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रिपोर्टर से बात: डिंडौरी में जनभागीदारी से बनी 8 लाख+ जल संरचनाएं

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पर्यावरण आज | मध्य प्रदेश के डिंडोरी ज़िले में पानी की किल्लत कम करने के लिए लोगों ने मिलकर आठ लाख से ज़्यादा जल संरचनाएँ बना दीं। इस अभियान में ज़िले को राज्य में पहला और देश में तीसरा स्थान मिला। लेकिन क्या यह प्रयास पूरी तरह सुरक्षित है? जानिए हमारे रिपोर्टर चंद्र प्रताप तिवारी से, कैसे जनभागीदारी से यह काम किया जा रहा है।

आज की प्रमुख हेडलाइन्स

मध्य प्रदेश के डिंडोरी और अनूपपुर ज़िलों के अमरकंटक इलाके में ‘साल बोरर’ कीड़े से प्रभावित साल के पेड़ों को काटने की मंज़ूरी दे दी गई है।

डिंडोरी वन विभाग के सब-डिविज़नल ऑफ़िसर सुरेंद्र जाटव के अनुसार, केंद्र सरकार ने डिंडोरी ज़िले में 1,46,784 पेड़ों को काटने की मंज़ूरी दी है। मंज़ूरी मिलने के बाद प्रभावित पेड़ों को काटने का काम जल्द ही शुरू हो जाएगा।

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देश के कुछ हिस्सों से दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की विदाई हो रही है, लेकिन कई इलाकों में आंधी-तूफ़ान, तेज़ हवाएं चलने और बिजली गिरने की संभावना है। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने बिहार, पूर्वी राजस्थान, केरल, ओडिशा, सिक्किम, उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल, लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, तमिलनाडु, पुडुचेरी और कराईकल के कुछ हिस्सों में भारी बारिश की चेतावनी दी है।


वर्ल्ड मेटियोरोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन (WMO) की ‘स्टेट ऑफ़ ग्लोबल वॉटर रिसोर्सेज़ 2025’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत में भूजल का स्तर लगातार गिर रहा है।

खासकर देश के उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में भूजल स्तर की गिरावट व्यापक रूप से देखी जा रही है। हालिया वैश्विक आकलन चेतावनी देता है कि यह गिरावट अब कई सालों से लगातार बनी हुई है। यह जल संतुलन में गड़बड़ी का संकेत है, यानी जितना भूजल रिचार्ज हो रहा है, उससे कहीं ज़्यादा निकाला जा रहा है।

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अगले हफ़्ते बंगाल की खाड़ी में एक चक्रवात बन सकता है, जो उत्तरी हिंद महासागर क्षेत्र में 2026 का पहला चक्रवात होगा। इसके ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटों के करीब पहुंचने की संभावना है।

अगर यह चक्रवात बनता है, तो इसका नाम ‘अर्नब’ रखा जाएगा। नवंबर 2025 में आए चक्रवात ‘डिटवाह’ के बाद यह इस क्षेत्र का पहला चक्रवात होगा। ‘डिटवाह’ के कारण श्रीलंका और भारत में 600 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी।


रिपोर्टर से बात

डिंडौरी में जनभागीदारी से बनी 8 लाख+ जल संरचनाएं

चंद्र प्रताप तिवारी, ग्राउंड रिपोर्ट

डिंडौरी के सिंगपुर गांव में बनी वॉटरशेड | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी, ग्राउंड रिपोर्ट
डिंडौरी के सिंगपुर गांव में बनी वॉटरशेड | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी, ग्राउंड रिपोर्ट

डिंडोरी में पानी की समस्या कम करने के लिए जन भागीदारी से 8 लाख से अधिक जल संरचनाओं का निर्माण किया गया है। हमारे रिपोर्टर चंद्र प्रताप पिछले दिनों डिंडोरी पहुंचे और इन गांवों की स्थिति जानी। आइए उनसे समझते हैं कि डिंडोरी में लोग इस जन अभियान का हिस्सा कैसे बने और उनका अनुभव कैसा रहा।

डिंडोरी को जल संचय जन भागीदारी अभियान 2.0 में मध्य प्रदेश में प्रथम और देश भर में तीसरा स्थान मिला है। केंद्र सरकार के इस अभियान के तहत डिंडोरी में 8,27,684 जल संरक्षण कार्य दर्ज किए गए थे, जिनमें से 8,03,979 पूरे हो चुके हैं और 23,705 अभी जारी हैं।

इस अभियान का मूल मकसद जन भागीदारी से ऐसी संरचनाएं बनाना था, जो पानी को व्यर्थ बहने से रोकें। इनमें रेन वाटर हार्वेस्टिंग और सोक पिट रिचार्ज जैसी संरचनाएं शामिल थीं। इसके अलावा तालाब, स्टॉप डैम और ट्रेंचेस भी बनाए गए हैं। इस काम के लिए अलग से कोई फंड नहीं था। यह लोगों के सामूहिक प्रयास और विभागों के सहयोग से बना है, और शायद यही पहलू इस पूरी कहानी को ख़ास बना देता है।

डिंडोरी की ज्योग्राफी भी यहां एक ज़रूरी पहलू है, पल्लव। डिंडोरी ज़िला मुख्यतः बेसाल्ट यानी काली चट्टान से बना है, जिसमें ज़मीन के भीतर पानी जमा होने की प्राकृतिक जगह बहुत कम है। यहां पानी सिर्फ़ चट्टानों की दरारों और जोड़ों में रुकता है, इसलिए एक्वीफ़र्स में बेहद कम पानी इकट्ठा हो पाता है। कम बारिश के कारण गर्मियों में एक्वीफ़र्स का जलस्तर तेज़ी से घटता है और जल संकट खड़ा हो जाता है। सिंगपुर गांव, जहां मैं रिपोर्टिंग के लिए गया, वहां के लोग अब आश्वस्त हैं कि आने वाली गर्मी में शायद पिछली गर्मी की तुलना में कम जल संकट होगा।

इस गांव के लोगों को इसके पीछे का विज्ञान और तर्क साफ़ तौर पर नहीं पता था। जब मैंने उनसे इस प्रयास की वजह पूछी, तो उन्होंने कहा कि इससे पानी बर्बाद नहीं होता और उनकी आने वाली पीढ़ी को इसका फ़ायदा मिलेगा।

हालांकि एक बात ऐसी है, जिस पर डिंडोरी में ध्यान नहीं दिया गया है, और वह है ग्रे वाटर यानी मैले पानी का सोक पिट में निपटान। यह मैला पानी सोक पिट के ज़रिए नीचे जाकर यहां के ग्राउंड वाटर को भी दूषित कर सकता है। फ़िलहाल गांव वाले इस संभावना से पूरी तरह अनजान हैं। अगर लोगों की जन भागीदारी के साथ एक रिसर्च-आधारित, विशेषज्ञ दृष्टिकोण भी जुड़ता, तो शायद यह प्रयास पूरी तरह सुरक्षित हो पाता।

इसके अलावा, जब मैंने इस विषय पर हाइड्रोलॉजिस्ट डॉ. सुनील चतुर्वेदी से बात की, तो उन्होंने भी कहा कि ऐसे प्रयास ज़रूरी हैं। हालांकि ये प्रयास ग्राउंड वाटर का स्तर एकदम से नहीं बढ़ा पाएंगे, लेकिन इनसे वहां का सरफ़ेस रनऑफ़ ज़रूर बेहतर होगा।

तो पल्लव, इस विषय पर हमारी वीडियो रिपोर्ट अब सार्वजनिक हो चुकी है। मैं अपनी ऑडियंस से आग्रह करूंगा कि वे इसे देखें और अपनी राय ज़रूर दें।

इसके अलावा, अब्दुल वसीम अंसारी की सोक पिट के ज़रिए ग्राउंड वाटर कंटैमिनेशन के खतरों पर एक रिपोर्ट कुछ महीने पहले ही प्रकाशित हुई है। मैं सुझाव दूंगा कि हमारे पाठक उसे भी पढ़ें।

Rajgarh’s Groundwater Campaign Is Pushing Wastewater Underground


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Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

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