पहनकर विधानसभा परिसर में पहुंचे। वह राज्य में तेंदुए के बढ़ते हमलों का मुद्दा उठा रहे थे।


रातापानी टाइगर रिजर्व के पास मिडघाट में ट्रेन की चपेट में आने से एक बाघ की मौत हो गई। यहां 10 साल में 9 बाघ, 12 तेंदुओं समेत 44 जानवरों की ऐसे ही मौत हुई है।


केंद्र सरकार की 13 हज़ार 525 इमारतों पर चार नवंबर, 2025 तक 619.78 मेगावॉट क्षमता के रूफटॉप सोलर संयंत्र लगाए जा चुके हैं।


एशिया की सबसे बड़ी बिजली कंपनियों को क्लाइमेट से जुड़े खतरों की वजह से होने वाला सालाना नुकसान 2050 तक 33 परसेंट तक बढ़ सकता है।


मदुराई में इस साल कुत्तों के काटने के 18,000 से ज़्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं यह आठ सालों में सबसे ज़्यादा है।


विस्तृत चर्चा

सांची सोलर सिटी: दो साल बाद भी लोगों की ज़िंदगी में कोई रोशनी नहीं

मध्य प्रदेश का सांची शहर 2023 में देश की पहली सोलर सिटी घोषित हुआ था, जहाँ दो बड़े सोलर पार्क दिन-रात की पूरी बिजली मांग सौर ऊर्जा से पूरी करते हैं। तकनीकी रूप से ये दोनों प्लांट अच्छी क्षमता से चल रहे हैं और उत्पादन लक्ष्य भी पूरा कर रहे हैं। कर्क रेखा के पास होने के कारण यहाँ सौर ऊर्जा का पोटेंशियल स्वाभाविक रूप से मजबूत है।

लेकिन ज़मीनी हकीकत में स्थानीय लोगों की जिंदगी में अपेक्षित बदलाव नहीं दिखा। लोगों को उम्मीद थी कि सोलर सिटी बनने के बाद बिजली बिल कम होंगे और कटौती की समस्या घटेगी, लेकिन न कीमत में राहत मिली, न सप्लाई स्थिर हुई। वजह यह है कि सोलर पार्क तो ग्रिड से जुड़ गए, पर स्थानीय ट्रांसमिशन नेटवर्क को अपग्रेड ही नहीं किया गया। इसी कारण हल्की हवा या बारिश में भी लाइन फॉल्ट और लंबे कट लगते हैं।

लोगों को दिए गए सोलर स्ट्रीट लाइट, एलईडी बल्ब और पंखे भी एक साल में खराब हो गए, कई जगह स्ट्रीट लाइट चोरी भी हो गईं, और मेंटेनेंस का कोई मजबूत सिस्टम नहीं दिखता। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सांची “सोलर सिटी” तो कहलाता है, लेकिन आम आदमी के जीवन में इसका कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं पहुँचता। लोगों को परियोजना का हिस्सेदार नहीं बनाया गया और न ही उन्हें यह समझाया गया कि उनकी बिजली वास्तव में सौर स्रोत से आ रही है।

कुल मिलाकर तकनीकी सफलता के बावजूद सांची सोलर सिटी अपने मूल उद्देश्य, स्थानीय जीवन में बदलाव और लोगों की भागीदारी, को हासिल करने में पिछड़ती दिखाई देती है।


जलवायु परिवर्तन से 2100 तक 7,895 प्रजातियों पर वैश्विक विलुप्ति का खतरा

Global Change Biology में छपी स्टडी ने लगभग 30,000 vertebrate species (उभयचर, पक्षी, स्तनधारी, सरीसृप) को देखकर चेतावनी दी है कि अत्यधिक गर्मी और जंगल कटाई–शहरीकरण जैसी ज़मीन के इस्तेमाल की बदलती पैटर्न मिलकर 2100 तक कई प्रजातियों के बड़े हिस्से को रहने लायक नहीं छोड़ेंगे। सबसे खराब रास्ते SSP5-RCP8.5 में तो 7,895 प्रजातियाँ अपनी पूरी रेंज खो सकती हैं, यानी सीधी वैश्विक विलुप्ति का खतरा। सबसे अच्छे रास्ते SSP1-RCP2.6 में भी औसतन 10% रेंज प्रभावित होगी, जहाँ उभयचरों को 23% और सरीसृपों को 13% तक का नुकसान दिखता है।

चार भविष्य के रास्तों में तस्वीर साफ़ है: SSP1-RCP2.6 में 12% प्रजातियाँ गर्मी से प्रभावित होती हैं और उनकी रेंज का 10–23% हिस्सा बेकार हो सकता है। SSP2-RCP4.5 में नुक़सान काफ़ी हल्का है, ज्यादातर समूहों में बस 1–3% क्षेत्र घटता है। लेकिन SSP3-RCP7.0 में ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव सबसे बड़ी मार देता है, पक्षियों में 10%, स्तनधारियों में 13%, सरीसृपों में 11% और उभयचरों में 13% घर खत्म। सबसे बुरी तस्वीर SSP5-RCP8.5 की है, जहाँ 52% इलाक़े रहने लायक नहीं बचते और हज़ारों प्रजातियों की रेंज पूरी तरह मिट सकती है।

प्रभावित क्षेत्रों में साहेल (सूडान, चाड, माली), मिडल ईस्ट (अफगानिस्तान, इराक, सऊदी अरब), ब्राज़ील–बोलीविया–पैराग्वे, उत्तर अफ्रीका, भारत, और वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया जैसे हॉटस्पॉट शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर African bush viper (Atheris broadleyi) tough scenario में अपनी रेंज का 81% हिस्सा लैंड-यूज़ चेंज से और 76% गर्मी से खो देती है। स्टडी मानती है कि यह भी अधूरी तस्वीर है, क्योंकि जंगल की आग, सूखा, बीमारियाँ, प्रदूषण और invasive species जैसे कारक मॉडल में शामिल नहीं थे। लीड शोधकर्ता डॉ. रियूट वार्डी (ऑक्सफोर्ड) के मुताबिक, कड़े उत्सर्जन कट्स और हैबिटैट संरक्षण के बिना बायोडायवर्सिटी का पतन सीधी रफ़्तार से सामने आएगा।

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Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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