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रीवा की नदियों के किनारे कैसे बसते गए घर जब मास्टर प्लान में था निर्माण पर प्रतिबंध 

रीवा में 30% कम बारिश के बावजूद बाढ़ में नदी किनारे निर्माण और अतिक्रमण पर उठे सवाल। मास्टर प्लान में प्रतिबंधित क्षेत्र में निर्माण ने प्रशासनिक जवाबदेही पर खड़े किये प्रश्न चिन्ह।    
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बाढ़ के बाद डूबा हुआ रीवा ईको पार्क। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

मध्य प्रदेश के रीवा में इस मानसून की बारिश सामान्य से करीब 30 फीसदी कम रही, इसके बावजूद अगस्त में आई बाढ़ ने शहर और आसपास के इलाकों में भारी नुकसान किया। ऐसे हालात सिर्फ रीवा ही नहीं बल्कि पूर्वी मध्यप्रदेश के सतना और शहडोल जिलों में भी बने थे। इसी बीच, चित्रकूट में आई बाढ़ का जायजा लेने पहुंचे मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी निर्माण और अतिक्रमण की भूमिका की जांच के निर्देश दिए। हालांकि सीएम यादव के निर्देश से पहले ही, 25 अगस्त को रीवा नगर निगम द्वारा कार्रवाइयां शुरू कर दी गईं थीं। 

रीवा नगर निगम आयुक्त अक्षत जैन और रीवा के कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी ने भी माना कि इस बाढ़ के पीछे कई कारण हैं, जिनमें अतिक्रमण, अवैध निर्माण और नदियों के ग्रीन बेल्ट में हुआ निर्माण भी शामिल है। गौरतलब है कि नदी के ग्रीनबेल्ट में रिहाइशी कालोनियों से लेकर ‘रीवा ईको पार्क‘ जैसे बड़े रिसॉर्ट्स के निर्माण शामिल हैं। 

“कई जगहों पर जो लो-लाइंग एरिया थे, पारंपरिक रूप से जहां पानी भरता था, वहां लोगों ने निर्माण किये हैं। आख़िरकार हमारी समझ से यही सब वे कारण है जिनकी वजह से यह समस्या आई है,” जैन ने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा। बकौल जैन, आज की तारीख तक हुई कार्रवाई में एक फॉर्म हॉउस गिराया गया है, और 100 से ज्यादा इमारतों को नोटिस दिया गया है। 

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रीवा में बाढ़ के बाद नदी किनारे बने घरों और अन्य निर्माणों पर कार्रवाई शुरू हो गई है, लेकिन सवाल यह है कि जब मास्टर प्लान में बीहर और बिछिया नदियों के किनारे निर्माण प्रतिबंधित था, तो ये बस्तियां और इमारतें वहां तक पहुंचीं कैसे। ग्राउंड रिपोर्ट ने मास्टर प्लान के प्रावधानों, सरकारी अनुमतियों और जमीनी स्थिति की पड़ताल की तो सामने आया कि नदी के ग्रीन बेल्ट में निर्माण रोकने के नियम मौजूद थे, लेकिन उनके बावजूद कई स्थायी निर्माण होते गए।   

बीहर नदी के ग्रीनबेल्ट में बसी शिवधाम कॉलोनी में खड़ी अधबनी इमारतें जिन्हे नगर निगम की ओर से नोटिस दिया गया है। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

रीवा के ग्रीनबेल्ट में हुए अवैध निर्माण 

अगस्त 2026  के आखिरी सप्ताह में हुई बरसात के बाद रीवा में बाढ़ की स्थिति निर्मित हुई। इसके बाद बद्रिका फार्म पर कार्रवाई कर के गिराया गया था। यह फार्म बीहर नदी तट से तकरीबन 17 मीटर दूर है। बद्रिका फॉर्म से ही तकरीबन एक मील दूर शिवधाम कॉलोनी है। इस कॉलोनी के कई निर्मित-अर्धनिर्मित घरों को रीवा नगर निगम आयुक्त की ओर से नोटिस दिया गया है। 

रीवा नगर निगम आयुक्त ने ग्राउंड रिपोर्ट को बताया कि ग्रीन बेल्ट पर हुए अवैध अतिक्रमणों पर कार्रवाई की जा रही है। “हमें नदी तट पर बने बद्रिका फार्म पर कार्रवाई की है। इसके अलावा हमें अन्य अतिक्रमणों को लेकर भी नोटिस दिया है। हम जीआईएस और फील्ड रिपोर्टिंग के जरिये सर्वे कर के नदी के 50 मीटर के दायरे पर हुए निर्माण को चिन्हित कर रहे हैं।”

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शिवधाम कॉलोनी की निवासी कांतिमा सिंह के दरवाजे पर भी नोटिस चिपका है। 27 अगस्त को जारी इस नोटिस में उन्हें 3 दिन की मोहलत दी गई है। इस दौरान पर्याप्त स्पष्टीकरण न मिलने पर इस निर्माण को ‘हटा दिए जाने/गिरा दिए जाने’ की बात कही गई है। हालांकि जब ग्राउंड रिपोर्ट की टीम 3 सितंबर को मौके पर पहुंची, तब तक उनका मकान नहीं गिराया गया था। लेकिन कांतिमा सिंह अब भी इस डर के बीच जीवन बसर कर रही थीं। 

शिवधाम कॉलोनी में रहने वाली कांतिमा सिंह, जिन्हे नदी के ग्रीन बेल्ट में अवैध निर्माण किये जाने बाबत नोटिस दिया गया है। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

सिंह ने बताया कि उनका मकान 2015 में एक बिल्डर से खरीदा गया था। उनके पास रजिस्ट्री, बिजली के बिल और संपत्ति कर जमा करने के रिकॉर्ड हैं। सिंह का कहना है कि अगर निर्माण प्रतिबंधित था तो उस समय रजिस्ट्री और भवन निर्माण की अनुमति कैसे मिली? अब वे इस मामले को लेकर अदालत का रुख कर रही हैं। 

हालांकि नदी के तट पर बसी शिवधाम कॉलोनी का यह इकलौता घर नहीं था, जिसे यह नोटिस दिया गया था। इस कालोनी में कई निर्मित, अर्धनिर्मित मकानों में भी यह नोटिस चस्पा था। शिवधाम कॉलोनी के अलावा, निपनिया, हमीदिया कॉलोनी, बांसघाट कॉलोनी भी बीहर नदी के किनारे बसी हुई हैं। 

बीहर नदी के तट से महज 19 मीटर दूर स्थित निपानिया कालोनी।फोटो: गूगल अर्थ

नगर तथा ग्राम निवेश (टीएनसीपी) रीवा के उपनिदेशक संकल्प शुक्ला ने ग्राउंड रिपोर्ट को बताया कि “अगर जमीन नदी के किनारे है यानी नदी के ग्रीन बेल्ट में है तो उसमें किसी भी तरह के स्थायी निर्माण की अनुमति नहीं दी जाती है”। 

रीवा में वर्तमान में 2021 की विकास योजना/मास्टर प्लान लागू है। इसके अनुसार रीवा की बीहर और बिछिया नदियों के किनारे के 50 मीटर हिस्से का उपयोग सिर्फ ‘पर्यावरण वानिकी’ के तौर पर किया जा सकता है। इस विषय पर शुक्ला ने जोड़ा कि, “लोग मानते हैं कि रीवा में यह दूरी नदी से सिर्फ 50 मीटर है, जबकि कई जगहों पर यह 200 से 250 मीटर तक है,” बकौल शुक्ला, नालों के मामले में यह सीमा 9 मीटर की है।

लेकिन वास्तविकता इससे अलग नज़र आती है। अगर गूगल अर्थ की सैटेलाइट इमेजरी को सहारा लिया जाए तो रीवा की बीहर नदी के एक किनारे बने पुष्पराज नगर की सीमा बीहर नदी के तकरीबन 30 मीटर के भीतर से ही शुरू हो जाती है। इसी स्थान पर नदी के दूसरे किनारे पर पंचमठाधाम नाम का एक धार्मिक स्थल मौजूद है। यह स्थल भी बीहर नदी से तकरीबन 44 मीटर की दूरी पर स्थित है। 

बीहर नदी से 30 मीटर दूरी में बसा पुष्पराज नगर। फोटो: गूगल अर्थ

अगर बीहर नदी पर ही दूसरे बड़े  चर्चित निर्माण का उदाहरण लिया जाए तो ‘रीवा इको पार्क’ रिसोर्ट भी बिहार नदी के ग्रीन बेल्ट में बना हुआ है। इस निर्माण को मिली अनुमति और मंजूर नक़्शे में, ग्रीन बेल्ट में सिर्फ ‘पर्यावरण वानिकी’ और ‘आमोद प्रमोद’ की जगह बनाने की मंजूरी थी। इसमें किसी भी तरह के स्थायी प्रकृति के निर्माण की अनुमति नहीं थी। लेकिन आज ‘रीवा ईको पार्क’ में नदी से लगा हुआ स्थायी निर्माण मौजूद है, जो कि अगस्त-सितंबर की बरसात में जलमग्न हो गया था। अब तक की जानकारी के अनुसार ‘रीवा ईको पार्क’ को कोई नोटिस जारी नहीं हुआ है।  

ग्राउंड रिपोर्ट ने अपनी पिछली रिपोर्टिंग में पाया था कि बीहर नदी के ग्रीन बेल्ट में बने रीवा ईको पार्क के स्वीकृत उपयोग और मौके पर मौजूद स्थायी निर्माण के बीच अंतर है। बारिश के दौरान पार्क का नदी से सटा हिस्सा जलमग्न भी हुआ था, जिससे निर्माण और नियमन पर सवाल उठे थे।   

बाढ़ के बाद रीवा ईको पार्क का एक हिस्सा जलमग्न हो गया था। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

रीवा ईको पार्क के निर्माण की वैधता के प्रश्न पर शुक्ला उत्तर देते हैं कि यह निर्माण वैध था, इसे टीएनसीपी की ओर से ‘पर्यावरण वानिकी’ और ‘अमोद-प्रमोद’ के स्थल बनाने की मंजूरी दी गई थी। ईको पार्क में हुए स्थायी निर्माण के जवाब में वे कहते हैं कि, “अगर कोई X की मंजूरी लेकर Y बना ले तब इसमें हम क्या कर सकते हैं। हम तो बस एक नियामक संस्था हैं।”

बीहर नदी के ग्रीन बेल्ट में मौजूद ‘रीवा ईको पार्क’ (बाढ़ से पहले 16 जून की तस्वीर)। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

हालांकि जबलपुर हाईकोर्ट के अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा ने कहा कि “यदि टीएनसीपी  ने किसी जमीन पर एक तरह के उपयोग या विकास की अनुमति दी और बाद में वहां उससे अलग निर्माण हो गया, तो विभाग के पास उस अनुमति को वापस लेने की शक्ति है।” गौरतलब है कि रीवा में यह अतिक्रमण का मामला नहीं है।

2019 में मिश्रा ने एनजीटी के समक्ष बीहर एवं बिछिया नदी के ग्रीन बेल्ट में हुए अतिक्रमण को लेकर याचिका लगाई थी। इसके आदेश में एनजीटी ने नदी के किनारे हो रहे अतिक्रमण को रोकने के लिए कदम उठाने के आदेश दिए थे। 1973 का अधिनियम टीएनसीपी के निदेशक को अनुमति के विपरीत हुए विकास पर कार्रवाई की शक्ति देता है। 

धारा 37 के तहत निर्धारित परिस्थितियों में निदेशक जमीन को पूर्व स्थिति में लाने का आदेश दे सकते हैं और आदेश का पालन न होने पर निर्माण हटाने या उसमें बदलाव की कार्रवाई कर सकते हैं। 

इसके अलावा नगर निगम आयुक्त को 1956 के नगर पालिक निगम अधिनियम की धारा 307 के तहत बिना अनुमति या स्वीकृत योजना के विपरीत बने निर्माण पर नोटिस देकर उसे हटाने, बदलने या गिराने की कार्रवाई का अधिकार है। इस प्रावधान का उपयोग रीवा में बाढ़ एवं जलभराव के बाद किया गया है। 

इन कार्रवाइयों पर जैन ने कहा, “ग्रीनबेल्ट में किसी भी तरह का निर्माण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” उन्होंने आगे कहा, “जिन घरों को नोटिस जारी किया है, बारिश को देखते हुए उनके घरों पर कार्रवाई नहीं की जा रही है, क्यूंकि अभी उनके पास कोई दूसरी व्यवस्था नहीं है। बारिश के बाद जल्द ही कार्रवाई शुरू की जाएगी।”  

मनाही के बावजूद नदी के किनारे कैसे हुए निर्माण

मिश्रा बताते हैं कि, एक अहम कड़ी जमीन की रजिस्ट्री और उसके बाद मिलने वाली विकास व भवन निर्माण अनुमतियों के बीच दिखाई देती है। रजिस्ट्री के स्तर पर मध्य प्रदेश रजिस्ट्रेशन रूल्स, 1939 के अनुसार मास्टर प्लान के लैंड यूज से मेल न खाना अपने आप में रजिस्ट्री रोकने का आधार नहीं है। मिश्रा के मुताबिक, “ग्रीन बेल्ट में स्थायी निर्माण नहीं किया जा सकता, लेकिन ग्रीन बेल्ट में जमीन के स्वामित्व पर कोई पाबंदी नहीं है।”

रजिस्ट्री के बाद भूमि उपयोग या विकास के लिए नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 के तहत अनुमति और फिर स्थानीय निकाय से भवन निर्माण की स्वीकृति जरूरी होती है। मिश्रा के अनुसार, भवन अनुमति देने से पहले यह जांचना जरूरी है कि प्रस्तावित निर्माण नदी या नाले से कितनी दूरी पर है। उनका आरोप है कि कुछ मामलों में वास्तविक दूरी से अधिक दूरी दिखाकर अनुमति हासिल की गई, जिससे ग्रीन बेल्ट में निर्माण संभव हुआ। 

वहीं, रीवा कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी से जब पूछा गया कि ऐसे निर्माणों के बावजूद बिजली कनेक्शन कैसे दिए गए, तो उन्होंने कहा, “हम किसी को अंधेरे में नहीं रख सकते हैं।”

क्या है सुरक्षित विकल्प 

सिंह का कहना है कि अगर प्रशासन की नजर में उनका मकान नदी के ग्रीन बेल्ट में आता है तो “आप हमारा मुआवजा दीजिए, आप हमको व्यवस्थित करिए, हम घर छोड़ने को तैयार हैं।”

शुक्ला लोगों को सलाह देते हैं कि जमीन खरीदने से पहले उसके खसरे का भूमि उपयोग प्रमाण पत्र यानी लैंड यूज सर्टिफिकेट जरूर लें। उनके मुताबिक, यह प्रमाण पत्र टीएनसीपी के पोर्टल से 500 रु शुल्क देकर ऑनलाइन लिया जा सकता है। इससे पता चल जाता है कि संबंधित जमीन का निर्धारित लैंड यूज क्या है। अगर जमीन का उपयोग आवासीय के बजाय कृषि या पर्यावरण वानिकी है, तो उसे घर बनाने के लिए खरीदने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए। 

नगर तथा ग्राम निवेश (टीएनसीपी) रीवा के उपनिदेशक संकल्प शुक्ला

शुक्ला ने बताया कि अब 2047 के हिसाब से नई विकास योजना तैयार की जानी है। जनवरी 2026 में रीवा के प्लानिंग एरिया का विस्तार कर नगर निगम के साथ 80 गांवों को इसमें शामिल किया गया है। शुक्ला के मुताबिक, नए क्षेत्र के लिए अभी हैदराबाद के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर से सैटेलाइट इमेजरी का इंतजार है; इसके बाद नई योजना तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

फिलहाल रीवा में भीषण बाढ़ के बाद कार्रवाई शुरू तो हुई है लेकिन यह अतिक्रमणों पर अंकुश लगाने और बाढ़ को नियंत्रित करने में कितनी कारगर सिद्ध होती है, यह वक्त के साथ ही पता लगेगा। 

रिपोर्टिंग के दौरान जमीनी सहयोग के लिए पत्रकार लवकुश पांडेय का आभार।


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  • Journalist, focused on environmental reporting, exploring the intersections of wildlife, ecology, and social justice. Passionate about highlighting the environmental impacts on marginalized communities, including women, tribal groups, the economically vulnerable, and LGBTQ+ individuals.

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