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रिपोर्टर से बात: साल बोरर से कैसे बचाए जा रहे हैं डिंडौरी के जंगल?

ओडिशा में बचाए गए ओरंगुटान को इंडोनेशिया वापस मंगाना चाहता है, पर सरकार अभी उनकी जान बचाने पर केंद्रित है। सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को फ़ूड लेबलिंग की समय-सीमा तय करने को कहा। इंडोनेशिया की आग से पड़ोसी ...

ओडिशा में बचाए गए ओरंगुटान को इंडोनेशिया वापस मंगाना चाहता है, पर सरकार अभी उनकी जान बचाने पर केंद्रित है। सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को फ़ूड लेबलिंग की समय-सीमा तय करने को कहा। इंडोनेशिया की आग से पड़ोसी देशों में प्रदूषण बढ़ा। ओडिशा-छत्तीसगढ़-आंध्र में भारी बारिश का ऑरेंज अलर्ट। आदिवासी संगठनों ने वन भूमि नीति पर मंत्रालय की चुप्पी की निंदा की। आज चर्चा करेंगे डिंडौरी के जंगलों को साल बोरर से बचाने के अभियान के बारे में हमारे रिपोर्टर चंद्र प्रताप तिवारी से।

आज की प्रमुख हेडलाईन्स

इंडोनेशिया, ओडिशा के एक जंगल से बचाए गए पाँच बेबी ओरंगुटान को वापस मंगाने की कोशिश कर रहा है। इस बारे में खबरें आने के बाद राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा है कि फ़िलहाल उन्होंने वापसी के बारे में कुछ नहीं सोचा है। उनकी पहली प्राथमिकता इन बच्चों को ज़िंदा और सुरक्षित रखना है।

सूत्रों के अनुसार, इंडोनेशिया के वन मंत्रालय ने भारत की CITES मैनेजमेंट अथॉरिटी को इस सिलसिले में पत्र लिखा है। यह अथॉरिटी भारत में विदेशी वन्यजीवों के आयात-निर्यात को नियंत्रित करती है। पत्र में कहा गया है कि अगर जेनेटिक जाँच से यह साबित होता है कि ये ओरंगुटान इंडोनेशिया के ही हैं, तो उन्हें वापस भेजने में पूरी मदद की जाएगी।

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जनता के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को FSSAI (फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया) को एक अहम निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि FSSAI ‘फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग’ (FoPL) के दूसरे चरण को लागू करने के लिए एक स्पष्ट और वैज्ञानिक आधार पर तय समय-सीमा बनाए। यह लेबलिंग व्यवस्था लोगों को यह बताने के लिए है कि किसी पैक्ड फ़ूड में फ़ैट, शुगर या नमक की मात्रा ज़्यादा तो नहीं है।


इंडोनेशिया के बोर्नियो और सुमात्रा द्वीपों पर लगी भीषण आग के कारण हवा की गुणवत्ता तेज़ी से बिगड़ रही है। इसका असर पड़ोसी देशों मलेशिया, सिंगापुर और फिलीपींस पर भी पड़ रहा है।

नुसंतारा एटलस पोर्टल के एक स्वतंत्र अनुमान के मुताबिक, इस साल अब तक इंडोनेशिया में करीब 3 लाख हेक्टेयर ज़मीन जलकर राख हो चुकी है।

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बंगाल की खाड़ी में बने एक मौसम सिस्टम की वजह से भारत के कई हिस्सों में बारिश तेज़ हो गई है। इसे देखते हुए भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने ओडिशा, छत्तीसगढ़ और तटीय आंध्र प्रदेश के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। 11 सितंबर को इन इलाकों में भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है, और कहीं-कहीं 115.6 मिमी से 204.4 मिमी तक बारिश दर्ज की जा सकती है।

इसके अलावा उत्तराखंड, झारखंड, मध्य प्रदेश और तेलंगाना समेत कई राज्यों के लिए मौसम विभाग ने येलो अलर्ट जारी किया है, जहाँ भारी बारिश की आशंका है।


आदिवासी और वन-निवासी संगठनों ने केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) के हालिया रुख की कड़ी निंदा की है। मंत्रालय ने कहा है कि वन भूमि को दूसरे कामों में इस्तेमाल करने या जंगल काटने से पहले आदिवासियों और वन-निवासियों की सहमति ज़रूरी है या नहीं, इस पर उसकी कोई राय नहीं है और न ही इसमें उसकी कोई भूमिका है।

आदिवासी और वन-निवासियों के राष्ट्रीय मंच ‘कैंपेन फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी’ (CSD) के ज़रिए इन संगठनों ने कहा कि मंत्रालय अपनी ज़िम्मेदारी से बच रहा है। उनका आरोप है कि इस रुख से प्रोजेक्ट डेवलपर्स, ठेकेदारों और बड़ी कंपनियों को ही फ़ायदा होगा।


रिपोर्टर से बात

साल बोरर से प्रभावित होने के बाद काटे गए पेड़ | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

मध्य प्रदेश के डिंडौरी के जंगलों में साल बोरर का प्रकोप है। साल बोरर साल के पेड़ों को इस तरह छति पहुंचाता है कि इसे अगर नियंत्रित न किया जाए तो पूरा का पूरा जंगल काटना पड़ सकता है। इस वर्ष भी लाखों पेड़ इसी वजह से काटे जा रहे हैं। हालांकि वन विभाग ने स्थानीय समुदाय की मदद से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया है। हमारे रिपोर्टर चंद्र प्रताप तिवारी ने इन जंगलों की यात्रा की जंगल बचाने में जुटे वन विभाग और स्थानीय आदिवासी समुदायों के कार्य को समझा आईये उनसे समझते हैं कि इस रिपोर्टिंग के दौरान उनका क्या अनुभव रहा।

चंद्र प्रताप तिवारी, ग्राउंड रिपोर्ट


डिंडोरी के जंगलों में इस साल जब मैं साल के पेड़ों के बीच पहुंचा, तो सबसे पहले मेरा ध्यान किसी बड़े या सूखे पेड़ पर नहीं, बल्कि पेड़ों के तनों के पास पड़े बुरादे और एक कतार में तनों पर बने राल के निशानों पर गया।

ये दोनों ही साल बोरर के प्रकोप के संकेत थे।

इस कीड़े के हमले ने पेड़ों को कमजोर कर दिया था और उनकी छाल से बुरादा लगातार झड़कर जमीन पर जमा हो रहा था।

डिंडोरी के साल के जंगलों के लिए साल बोरर को लंबे समय से एक गंभीर खतरे के तौर पर देखा जाता है। लेकिन इस साल इस खतरे ने बड़े प्रकोप की शक्ल ले ली है।

वन विभाग के सर्वे के मुताबिक करीब 30 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र में लगभग 14 लाख 46 हजार साल के पेड़ इससे प्रभावित पाए गए हैं।

लेकिन इस कहानी में सिर्फ कीड़े और पेड़ नहीं हैं।

जब मैं इन जंगलों से लगे गांवों में पहुंचा, तो देखा कि जंगलों को बचाने की कोशिश में स्थानीय लोग भी इस अभियान का अहम हिस्सा बने हुए हैं।

वन विभाग ने साल बोरर के वयस्क कीड़ों को पकड़ने के लिए ट्रैप ट्री ऑपरेशन शुरू किया है। इसके तहत हर दो हेक्टेयर में एक साल का पेड़ काटकर उसकी छाल को पीटा जाता है। इससे निकलने वाली गंध वयस्क साल बोरर को आकर्षित करती है।

सुबह के समय गांव के लोग इन ट्रैप ट्री के आसपास पहुंचते हैं और वहां जमा हुए कीड़ों को पकड़ते हैं। पकड़े गए कीड़ों को मारने के बाद उनकी गिनती की जाती है और इसके बदले वन विभाग ग्रामीणों को प्रति कीड़ा दो रुपये का भुगतान करता है।

सुनने में यह तरीका थोड़ा असामान्य लग सकता है, लेकिन इसके पीछे का मकसद स्पष्ट है।

जितनी संख्या में वयस्क कीड़ों को जंगल से हटाया जाएगा, उतना ही उनकी अगली पीढ़ी के फैलाव को रोकने की कोशिश की जा सकेगी।

रिपोर्टिंग के दौरान एक बात और साफ हुई कि यह संकट अचानक सामने आया कोई नया खतरा नहीं है। साल बोरर का प्रकोप एक प्राकृतिक चक्र में लौटता रहा है। डिंडोरी में करीब तीन दशक पहले भी इसका व्यापक असर देखा गया था और अब 2026 में एक बार फिर यह खतरा सामने है।

लेकिन मेरी इस पूरी रिपोर्टिंग का असली सवाल यहीं से शुरू होता है।

अगर लाखों कीड़ों को पकड़ने के बावजूद इतने बड़े पैमाने पर साल के पेड़ प्रभावित हो रहे हैं, तो क्या सिर्फ वयस्क कीड़ों को पकड़ना इस समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त होगा?

स्थानीय लोग साल बोरर को पकड़कर इस तरह से माला बनाते हैं | फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

इसी के साथ वन विभाग ने गंभीर रूप से प्रभावित पेड़ों को हटाने की तैयारी भी शुरू की है और इसके लिए केंद्र से अनुमति मांगी गई है।

यानी एक तरफ जंगल को बचाने के लिए प्रभावित पेड़ों को काटने की तैयारी है और दूसरी तरफ उन्हीं जंगलों में पेड़ों की सुरक्षा के लिए हजारों की संख्या में कीड़े पकड़े जा रहे हैं।

डिंडोरी में रिपोर्टिंग करते हुए मुझे यह भी समझ आया कि यह सिर्फ एक कीट के प्रकोप की कहानी नहीं है। यह उस जंगल की कहानी है, जिस पर स्थानीय समुदाय की आजीविका निर्भर है और जिसकी पारिस्थितिकी में साल के पेड़ों की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका है।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने कीड़े पकड़े गए या कितने पेड़ काटे जाएंगे।

बड़ा सवाल यह है कि इस प्रकोप से साल के जंगलों को आखिर कितना नुकसान होगा और उस नुकसान को समय रहते रोकने के लिए हमारी तैयारियां कितनी प्रभावी हैं।

और तैयारियों का मतलब सिर्फ कार्रवाई नहीं है। इसमें समस्या की शुरुआती पहचान, उसकी नियमित निगरानी और समय पर हस्तक्षेप, तीनों बेहद महत्वपूर्ण हैं।

अगर संक्रमण को शुरुआती स्तर पर ही पहचान लिया जाए, तो प्रभावित पेड़ों को चिन्हित कर उन पर समय रहते कार्रवाई की जा सकती है और प्रकोप को बड़े क्षेत्र में फैलने से रोकने की संभावना बढ़ जाती है।

रिपोर्टिंग के दौरान यह भी सामने आया कि इस प्रकोप में मौसमी परिस्थितियों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ज्यादा नमी और लंबे समय तक बारिश जैसी परिस्थितियां इन कीड़ों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर सकती हैं।

इसके साथ ही, साल बोरर के नियंत्रण के लिए दूसरे वैज्ञानिक उपायों पर भी शोध जारी है। एसएफआरआई और टीएफआरआई जैसे वन अनुसंधान संस्थान इसके नियंत्रण के संभावित तरीकों पर काम कर रहे हैं। इनमें साल बोरर के प्राकृतिक शत्रु माने जाने वाले कीटों के इस्तेमाल जैसे जैविक नियंत्रण के उपाय भी शामिल हैं।

इन्हीं तमाम पहलुओं को समझने के लिए मैं डिंडोरी के जंगलों और गांवों में गया, वहां चल रही कार्रवाई को करीब से देखा और इस पूरे मसले को समझने की कोशिश की।

इस रिपोर्टिंग के दौरान जो कुछ सामने आया, उसकी विस्तृत रिपोर्ट अब हमारे दर्शकों और पाठकों के सामने है।

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We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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