नोट- इस कहानी में आत्महत्या की घटनाओं का ज़िक्र किया गया है।
अक्टूबर 2025 की भारी बारिश के बाद बागला गांव के राम सिंह भामी के खेत में पानी भर गया था। सात बीघा में खड़ी सोयाबीन की फसल बर्बाद हो गई। करीब तीन बीघा की कटाई के बाद भामी ने काम रोक दिया, घर लौटे और 4 अक्टूबर को आत्महत्या कर ली।
पति के जाने के बाद राजूबाई (47) को नींद न आना, सिर में दर्द और घबराहट जैसी दिक्कतें शुरू हो गईं। उनका मानना था कि अगर वो अपनी परेशानी बेटे या बहू से कहेंगी तो उनका भी तनाव बढ़ जाएगा। उनके बेटे सुनील सिंह ने बताया कि उनकी मां दिन के ज़्यादातर समय चुपचाप रहकर गुज़ारती हैं।
वहीं पेशे से मज़दूर रहे सुनील को खेती करना नहीं आता। मगर अब खेती सहित पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी उन पर आ गई। इससे वो चिंता में रहते हैं।
खेड़ा जमुनिया के पंकज मालवीय ने बीती 28 जनवरी को आत्महत्या करने से पहले एक वीडियो व्हाट्सएप स्टेटस में डाला जिसमें गेहूं की फसल बिछी हुई दिखाई देती है। मीडिया में प्रकाशित ख़बरों के अनुसार उस दौरान भारी बारिश और तेज़ हवाओं के साथ-साथ बड़े-बड़े ओले गिरने से गेहूं और चने की फसल प्रभावित हुई थी।

मालवीय की बहन पायल (22) ने बताया कि इस घटना से उनकी 3 बीघा की गेहूं की फसल ख़राब हुई थी। 2 साल पहले पिता की मृत्यु के बाद पंकज परिवार के अकेले पुरुष थे। पायल अब अपनी मां और भाभी का साथ देने के लिए मायके में ही रहती है। खेती का बोझ इन्हीं तीन सदस्यों पर है।
आत्महत्या के वक़्त पंकज मालवीय पर कम से कम 5 लाख का कर्ज था। पायल मालवीय ने बताया कि जब भी कोई लेनदार पैसे मांगने आता है तो कुछ दिनों के लिए वो बाज़ार जाने से बचती हैं। “लोग हमें बाज़ार में देखकर सोचेंगे कि उधार चुका नहीं रहे और बाज़ार कर रहे हैं।” अपनी मनोस्थिति स्पष्ट करते हुए पायल ने कहा।
हमने मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री डॉ मोहन यादव के गृह जिले उज्जैन के कई ऐसे परिवारों से मुलाकात की जिनके मुखिया ने अतिवृष्टि या अन्य चरम मौसमी घटनाओं के बाद आत्महत्या कर ली। इन परिवारों में कम से कम एक सदस्य किसी न किसी मानसिक समस्या से जूझ रहा है।
अपनी पड़ताल में हमने पाया कि प्रशासन द्वारा इन परिवारों को किसी भी तरह की मानसिक सहायता नहीं दी गई है। मानसिक स्वास्थ्य के लिए चल रहे 4 दशक पुराने कार्यक्रम तक भी इन परिवारों की पहुंच शून्य है। इसे बढ़ाने के लिए शुरू की गई टेलीफ़ोनिक सेवा के बारे में लोगों को पता नहीं है।
चरम मौसमी घटनाओं से मानसिक प्रभाव
पंकज मालवीय के परिवार ने इस साल 8 बीघा ज़मीन पर सोयाबीन बोई थी। जुलाई के पहले हफ्ते में बुवाई के बाद हुई भारी बारिश से उनके खेत में पानी भर गया। इससे बीज सड़ गए, नतीजतन उन्हें दोबारा बुवाई करनी पड़ी।
“अब तो कभी भी बारिश हो जाती है, कभी बारिश ही नहीं होती और कभी ओले पड़ जाते हैं। ऐसे में कैसे क़र्ज़ चुकाएंगे?” पायल मालवीय ने कहा।

पायल के खेत में सिंचाई की सुविधा न होने के कारण वो पास के खेत से पानी मोल लेती हैं। जहां मौजूदा खरीफ सीजन के शुरूआती हफ़्तों में उनकी फसल बारिश की अधिकता से प्रभावित हुई वहीं बाद में लंबे मानसून ब्रेक के कारण फसलों को पानी की कमी का सामना करना पड़ा। पानी कम होने के कारण मोल लेने के रेट बढ़ गए, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव आया। गौरतलब है कि 1 जून से 28 सितंबर तक उज्जैन में 644.7 मिमी बारिश हुई थी, जो सामान्य से 27% कम है।
इस तरह हर बार खेती का घाटा इस परिवार की स्थिति को और कठिन बना देता है।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवेलपमेंट (iied) में डायरेक्टर, क्लाइमेट रेसिलिएंस, फाइनेंस, एंड लॉस एंड डैमेज ऋतू भारद्वाज मध्य प्रदेश, देश के विभिन्न राज्यों और कई देशों में पर्यावरण से कृषि और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कर चुकी हैं। अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि अकेले पुरुष वाले परिवार में आत्महत्या की घटनाओं के बाद महिलाओं को ज़मीन जोतने से लेकर लोन, बच्चों की ज़िम्मेदारी तक सब कुछ अकेले संभालना होता है। इससे उन्हें खुद की देखभाल या ठीक होने के लिए कम समय मिलता है।
मध्य प्रदेश में बढ़ती चरम मौसमी घटनाएं

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट के अनुसार 1 जनवरी से 30 सितंबर 2025 के बीच सेंट्रल इंडिया में 273 में से 200 दिन चरम मौसमी घटनाएं दर्ज की गईं।
इनमें सेंट्रल इंडिया में सबसे ज्यादा (144 दिन) घटनाएं और पूरे देश में सबसे ज्यादा इंसानी मौतें (532) मध्य प्रदेश में हुईं। जबकि प्रदेश में लगभग 12,000 हेक्टेयर की फसल बर्बाद हुई।
वहीं सीएसई के एनवायरनमेंट रिसोर्स यूनिट की प्रोग्राम डायरेक्टर किरण पाण्डेय ने बताया कि प्रदेश में 2022 से 2025 के बीच भारी बारिश, बाढ़, और भूस्खलन के दिनों में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है।

भारत मौसम विभाग (IMD) भोपाल केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ अरुण शर्मा ने बताया कि इंटेंस रेनफॉल इवेंट्स के बाद “बारिश अपने साथ मिट्टी में मौजूद मिनरल्स को बहा ले जाती है जिससे फसल की पैदावार पर भी असर पड़ता है”।
“घटती पैदावार पहले से ही शोक में डूबे परिवार की चिंता बढ़ा देती है क्योंकि इससे ही वो क़र्ज़ चुकाने और अपना गुजर-बसर करते हैं।” क्लाइमेट चेंज और मेंटल हेल्थ पर एडवोकेसी करने वाली रूही कुमारी ने बताया।
मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर किसान परिवार
भारत में चरम मौसमी घटनाओं के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर आधारित 75 अध्ययनों के एक विश्लेषण के अनुसार पीड़ितों में मानसिक बीमारियों का फैलाव 5.8% से 87.6% तक पाया गया। अध्ययन के अनुसार बाढ़ गांव या निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोगों पर ज़्यादा बुरा असर डालती है, क्योंकि उनकी रोज़ी-रोटी इसी पर निर्भर करती है। वहीं अत्यधिक गर्मी और वर्षा के चलते खेती में सामान्य पैदावार न होने पर घर चलाने के बोझ से किसान परिवार सुसाइड करने के विचार या डिप्रेशन का सामना करते हैं।
18 फरवरी 2026 को मुख्यमंत्री ने विधानसभा में बताया कि 13 दिसंबर 2023 से 20 जनवरी 2026 के बीच 562 किसानों और 667 कृषक मजदूरों सहित प्रदेश में कुल 32,385 आत्महत्या की घटनाएं दर्ज हुई थीं। यानी इस बीच प्रदेश में हर 2 दिन में लगभग 1 किसान और हर दिन 1 कृषक मज़दूर ने आत्महत्या की। हालांकि सीएम ने स्पष्ट किया कि केवल 2 किसानों ने ही फसल के नुकसान होने के कारण आत्महत्या की।
सीएम ने ये भी बताया कि प्रदेश में मृतकों के परिजनों को सरकार ने कोई भी सहायता राशि नहीं दी।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 13.90% लोग मानसिक बीमारियों से ग्रसित हैं जो राष्ट्रीय औसत 10.70% से भी ज्यादा है।
इससे निपटने के लिए भारत में डिस्ट्रिक्ट मेंटल हेल्थ प्रोग्राम देश के 767 जिलों में संचालित हो रहा है।
उज्जैन जिला अस्पताल में मनोचिकित्सक डॉ नीत राजगौड़ा ने कहा कि उनके पास हर दिन लगभग 30 मरीज़ आ जाते हैं जिनमें से 70% ग्रामीण होते हैं।
फिर भी हमने जिन 5 परिवारों से संपर्क किया उनमें से किसी को भी जिला अस्पताल में इस सुविधा के बारे में नहीं पता था।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) 2026 की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे 2015-16 की सिफारिश के बावजूद कोई भी मेंटल हेल्थ पॉलिसी नहीं थी। ऑडिट के अनुसार राज्य में प्रति लाख जनसंख्या में 0.05 मनोचिकित्सक ही हैं जबकि ज़रूरत कम से कम एक मनोचिकित्सक (प्रति लाख जनसंख्या) की है। साथ ही सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए ज़रूरी उपकरणों की 47% से 100% तक कमी है।
केंद्र सरकार ने अच्छी मेंटल हेल्थ काउंसलिंग और केयर सर्विसेज़ तक पहुंच को और बेहतर बनाने के लिए 10 अक्टूबर, 2022 को ‘नेशनल टेली मेंटल हेल्थ प्रोग्राम’ (Tele-MANAS) के अंतर्गत 2 टोल फ्री नंबर (14416 और 1-800 891 4416) जारी किए थे।

हमने दोनों नंबरों पर 4 अलग-अलग दिन कॉल किया। इसमें से अधिकतर बार हमें कहा गया कि सभी परामर्शदाता अन्य कॉल पर व्यस्त हैं।
कैग की रिपोर्ट के अनुसार टैली मानस के 16% कॉल अनुत्तरित थे जबकि 78% समय से पहले ही ड्रॉप हो गए।
जबकि एक बार हमारी बात इंदौर स्थित टेली मानस सेल में हुई। हमने उनसे सामाजिक कार्यकर्ता बनकर बात की। लगभग आधे घंटे के कॉल में उन्होंने हमारी बातें सुनीं और मरीज को जिला अस्पताल के मनकक्ष में ले जाने की सलाह दी। खेती के नुकसान और उससे बढ़ने वाले मानसिक तनाव को कम करने के लिए उन्होंने सरकारी योजनाओं का लाभ लेने की बात की मगर खेती में नुकसान कम करने के तरीकों की जानकारी न होने की बात कही।
टेली मानस के तहत देशभर में अब तक 45 लाख से भी ज्यादा कॉल किए जा चुके हैं। फिर भी ग्रैजुएशन कर चुकीं पायल से लेकर मध्य प्रदेश के साथ किसानों के लिए बेहतर तकनीक आधारित उपायों पर काम कर चुकीं भारद्वाज भी इसके बारे में नही जानतीं।
भारद्वाज ने कहा कि किसानों के लिए केवल एक ही हेल्प लाइन होनी चाहिए जिसमें वो फसल, मौसम और फसल बीमा से संबंधित समस्याओं के साथ ही अपनी मानसिक समस्या के लिए भी मदद मांग सकें।
रूही कुमार कहती हैं कि ऐसे परिवारों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर करने के लिए समुदाय के लोगों को आगे आना पड़ेगा। वो कहती हैं कि स्थानीय व्यक्ति जो खुद भी मौसमी परिवर्तन को देख रहा है वो ऐसे परिस्थिति में बेहतर तरीके से परिवार को सुन सकता है।
रूही की ये बात महाराष्ट्र के एक जिले में साकार होती दिखती है।
महाराष्ट्र के धाराशिव जिले में हलो मेडिकल फाउंडेशन (Halo Medical Foundation) पिछले 30 सालों से महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर काम कर रहा है। इसके प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर बसवराज नारे ने बताया कि फाउंडेशन ने जिले की लोहरा और तुलजापुर तालुका में आशा कार्यकर्ताओं को मेंटल काउंसलिंग, मनोरोगियों को पहचानने, उनसे बात करने और ज़रूरत पड़ने पर जिला अस्पताल तक लाने की ट्रेनिंग दी थी। फाउंडेशन को उपरोक्त ट्रेनिंग के लिए जिला प्रशासन का सहयोग नहीं मिला।
नारे ने कहा कि जिला स्तर पर मनोवैज्ञानिक सहायता देने वाले सरकारी चिकित्सक जलवायु परिवर्तन से किसानों पर असर के बारे में कम ही जानते हैं।

उज्जैन कृषि विभाग में सहायक संचालक (Assistant Director) कमलेश राठौड़ जिले में हुई इन आत्महत्याओं और उसके बाद पड़ने वाले मानसिक प्रभाव के लिए चरम मौसमी घटनाओं को ज़िम्मेदार नहीं मानते। उन्होंने बताया कि ऐसी घटना के बाद परिवार के मानसिक स्वास्थ्य की पूछ परख लेना उनके विभाग के कामों में नहीं आता।
जबकि रूही मानती हैं कि राज्य को ऐसी नीति बनानी पड़ेगी जहां कृषि घाटे और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को जोड़कर देखा जाए।
फिलहाल ये परिवार तमाम मानसिक दबाव से जूझ रहे हैं। मगर अब तक न तो इनके पास बेहतर मानसिक चिकित्सा पहुंची है और ना ही चरम मौसमी घटनाओं के प्रभाव को कम करने के तरीके। ऐसे में इनका संघर्ष अब भी जारी है।
नोट: शिशिर अग्रवाल एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज़्म में क्लाइमेट चेंज मीडिया हब के मेंटी हैं। इस प्रोग्राम को इंटरलिंक एकेडमी, जर्मनी का सहयोग प्राप्त है।
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