नंदूड़ी खड़िया अपने, झाबुआ जिले के पेटलावद के अंतर्गत आने वाले धनपुरा गांव घर के सामने लगभग 15 तरह के बीज लेकर बैठी हुई थीं। इसमें 2 प्रकार की तुअर, एक से अधिक किस्म के गेहूं, 2 प्रकार का चना और मक्का सहित कई आनाज, मिलेट, दालें और सब्ज़ियों के बीज शामिल थे। यह भील आदिवासी महिला अपनी 2 बीघा ज़मीन पर इन्हीं बीजों से खेती करती है।
वो इन्हें उगाने के लिए न तो किसी कैमिकल खाद का उपयोग करती हैं और ना ही किसी अन्य रसायन का। “बाज़ार का खाद डालते तो बीमार होते हैं और (इन्हें खरीदने में) हमारे पैसे लगते हैं।” खड़िया का कहना था कि हाईब्रीड बीज हर बार बाज़ार से लेकर आना पड़ता है जबकि देसी बीज से खेती में मेहनत तो लगती है मगर पैसा नहीं।
खड़िया अकेली नहीं हैं। उनकी तरह कम से कम 6000 महिलाएं झाबुआ के अलग-अलग गांवों में देसी बीज संरक्षण या इसकी खेती से जुड़ी हुई थीं। लगभग 2 दशक पहले यह महिलाएं संपर्क समाज सेवी संस्था के साथ जुड़ीं। हाईब्रीड बीज के खतरों को देखते हुए देसी बीज संग्रहण का काम कई गांवों तक पहुंच गया। 20 साल पहले ये संपर्क से बीज खरीद रही थीं अब संस्था और अन्य ग्रामीण इनसे देसी बीज खरीदते हैं।
भारत में हरित क्रांति के बाद बीज इंडस्ट्री का तेज़ी से विस्तार हुआ। बाज़ार में हाईब्रीड बीज आए तो देसी बीज ख़त्म होते गए। मगर ग्रामीण इनके बेस्वाद और रसायन आधारित होने की शिकायत करते हैं। विशेषज्ञों का भी मानना है कि देश में हाईब्रीड बीज से उत्पादन भले ही बढ़ा हो मगर पोषण कम हुआ है। वो बदलती जलवायु और चरम मौसमी घटनाओं के बीज झाबुआ के ऐसे प्रयासों को बढ़ाने की वकालत करते हैं।

कैसे शुरू हुआ देसी बीज संरक्षण?
2002 में भारत में बीटी कपास को पहली जेनेटिकली मोडिफाइड (जीएम) फसल के रूप में मान्यता मिली। संपर्क समाज सेवी संस्था के निलेश देसाई उन लोगों में से शामिल थे जिन्होंने जीएम फसलों का खुलकर विरोध किया। उस दौर को याद करते हुए देसाई ने बताया, “झाबुआ में उस वक़्त किसान तेज़ी से बीटी कपास अपना रहे थे। मगर जब मैंने जीएम से संबंधित लेख पढ़े तो समझ आया कि यह आने वाले दिनों में किसानों और प्रकृति के लिए खतरनाक होगा।”
देसाई के अनुसार उस वक़्त उनकी संस्था का कोई भी सदस्य इस बात को किसानों से नहीं बोल सकता था कि वह ये बीज न लगाएं। ऐसे में उन्होंने इसके उपाए खोजने शुरू किए। संपर्क ने स्कूल के बच्चों को एक थैली में उनके घरों से बीज लाने को कहा। इस दौरान जो बीज आए उनमें से ज़्यादातर हाईब्रीड थे। मगर कुछ देसी बीज भी थे। संस्था ने ऐसे अभिभावकों से संपर्क किया जिनके घरों से ये देसी बीज आए थे।
उन्होंने पेटलावद के बाहर रामा और अन्य ब्लॉक से भी देसी बीज इकठ्ठा किए। इस तरह पेटलावद के पास संपर्क समाज सेवी संस्था के परिसर में ही पहला बीज बैंक स्थापित हुआ।
बीज बैंक एक तरह के जीन बैंक होते हैं जहां अलग-अलग तरह की फसलों और पेड़ों के बीज स्टोर किए जाते हैं। इसका मकसद जेनेटिक रिसोर्स और उनकी वैरायटी को बचाना है ताकि दुनिया भर के साइंटिस्ट, प्लांट ब्रीडर और किसान इसका इस्तेमाल कर सकें।
एक सामुदायिक बीज बैंक स्थानीय फसल किस्मों और उससे जुड़ी जानकारी को संभालकर रखता है। इसका नियंत्रण समुदाय के पास होता है।
यह संस्था बीजों पर काम करने वाले संगठनों के गठबंधन ‘भारत बीज स्वराज मंच’ का हिस्सा है। इसलिए संस्था ने देश के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित बीज मेलों में शामिल होकर भी देसी बीज इकठ्ठा किए।
आज संपर्क के बीज बैंक में 600 प्रजातियों के बीज हैं।

अभी कैसे होता है बीजों का संरक्षण
देसी बीजों को संरक्षित करने की पहल का उद्देश्य केवल बीज मेलों में प्रदर्शन या सिर्फ बैंक में जमा करके रखना नहीं था। खेती में इसके इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए संपर्क ने ‘बीज सखियां’ तैयार की। ये महिलाएं देसी बीज का उत्पादन करती हैं। इसके अलावा ‘बीज सेवर’ और ‘बीज यूजर’ भी संरक्षण के नेटवर्क का हिस्सा हैं। इनका काम क्रमशः बिना केमिकल के बीज बचाना और इस्तेमाल करना है।
खड़िया जैसी बीज सखियां गांव के स्तर पर इन बीजों को संग्रहित और संरक्षित करके रखती हैं। वो फसल के एक हिस्से को बीज की तरह बचाती हैं। “गांव में किसी को थोड़े से बीज की ज़रूरत होती है तो मैं ऐसे ही दे देती हूं। ज्यादा चाहिए होता है तो बाज़ार भाव से उसका पैसा लेती हूं।” इन बीजों के विनमय के बारे में बताते हुए खड़िया ने कहा।
यानि यह संरक्षण विकेंद्रीकृत तरीके से हो रहा है जहां संपर्क के परिसर के अलावा गांवों में बीज संग्रहण हो रहा है।
यहां बीज खरीदने का हिसाब बहुत सीधा है। अगर किसी ने एक किलो बीज लिया है तो उसे अपने उत्पादन में से डेढ़ किलो बीज वापस करने होते। इस तरह बीज बैंक भी खाली नहीं होता और खेती भी होती रहती।
रंगपुरा की बद्दो मुनिया ने बताया कि 10 साल पहले बीज, खाद और रसायन पर उन्होंने हर साल कम से कम 35 हज़ार रुपए खर्च किए। अब वो गोबर, राख और पेड़ों की छाल से बनी खाद का इस्तेमाल करती हैं। इसके अलावा उन्हें हर साल बीज खरीदने की बाध्यता से छुटकारा मिल चुका है। अब यही 35 हज़ार उनकी बचत है।

भारतीय बीज बाज़ार, खर्च और पोषण का सवाल
भारत में 1960 के दशक में हुई हरित क्रांति का मुख्य मकसद गरीबी और कुपोषण को कम करने के लिए अनाज की ज़्यादा पैदावार वाली किस्में (HYVs) लाना था। इसके बाद देश में हाईब्रीड बीज का का विस्तार हुआ।
2025 में भारतीय बीज बाज़ार का अनुमानित आकार 79,498 करोड़ रु था। मक्का, चावल, कपास और सब्ज़ियों की किस्मों के लिए ज़्यादा पैदावार वाले हाइब्रिड बीजों की बढ़ती मांग के साथ 2034 तक इसके बढ़कर 1,85,840 करोड़ रु होने का अनुमान है।
हाईब्रीड बीज आम तौर पर 2 वैराइटी के बीच कृत्रिम तरीके से क्रॉस पॉलिनेशन करके बनाए जाते हैं। यह बेहतर उत्पादन और बीमारियों या कीटों से बचाव के गुणों से भरपूर होते हैं। जबकि देसी बीज किसी भी जगह में सालों से उगाई जा रही स्थानीय फसल के फल के बीज होते हैं। इसमें प्राकृतिक रूप से पॉलिनेशन होता है।
कृषि वर्ष 2024-25 में, भारत ने 357.73 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) का खाद्यान्न उत्पादन दर्ज किया। ये 2023-24 की तुलना में 25.43 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) अधिक था।
तेलंगाना स्थित सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ जीवी रामंजनेयुलु के कहा कि हरित क्रांति के बाद भारत में उत्पादन पर ज्यादा जोर दिया गया है मगर पोषण पर नहीं।
एक शोध के अनुसार पिछले 50 सालों (1960-2010) में चावल और गेहूं दोनों में ज़रूरी और फ़ायदेमंद तत्वों के कंसंट्रेशन में कमी आई है। उदाहरण के लिए, चावल के दानों में ज़िंक (Zn) और आयरन (Fe) की मात्रा क्रमशः 33% और 27% कम हुई। जबकि गेहूं के दानों में यह तत्व क्रमशः 30% और 19% तक कम हुए।
डॉ रामंजनेयुलु ने कहा, “पारंपरिक रूप से जब किसान देसी किस्में चुनते थे, तो वे अच्छे रूट सिस्टम के लिए चुनते थे। अगर रूट सिस्टम बेहतर है, तो जड़ें लंबी दूरी तक फैलती हैं और उन्हें लंबी दूरी से पोषक तत्व, नमी भी लंबी दूरी से मिल सकती है। जबकि अब रूट सिस्टम बहुत छोटा है।”
इस तरह उनके अनुसार पोषण के लिहाज़ से भी इन बीजों का संरक्षण महत्वपूर्ण है।
मुनिया ने पोषण के इस फायदे को अपने शब्दों में बताते हुए कहा कि वो कभी चवली (Vigna unguiculata), कभी भिंडी तो कभी तुअर, इस तरह अलग-अलग सब्जियां बना कर खा लेती हैं। मुनिया के लिए इन्हें बाज़ार से खरीदने की ज़रूरत ख़त्म हो चुकी है।

बाज़ार का संघर्ष अब भी जारी
देसाई ने कहा कि भले ही जैविक खेती पर बहुत ज़ोर दिया जा रहा हो मगर देसी बीजों को बचाने के लिए अब भी पर्याप्त काम नहीं हुआ। हालांकि केंद्र सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और पोषण मिशन (NFSNM) के तरह सामुदायिक बीज बैंक स्थापित करने के लिए 50 लाख रूपए की एकमुश्त सहायता देती है।
साथ ही अलायंस बायोवर्सिटी-सीआईएटी और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के नेशनल एग्रीकल्चरल रिसर्च सिस्टम (NARS) के जॉइंट वर्क प्लान के तहत, पूरे भारत में लगभग 50 कम्युनिटी सीड बैंक बनाए गए हैं। इनमें 25 से ज़्यादा फसलों की 4,000 से ज़्यादा पारंपरिक किस्मों को बचाया जा रहा है।
मगर संपर्क सहित इन महिलाओं के साथ दिक्कत ये है कि अब भी इनके पास अपने बीजों को बेचने के लिए कोई बाज़ार नहीं है। यानि अपने खाने के लिए इन्होने बीज तो इकठ्ठा किए मगर बाज़ार में इन्हें बेचकर कभी कोई मुनाफा नहीं कमाया।
2 दशक पहले इन बीजों को एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाने का माध्यम बीज मेले थे। अब भी यही हैं।
देसाई ने बताया कि उनकी संस्था ‘भारत बीज स्वराज मंच’ जैसे नेटवर्क का इस्तेमाल बीजों के विस्तार के लिए कर रही है। लेकिन सरकार अगर इसका बाज़ार निर्मित करने में मदद करे तो स्थिति और बेहतर हो सकती है।
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