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नेपाल के प्रधानमंत्री पर यूएन जनरल असेंबली में शामिल होने का दबाव क्यों है?

नेपाल की क्लाइमेट जस्टिस की मांग से लेकर बलाघाट के आदिवासियों तक जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ

भारत की इन्सटाल्ड पॉवर कैपेसिटी चार गुनी होने का अनुमान, दिल्ली में मुफ्त रूफटॉप सोलर मिलेंगे, जम्मू कश्मीर में अर्ली फ्लड वार्निंग सिस्टम, बलाघात में अब तक 27 बच्चों की मौत, कैमरों से होगी सीवेज की निगरानी। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।


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मुख्य सुर्खियां

भारत की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता वर्ष 2047 तक 2,000 गीगावाट (GW) से अधिक होने का अनुमान है। यह वर्तमान स्तर से लगभग चार गुना अधिक होगी। इसका मुख्य कारण स्वच्छ ऊर्जा और विशेष रूप से सौर ऊर्जा का तेजी से विस्तार है। 


दिल्ली सरकार ने अपनी संशोधित ‘दिल्ली सौर नीति’ के तहत शहर के लगभग 2.30 लाख घरों में मुफ्त 3 किलोवाट (kW) के रूफटॉप सोलर पैनल वितरित करने का लक्ष्य रखा है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मंगलवार को कैबिनेट बैठक के बाद आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस योजना की घोषणा की। इस नीति का मुख्य उद्देश्य दिल्ली में सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना और घरेलू बिजली बिलों को कम करना है।

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जम्मू-कश्मीर पावर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन ने तीन प्रमुख पनबिजली परियोजनाओं पर प्रारंभिक बाढ़ चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए निविदाएं जारी की हैं। इनमें चिनाब नदी पर 900 मेगावाट की बागलीहार परियोजना, सिंध नदी पर 105 मेगावाट की अपर सिंध परियोजना, और पूंछ जिले में सुरा नदी पर 37.5 मेगावाट की परनाई परियोजना शामिल हैं। यह प्रणाली निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को बाढ़ आने से 1 से 2 घंटे पहले सचेत करेगी।


भारत में अत्यधिक उमस और गर्मी के कारण अगस्त 2026 में बिजली की खपत पिछले वर्ष की तुलना में 12.85 प्रतिशत बढ़कर 169 बिलियन यूनिट दर्ज की गई। अगस्त 2025 में यह खपत 149.76 बिलियन यूनिट थी। इस वृद्धि का मुख्य कारण एयर कंडीशनर और अन्य कूलिंग उपकरणों का बढ़ता उपयोग है।


मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के आदिवासी बहुल गांवों में जून के आखिरी हफ्ते से बच्चों के बीमार होने का सिलसिला जारी है। अब तक 27 बच्चों की मौत हो चुकी है और 132 बच्चे जिला अस्पताल में भर्ती हैं। अस्पताल के पीआईसीयू और पीडियाट्रिक वार्ड में बिस्तरों की भारी कमी के कारण एक बेड पर 2-3 बच्चों का इलाज किया जा रहा है। 

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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की भोपाल बेंच ने बड़े और छोटे तालाबों में सीवेज गिरने से रोकने के लिए सख्त निर्देश दिए हैं। एनजीटी ने चिन्हित नालों के आउटफॉल पर पीटीजेड कैमरे और डिजिटल फ्लो मीटर लगाने का आदेश दिया है। इससे यह रिकॉर्ड रहेगा कि किस नाले से कितना सीवेज तालाबों में गिर रहा है। 

विस्तृत चर्चा

हालिया त्रासदी के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह पर संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के आगामी सत्र में शामिल होने का दबाव बढ़ रहा है। नेपाल इसके ज़रिए किन मुद्दों को उठाना चाहता है जानिए पल्लव जैन से।

भीषण तबाही के बाद नेपाल का अंतरराष्ट्रीय रुख

नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ के कारण मरने वालों की संख्या 1000 के पार पहुंच चुकी है। इसके साथ ही, लगभग 4000 लोग अभी भी लापता हैं।

त्रिशुली नदी के किनारे के क्षेत्रों में, जहां भोते कोशी नदी का मिलन होता है, शवों को सुरक्षित रखने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। इस गंभीर स्थिति के कारण सरकार को अज्ञात शवों को अस्थाई रूप से दफनाने (मास बरियल) का निर्णय लेना पड़ा है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रतिनिधित्व और राजनीतिक दबाव

देश में आई अब तक की इस सबसे भीषण आपदा के बाद, नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र (बालन) शाह पर उनकी सरकार और सत्ताधारी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की ओर से लगातार दबाव बनाया जा रहा है। वे चाहते हैं कि प्रधानमंत्री न्यूयॉर्क में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में नेपाल के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करें।

अंतरराष्ट्रीय समर्थन और जलवायु न्याय की मांग 

सरकार चाहती है कि प्रधानमंत्री इस मंच का उपयोग कर नेपाल के लिए जलवायु न्याय (क्लाइमेट जस्टिस) की मांग करें। इसके साथ ही, आपदा के बाद पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) और पुनर्निर्माण (रिकंस्ट्रक्शन) के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाएं और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र (हिमालय इकोसिस्टम) की सुरक्षा के लिए एक मजबूत वैश्विक प्रतिक्रिया की मांग करें।

इससे पहले, नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल यूएनजीए में नेपाल का नेतृत्व करने वाले थे, लेकिन सरकार चाहती है कि प्रधानमंत्री स्वयं वहां जाएं। हालांकि, अभी तक प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की ओर से इस बात की पुष्टि नहीं की गई है।

जलवायु न्याय और मुआवजे की मांग

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल के अनुसार, वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल का योगदान लगभग ना के बराबर है। इसके बावजूद, देश उस जलवायु संकट का सबसे बुरा खामियाजा भुगत रहा है, जिसे पैदा करने में उसकी भूमिका अत्यंत सीमित रही है।

विदेश मंत्री खनाल का स्पष्ट मानना है कि नेपाल को अब किसी प्रकार की दान या चैरिटी की मदद नहीं चाहिए, बल्कि न्याय और मुआवजा चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कोई दान का मामला नहीं है, बल्कि एक कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी का विषय है।

प्रमुख प्रदूषक देशों की जिम्मेदारी 

उन्होंने वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जित करने वाले देशों को रेखांकित किया, जिसमें चीन पहले स्थान पर, अमेरिका दूसरे स्थान पर और भारत तीसरे स्थान पर है। इन बड़े औद्योगिक उत्सर्जक देशों की यह कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे नेपाल जैसे जलवायु-संवेदनशील और कमजोर देशों को मुआवजा दें।

इस फंड पर वर्ष 2022 में कॉप 27 (COP27) के दौरान सहमति बनी थी और इसने कॉप 28 (COP28) से काम करना शुरू कर दिया था। प्राप्त खबरों के अनुसार, नेपाल इस सिस्टम से मदद प्राप्त करने के लिए पहली बार अपनी अर्जी (आवेदन) लगा रहा है।

बचाव और पुनर्निर्माण का भारी वित्तीय बोझ 

नेपाल के वन मंत्रालय में संयुक्त सचिव और इस फंड के बोर्ड सदस्य महेश्वर ढकाल ने जानकारी दी कि आपदा के इतने बड़े पैमाने ने देश के ऊपर खोज और बचाव कार्यों, आपातकालीन राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण से जुड़ा भारी वित्तीय बोझ खड़ा कर दिया है।

महेश्वर ढकाल ने स्पष्ट किया कि नेपाल वास्तव में जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों से जूझ रहा है और इसीलिए उन्होंने फंड के बोर्ड से संपर्क किया है। नेपाल चाहता है कि बोर्ड दिसंबर में होने वाली अपनी अगली निर्धारित बैठक का इंतजार करने के बजाय इस मामले पर तत्काल कार्रवाई करे।

वैश्विक स्तर पर छोटे देशों की स्थिति और बड़े देशों की बेरुखी 

नेपाल की तरह ही कई अन्य छोटे देश, जो जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे हैं, लगातार इस तरह के मुआवजे और न्याय की मांग कर रहे हैं। हालांकि, बड़े और अमीर देश अपनी इन जिम्मेदारियों से लगातार बचते और भागते नजर आते हैं।

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Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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