शक्कर के स्टॉक पर सख्त सीमा लागू, पंजाब की नदियों का अनिवार्य न्यूनतम पानी तय, उप्र के 13 जिले बाढ़ की स्थिति, पीक पावर क्षमता के लिए मप्र और उप्र में समझौता। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
केंद्र सरकार ने त्योहारों के मौसम में चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए इसके स्टॉक पर सख्त सीमाएं लागू की हैं। डीलरों के लिए चीनी की स्टॉक सीमा 400 टन तय की गई है। थोक उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक सीमा 15 दिनों के उपभोग के बराबर तय की गई है। यह सीमा 1 अगस्त से 30 नवंबर तक प्रभावी रहेगी।
पंजाब सरकार ने पंजाब कैनाल एंड ड्रेनेज एक्ट, 2023 की धारा 4 के तहत नदियों में न्यूनतम 15% पानी (इ-फ्लो या पर्यावरण प्रवाह) बनाए रखना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया है। इससे सूखे के मौसम (लीन सीजन) में भी सतलुज, ब्यास और रावी नदियों को सूखने से बचाया जा सकेगा। नए नियमों के तहत सतलुज नदी का न्यूनतम बहाव 640 क्यूसेक, ब्यास का 370 क्यूसेक और रावी का 333 क्यूसेक होना अनिवार्य है।
सौर ऊर्जा घटकों के घरेलू विकास को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार वर्ष 2030 तक लगभग 30 गीगावाट पॉलीसिलिकॉन उत्पादन क्षमता जोड़ना चाहती है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के सचिव संतोष कुमार सारंगी ने इसकी घोषणा की है। इस क्षमता को स्थापित करने से लगभग 25,000 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित हो सकता है।
उत्तर प्रदेश में मानसून के तीव्र होने से राज्य के कम से कम 13 जिले बाढ़ की स्थिति का सामना कर रहे हैं। बाढ़ का पानी रिहायशी इलाकों, सड़कों और बाजारों में घुस गया है। मौसम विभाग ने उत्तर प्रदेश के 65 जिलों के लिए भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है।
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की बिजली कंपनियों (MPPMCL और UPPCL) ने लखनऊ में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता 2,000 मेगावाट की पीक पावर क्षमता और दीर्घकालिक बिजली बैंकिंग व्यवस्था के लिए किया गया है। इस समझौते से दोनों राज्यों की मौसमी मांग को कुशलतापूर्वक पूरा किया जा सकेगा।
मध्य प्रदेश के वित्त विभाग ने निर्देश दिए हैं कि केंद्रांश (Central Share) मिलने से पहले राज्य सरकार अपने बजट से राशि जारी नहीं करेगी। इससे जल जीवन मिशन, प्रधानमंत्री आवास और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क जैसी केंद्र-राज्य की भागीदारी वाली योजनाओं के काम प्रभावित हो सकते हैं। पहले विभाग केंद्र से राशि मिलने की उम्मीद में राज्य के खजाने से अग्रिम खर्च कर देते थे।
विस्तृत चर्चा
मप्र में गांवों की 33% राशन दुकानें महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा संचालित हैं। खाद्य विभाग के नए आदेश ने दुकानों के कमीशन में कटौती कर दी है। अब इससे प्रदेश की लखपति दीदियों पर क्या असर हुआ है जानते हैं अब्दुल वसीम अंसारी से।
रिपोर्टर्स डायरी: लखपति दीदियों के कमीशन में कमी
इस खबर को कवर करने से पहले मेरे दिमाग में एक छवि बनी हुई थी कि,राशन की दुकानें सरकारी सोसायटी के माध्यम से संचालित होती है और उस पर काम करने वाले सेल्स मैन सरकार का ही एक अंग है।
क्योंकि मैने अक्सर उन्हें ही अपनी विभिन्न मांगों को लेकर सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करते हुए देखा था,लेकिन जुलाई 2026 में जब ये महिलाएं सड़क पर उतरी तो बहुत कुछ जानने की इच्छा मन में पैदा हुई कि ये महिलाएं कौन है और क्यों सड़कों पर हैं?
जब ज़मीनी स्तर पर हमने इन्वेस्टिगेशन शुरू की तो पता चला कि, ये ग्रामीण महिलाएं आजीविका मिशन के माध्यम से समूह से जुड़ी है। इन्हें राशन दीदी भी कहा जाता है।
हमने राजगढ़ वा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा किया और महिलाओं से जानने की कोशिश की के वो किस तरह से दुकान संचालित करती हैं? और अब कमीशन कम होने से उन्हें क्या-क्या समस्याएं आ रही हैं?
महिलाओं और उनके परिवार के लोगों ने बताया कि, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए गांव की स्वसहायता समूह की महिलाओं को राशन की दुकानें प्राथमिकता के आधार पर वितरित की गई थी।
शुरुवात में उनका कमीशन 10,500 के लगभग था। जिसमें वो सभी खर्च मैनेज कर लिया करती थीं। लेकिन जुलाई 2026 में आए नए आदेश में उनका कमीशन घटाकर सीधे 5,500 कर दिया गया है। अब इसी में उन्हें दुकान का किराया, मशीन वा स्टेशनरी का खर्च और बाकी सभी चीजें मैनेज करनी है। अगर स्टॉक में कमी आ जाए तो उसकी पूर्ति भी कमीशन में से ही देनी है।
वेयरहाउस से जो राशन का 50 किलो का कट्टा भेजा जाता है वो 3 से 4 किलो ज्यादा होता है क्योंकि उसमें नमी होती है। लेकिन जब यह बंटना शुरू होता है तो वो लगभग 48 से 49 किलो का निकलता है।
लेकिन पड़ताल के दौरान हमने ये भी देखा कि अधिकतर दुकानें पुरुष संचालित कर रहे हैं और दुकान का हिसाब-किताब भी वे ही मैनेज करते हैं।
खाद्य अधिकारी से जब हमने महिलाओं को राशन दुकानों को सौंपने के उद्देश्य पर सवाल किया तो उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य था महिलाएं आत्मनिर्भर बने और पुरानी प्रथाएं खत्म हो लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश दुकानें पुरुष ही संभाल रहे हैं।
कमीशन कम होने के सवाल पर खाद्य अधिकारी कहती है उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।
जब हमने हमारी इन्वेस्टिगेशन को आगे बढ़ाते हुए महिला स्वसहायता समूह को मैनेज करने वाले राष्ट्रीय आजीविका मिशन के डिस्ट्रिक प्रोजेक्ट मैनेजर संदीप सोनी से बात की तो उन्होंने कहा कि समूह से जुड़ी महिलाएं लखपति दीदी की कैटेगरी में आती है,और इसका गणित ये है कि महिला के साथ-साथ उसके परिवार की भी शुद्ध आय 1 लाख से अधिक होना चाहिए।
लेकिन जमीनी हकीकत की बात करे तो ये महिलाएं समूहों के कर्ज़ और निश्चित मेहनताना और कमीशन कम होने का दंश झेल रही हैं। लेकिन ताज्जुब की बात ये है कि फिर भी लखपति दीदी कहला रही हैं।
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