देश में धान का रकबा 16% घटा, ओडिशा में मिले ओरंगुटान, केंद्र सरकार केवीके अपग्रेड करेगी, मप्र में इंटर्न डॉक्टर हड़ताल पर। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
कम बारिश के कारण देश में खरीफ फसलों की कुल बुवाई पिछले साल से 17.7 लाख हेक्टेयर कम रही है। हालांकि दलहन की बुवाई के रकबे में 2% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दूसरी तरफ, धान की बुवाई का रकबा 16% तक घट गया है।
ओडिशा के बालासोर जिले में ग्रामीणों ने जंगल के पास पांच छोटे ओरंगुटान देखे, जिसके बाद वन विभाग ने उन्हें रेस्क्यू किया। ओरंगुटान का प्राकृतिक आवास इंडोनेशिया और मलेशिया के कुछ हिस्से हैं। वन अधिकारियों को आशंका है कि इन जानवरों को अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी नेटवर्क के जरिए भारत लाया गया होगा।
केंद्र सरकार ने मार्च 2027 तक 300 प्राथमिक कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक्स को अपग्रेड करने का लक्ष्य तय किया है। देश में फिलहाल करीब 731 केवीके किसानों तक कृषि तकनीक, प्रशिक्षण और वैज्ञानिक सलाह पहुंचाने का काम कर रहे हैं। यह अपग्रेड ऐसे समय में हो रहा है जब कई केवीके में स्टाफ की कमी, फंड की देरी और कर्मचारियों से जुड़े पुराने मुद्दे अब भी बने हुए हैं।
बिहार के पटना समेत 14 जिलों में बाढ़ का पानी फैलने से 480 पंचायतें डूब गई हैं। इसके विपरीत, मुजफ्फरपुर सहित 7 जिलों में बारिश न होने से सूखे के हालात पैदा हो गए हैं। पानी की कमी से धान की फसलें बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं।
रीवा के संजय गांधी अस्पताल में भर्ती सतना की महिला मरीज की इलाज के दौरान मौत हो गई। परिजनों ने आरोप लगाया है कि मरीज के शरीर और बेड पर कीड़े रेंग रहे थे। अस्पताल प्रबंधन ने लापरवाही के आरोपों को खारिज किया है।
भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज में स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर इंटर्न डॉक्टर हड़ताल पर हैं। इसके चलते हमीदिया अस्पताल में ओपीडी और ऑपरेशन सेवाएं प्रभावित हुई हैं। डॉक्टरों के प्रदर्शन के कारण सड़कों पर चक्काजाम की स्थिति भी बनी।
विस्तृत चर्चा
द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) और इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेंस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट (IGSD) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2030 के दशक तक मध्य प्रदेश में दिन और रात का तापमान बढ़ सकता है। इस बारे में विस्तार से जानिए पल्लव जैन से।
गर्म होता मध्य प्रदेश
द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) और इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेंस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट (IGSD) ने अपनी एक संयुक्त रिपोर्ट, “नॉन-CO2 एमिशन रिडक्शन पाथवेज़ फॉर मध्य प्रदेश: अ मल्टीसेक्टरल असेसमेंट” जारी की है।
रिपोर्ट मध्य प्रदेश की जलवायु में एक चिंताजनक बदलाव को उजागर करती है। जो कार्बन डाइऑक्साइड से इतर कारणों से 2030 के दशक तक औसत तापमान में महत्वपूर्ण वृद्धि का अनुमान लगाती है।
अध्ययन गैर-CO2 प्रदूषकों—विशेष रूप से पशुपालन और लैंडफिल से मीथेन, परिवहन से नाइट्रोजन ऑक्साइड, और पराली जलाने से ब्लैक कार्बन—को इस ग्लोबल वार्मिंग का प्राथमिक कारक मानता है। जहां इंदौर जैसे प्रमुख शहरी केंद्र औद्योगिक और कचरे से जुड़े उत्सर्जन से जूझ रहे हैं, वहीं डिंडोरी और भिंड जैसे ग्रामीण ज़िलों को उनकी कम अनुकूलन क्षमता के कारण सबसे संवेदनशील घोषित किया गया है।
अंततः यह रिपोर्ट एक रणनीतिक रोडमैप के रूप में कार्य करती है, जो राज्य से इन शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसों को रोकने के लिए टिकाऊ खेती और नियमित पशुपालन जैसे शमन उपायों को अपनाने का आग्रह करती है।
इसके अनुसार 2030 के दशक तक, मध्य प्रदेश के औसत अधिकतम दिन के तापमान में 1.8°C से 2°C की वृद्धि का अनुमान है, जबकि औसत न्यूनतम रात का तापमान 2°C से 2.4°C तक बढ़ सकता है।
रिपोर्ट में बताया गया कि मध्य प्रदेश का पूर्वी हिस्सा अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक तेज़ गति से गर्म हो रहा है।
ज़िलों की संवेदनशीलता और क्षेत्रीय हॉटस्पॉट
सर्वाधिक संवेदनशील ज़िले: डिंडोरी, भिंड और सीधी में गर्मी के दबाव और बढ़ते तापमान से निपटने की क्षमता कम है, जो उन्हें सबसे संवेदनशील ज़िलों में रखता है।
प्रमुख शहरी केंद्र (भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर): वाहनों का आवागमन, उद्योग और कचरा प्रबंधन प्राथमिक चुनौतियां हैं, जहां कचरे से निकलने वाली मीथेन गैस स्थानीय तापमान वृद्धि को काफी हद तक बढ़ा रही है।
इंदौर की स्थिति: यद्यपि इंदौर नगर निगम को कचरा प्रबंधन के लिए एक राष्ट्रीय मॉडल के रूप में मान्यता प्राप्त है और यह कार्बन क्रेडिट से राजस्व अर्जित करता है, फिर भी लैंडफिल कचरे से निकलने वाली मीथेन गैस तापमान वृद्धि का एक प्रमुख कारण बनी हुई है।
पशुपालन मीथेन हॉटस्पॉट: सागर, मुरैना, रीवा, खरगोन और छिंदवाड़ा पशुपालन से निकलने वाली मीथेन उत्सर्जन के प्रमुख हॉटस्पॉट हैं।
सिंगरौली का दोहरा प्रभाव: सिंगरौली दोहरी मार झेल रहा है, जहां कोयला खनन से मीथेन निकलती है जबकि तापीय विद्युत उत्पादन और औद्योगिक इकाइयाँ सामान्य वायु प्रदूषण को बढ़ाती हैं।
उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत और मुख्य आंकड़े
पशुपालन: पशुपालन मीथेन का सबसे बड़ा स्रोत है, जो राज्य में 60% मीथेन गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है।
बिजली और परिवहन: बिजली उत्पादन और परिवहन मिलकर 92% नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन उत्पन्न करते हैं।
घरेलू खाना पकाना और जैव ईंधन: पारंपरिक घरेलू चूल्हों में खाना पकाने के लिए लकड़ी और अन्य जैव ईंधन का उपयोग 49% तक उत्सर्जन उत्पन्न करता है।
पराली जलाना: कृषि फसल अवशेष (पराली) जलाने से 47% ब्लैक कार्बन उत्सर्जन होता है।
अनुशंसित समाधान और शमन के उपाय
खेती में जल प्रबंधन: चावल/धान की खेती के दौरान जल-कुशल प्रथाओं को अपनाने से उत्सर्जन कम हो सकता है।
पशुपालन का नियमन: पशुपालन गतिविधियों को नियमित करके मीथेन उत्पादन को कम करने में मदद मिल सकती है।
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