अरावली की परिभाषा पर कमिटी को और समय नहीं मिलेगा, अनाज क्वालिटी चेक के लिए एआई का इस्तेमाल, बिहार के 13 जिलों में बाढ़, अडानी के प्रोजेक्ट के खिलाफ याचिका ख़ारिज। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली से जुड़ी हाई-पावर्ड कमेटी की समय सीमा को फरवरी 2027 तक बढ़ाने की अर्जी नामंजूर कर दी है। इस पर अरावली विरासत जन अभियान ने चिंता जताई कि अतिरिक्त समय न मिलने से अरावली का अध्ययन जल्दबाजी में पूरा हो सकता है।
सेंट्रल वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन देश में कृषि निर्यात को बढ़ावा देने और बर्बादी रोकने के लिए सिंगल-विंडो लॉजिस्टिक्स समाधान विकसित कर रहा है। भारत में सालाना लगभग 36 करोड़ टन फलों और सब्जियों का उत्पादन होता है। लेकिन कोल्ड-चेन और बुनियादी ढांचे की कमी से फसल कटाई के बाद करीब 25% से 30% उपज बर्बाद हो जाती है।
गुजरात सरकार ने अनाज खरीद की गुणवत्ता जांच को मजबूत करने के लिए एआई आधारित अनाज विश्लेषक उपकरणों का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है। इस प्रणाली को 4 जिलों (अहमदाबाद, महीसागर, आणंद और पंचमहल) के 10 केंद्रों पर तैनात किया गया है।
भारी बारिश और नदियों के उफान से बिहार के 13 जिलों में भयंकर बाढ़ आ गई है, जिससे 27 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। सितंबर माह में राज्य में अब तक सामान्य से 55% अधिक बारिश दर्ज की जा चुकी है। पटना में गंगा के अलावा गंडक, बूढ़ी गंडक और घाघरा नदियां भी कई स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने सिंगरोली में अडानी पावर की सहायक कंपनी ‘महान एनर्जी लिमिटेड’ के प्रोजेक्ट की पर्यावरणीय मंजूरी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे ने एनजीटी (NGT) के 22 अप्रैल 2026 के आदेश को चुनौती दी थी। याचिका में सिंगरोली के घने जंगलों में एक संवेदनशील हाथी कॉरिडोर के 1,400 हेक्टेयर क्षेत्र में 6 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई का मुद्दा उठाया गया था।
कान्हा टाइगर रिजर्व के नजदीकी गांवों में रहने वाले करीब 3,000 कुत्तों का बूस्टर डोज तक टीकाकरण पूरा कर लिया गया है। अप्रैल और मई के अंत में ‘कैनाइन डिस्टेम्पर वायरस’ (CDV) के फैलने से एक बाघिन और उसके चार शावकों की मौत के बाद यह कदम उठाया गया था।
विस्तृत चर्चा
केंद्र सरकार के स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में मध्य प्रदेश के तीन बड़े शहरों ने टॉप-4 में स्थान बनाया है। 10 लाख से अधिक आबादी की श्रेणी में लखनऊ 198 अंकों के साथ पहले स्थान पर रहा। इस पर विस्तार से जानिए वाहिद भट से।
कैसे हुआ स्वच्छ वायु सर्वेक्षण?
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ ने स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026 में 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की श्रेणी में पहला स्थान हासिल किया है। हवा के प्रदूषण को कम करने के लिए लखनऊ में कचरा उठाने वाली गाड़ियों में इलेक्ट्रिक वाहन शामिल किए गए, सड़कों की धूल कम करने के लिए मशीनों से सफाई की गई और पुराने कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया गया।
इस रैंकिंग में इंदौर दूसरे और जबलपुर तीसरे स्थान पर रहे। इंदौर को देश का सबसे स्वच्छ शहर भी घोषित किया जा चुका है। वहीं दूसरी ओर चेन्नई, जमशेदपुर, कोटा, कोलकाता और मदुरै 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की श्रेणी में आखिरी पांच स्थानों पर रहे। दिल्ली 30वें और मुंबई 37वें स्थान पर रही।
लखनऊ की हवा सबसे ‘क्लीन’
लखनऊ के पहले स्थान पर आने के बावजूद वहां की हवा की स्थिति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है। एनसीएपी पोर्टल के मुताबिक, शहर में PM10 का वार्षिक स्तर अब भी राष्ट्रीय मानक से काफी ऊपर है। राष्ट्रीय मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है, जबकि लखनऊ में यह स्तर 137 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया है।
हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सुधार जरूर हुआ है। 2017-18 में लखनऊ में PM10 का वार्षिक स्तर 250 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जो अब घटकर 137 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रह गया है। यानी प्रदूषण में कमी आई है, लेकिन लक्ष्य अभी भी काफी दूर है।
जबलपुर में क्या कदम उठाए गए?
जबलपुर ने भी हवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए कई कदम उठाए हैं। शहर में वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट स्थापित किया गया है, कचरे का 100 प्रतिशत संग्रह और उसका वैज्ञानिक तरीके से निपटान किया जा रहा है। इसके अलावा मशीनों से सड़कों की सफाई और इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल को भी बढ़ावा दिया गया है।
इस सर्वेक्षण में सिर्फ हवा में PM10 का स्तर नहीं देखा जाता। शहरों में कचरा प्रबंधन, सड़कों की धूल पर नियंत्रण, निर्माण और तोड़फोड़ से निकलने वाली धूल, वाहनों और औद्योगिक प्रदूषण में कमी जैसे कई पहलुओं का भी आकलन किया जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि PM10 के स्तर में कमी को अंतिम रैंकिंग में सिर्फ 2.5 प्रतिशत वज़न दिया गया है। पहले राज्यों के स्तर पर शहरों का मूल्यांकन होता है। इसके बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) इसकी जांच करता है और स्वतंत्र समितियां मैदान में जाकर इन उपायों का सत्यापन करती हैं।
कब शुरू हुआ प्रोग्राम?
10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों के अलावा, 3 से 10 लाख आबादी वाले शहरों की श्रेणी में राउरकेला पहले, फिरोजाबाद और गुंटूर संयुक्त रूप से दूसरे, जबकि अमरावती तीसरे स्थान पर रहा। वहीं 3 लाख से कम आबादी वाले शहरों में कलिंगनगर पहले, अंगुल दूसरे और तालचेर तीसरे स्थान पर रहे।
यह रैंकिंग नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत जारी की जाती है। यह कार्यक्रम जनवरी 2019 में शुरू हुआ था और इसमें 130 शहरों को शामिल किया गया। इसका लक्ष्य 2025-26 तक 2019-20 के मुकाबले PM10 के स्तर में 40 प्रतिशत की कमी लाना था।
लेकिन तस्वीर अभी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। NCAP के पहले लक्ष्य अवधि के दौरान 130 शहरों में से केवल 14 शहर ही राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों को हासिल कर सके।
यानी लखनऊ का पहला स्थान यह जरूर दिखाता है कि सुधार की दिशा में प्रगति हुई है, लेकिन यह भी साफ करता है कि शहरों में वायु प्रदूषण कम करने के लिए सिर्फ सफाई अभियान नहीं, बल्कि यातायात, धूल, कचरा प्रबंधन और औद्योगिक प्रदूषण पर लगातार और व्यापक काम करना अभी भी जरूरी है।
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