पर्यावरण आज में बात, बुंदेलखंड में भारी बारिश से खरीफ फसलें बर्बाद हुईं, केवल धान बचा है। अगस्त 2026 अब तक का सबसे गर्म महीना रहा, जिससे यूरोप में सूखा और तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा। मध्य प्रदेश में फ्लाई ऐश न इस्तेमाल करने पर जुर्माना तय हुआ। हाई कोर्ट ने ई-रिक्शा नीति बनाने के निर्देश दिए। अलीराजपुर में सूखे से किसान प्रदर्शन कर रहे हैं और विस्तार से चर्चा करेंगे नागालैंड में भूस्खलन से ज़मीन अस्थिर होने का खतरा बढ़ने पर।
आज की प्रमुख हेडलाईन्स
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में इस वर्ष हुई भारी बारिश की वजह से किसानों की खरीफ की फसलों को नुकसान हुआ है। मौसम विभाग के अनुसार महोबा और चित्रकूट में सामान्य से 76 फीसदी अधिक बारिश दर्ज हुई, जिसकी वजह से बाढ़ जैसे हालात बने।
बुंदेलखंड में मानसून के दौरान तिल, मूंगफली, ज्वार, उड़द और कुछ इलाकों में कपास की खेती की जाती है। ये सभी फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गई हैं। सिर्फ़ धान की फसल बची है, और अगर सितंबर में बारिश होती है — जब धान पूरी तरह तैयार हो चुका होगा — तो उसे भी भारी नुकसान की आशंका है।
अगस्त 2026, जुलाई 2023 के बराबर अब तक का सबसे गर्म महीना रहा। इस दौरान वैश्विक तापमान प्री-इंडस्ट्रियल स्तर से 1.65°C और 1991-2020 के औसत से 0.85°C ज़्यादा रहा।
ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन और मज़बूत अल नीनो (El Niño) की वजह से समुद्रों का तापमान रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ गया। साथ ही, पश्चिमी यूरोप में भयंकर सूखा, जंगल की आग और नदियों में पानी का बहाव बहुत कम रहा, जबकि दुनिया भर में कहीं अत्यधिक बारिश तो कहीं सूखे जैसी विपरीत परिस्थितियाँ देखने को मिलीं।
मध्य प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने सरकारी निर्माण कार्यों में फ्लाई ऐश का इस्तेमाल न करने पर सरकारी एजेंसियों पर 1500 रुपए प्रति टन की दर से जुर्माना लगाने के निर्देश दिए हैं। वर्ष 2021 में केंद्र सरकार ने सरकारी निर्माण कार्यों में फ्लाई ऐश के इस्तेमाल के आदेश दिए थे, लेकिन इसका सख्ती से पालन न होने की वजह से थर्मल पावर प्लांट्स में राख का अंबार बढ़ता जा रहा है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने केंद्र सरकार को सड़कों पर कितने ई-रिक्शा चलेंगे, इसे लेकर 60 दिन में नीति बनाने को कहा है। इसके बाद मध्य प्रदेश सरकार को 10 सितंबर से 120 दिन के भीतर अपनी व्यापक नीति अधिसूचित करने को कहा गया है। इसका उद्देश्य स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से ई-रिक्शा की संख्या को नियंत्रित करना है।
मध्य प्रदेश के अलीराजपुर में सूखे से फसलें खराब हो गई हैं। किसान सूखी फसल लेकर कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन कर रहे हैं और इलाके को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग कर रहे हैं।
आज की चर्चा
19 जुलाई को नागालैंड के लॉन्गलेंग और मोन ज़िलों में हुए भूस्खलन ने इस डर को फिर से जगा दिया है कि डिखो बेसिन के कुछ हिस्सों में ज़मीन लंबे समय तक अस्थिर रह सकती है। यह पूरा मामला क्या है, समझते हैं हमारे रिपोर्टर चंद्र प्रताप तिवारी से।
19 जुलाई को नागालैंड के लॉन्गलेंग और मोन जिलों में बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ। भारी बारिश के बाद कई जगह पहाड़ खिसके, सड़कें टूट गईं और घरों में दरारें आ गईं।
तमलू इलाके में एक बड़े भूस्खलन की चपेट में 10 से 12 घर आ गए। इस घटना में आठ लोग दब गए, जिनमें से छह लोगों के शव बरामद किए गए, जबकि दो लोग अब भी लापता हैं। इसके बाद से इलाके में लगातार हो रहे भूस्खलन को लेकर चिंता बनी हुई है।
लॉन्गलेंग के तमलू और आसपास के गांवों में लोगों ने जमीन और सड़कों में नई दरारें देखी हैं। कुछ जगह पुराने झरने और जलस्रोत गायब हो गए, जबकि कुछ अन्य जगहों पर नए तालाब बन गए। एक नाले का रास्ता भी बदल गया, जिससे खेतों में पानी भर गया और फसल को नुकसान पहुंचा।
लॉन्गलेंग के डिप्टी कमिश्नर के मुताबिक, जिले के हर गांव में किसी न किसी स्तर पर नुकसान हुआ है। कई गांव चार से पांच दिनों तक सड़क संपर्क से कटे रहे।
मोन शहर में भी 200 से ज्यादा घर प्रभावित हुए, जिनमें से करीब 70 घर पूरी तरह तबाह हो गए। पांच स्कूलों को नुकसान पहुंचा, जिससे करीब 1,110 छात्र प्रभावित हुए।
इन घटनाओं ने नागालैंड के नोकलाक और तुएनसांग की पुरानी समस्या की याद दिला दी है। इन दोनों जगहों पर जमीन का खिसकना कई वर्षों से जारी है, और समय के साथ इसका दायरा बढ़ता गया है। नोकलाक में जमीन धंसने की प्रक्रिया 1980 के आसपास शुरू हुई थी, और 2022 तक इसका असर शहर के करीब एक-चौथाई हिस्से तक पहुंच गया था।
हालांकि, विशेषज्ञ फिलहाल तमलू की तुलना नोकलाक से करने को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। नागालैंड यूनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिकों के मुताबिक, 19 जुलाई की घटना के पीछे भारी बारिश एक प्रमुख कारण हो सकती है। लगातार बारिश से मिट्टी में नमी और जमीन के भीतर पानी का दबाव बढ़ता है, जिससे कमजोर ढलानों के खिसकने का खतरा बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इलाके की भूगर्भीय बनावट और जल निकासी की स्थिति भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वहीं कुछ विशेषज्ञों ने सड़क निर्माण, पहाड़ों की कटाई और अन्य मानवीय गतिविधियों की भूमिका की भी जांच करने की जरूरत बताई है।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि तमलू और लॉन्गलेंग में जारी भूस्खलन, नोकलाक या तुएनसांग जैसी दीर्घकालिक प्रक्रिया का रूप ले रहा है या नहीं। इसके लिए विस्तृत भूवैज्ञानिक और वैज्ञानिक जांच की जरूरत है।
फिलहाल, 19 जुलाई की घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या बारिश के बाद शुरू हुआ यह भूस्खलन यहीं थम जाएगा, या आने वाले मानसून में जमीन खिसकने की समस्या और गंभीर हो सकती है।
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