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आपके राशन की शक्कर महंगी क्यों हो रही, सरकार की तैयारी क्या है?

आपके राशन की चीनी से लेकर कर्णाटक के सूखे तक जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ

राज्य सरकारें खान और खनिज संशोधन अधिनियम को चुनौती देंगी, कर्णाटक में सूखा घोषित करने की मांग, पीओपी मूर्तियों को प्राकृतिक जल निकायों में विसर्जन की अनुमति, मप्र में फार्मर आईडी के बिना खाद नहीं। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।


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मुख्य सुर्खियां

कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश सरकारें खान और खनिज संशोधन अधिनियम, 2026 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी। 13 अगस्त को पारित यह कानून खनिज संपदा वाले राज्यों की कर लगाने की स्वायत्तता को सीमित करता है। केंद्रीय खनन मंत्री जी. किशन रेड्डी ने स्पष्ट किया कि केंद्र केवल कोयला, लोहा जैसी मुख्य खनिजों को विनियमित करना चाहता है।


दिल्ली पुलिस ने कैंसर की नकली और चोरी की दवाएं बेचने वाले 17 लोगों को गिरफ्तार किया है। इसमें प्रमुख निजी अस्पतालों के 4 स्वास्थ्य कर्मचारी शामिल हैं जो सीजीएचएस और अस्पतालों के स्टॉक से दवाएं चुराते थे। पुलिस ने आरोपियों से ₹16.5 लाख नकद और करोड़ों की दवाएं जब्त की हैं।

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कर्नाटक के कलबुर्गी में सूखा घोषित करने की मांग को लेकर किसानों ने पूर्ण बंद का आह्वान किया। किसानों ने प्रति एकड़ ₹50,000 की सूखा राहत राशि और उजनी जलाशय से 15 टीएमसी पानी छोड़ने की मांग की है। किसानों ने C2 + 50% के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और रबी फसलों के लिए बीज-उर्वरक की मांग की।


प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) मूर्ति विसर्जन पर बॉम्बे हाईकोर्ट स्पष्ट किया कि 24 जुलाई 2025 का उसका आदेश अंतिम फैसले तक लागू रहेगा। यह आदेश प्राकृतिक जल निकायों में छह फीट से अधिक ऊंची PoP मूर्तियों के विसर्जन की अनुमति देता है।


मौसम विभाग ने मध्य प्रदेश के 33 जिलों में अगले 4 दिनों के लिए भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। चित्रकूट में मंदाकिनी नदी उफान पर होने से एमपी-यूपी को जोड़ने वाली सड़क बंद है।  रीवा जिले के त्योंथर, सिरमौर और मऊगंज में बाढ़ से घरों और खाद्यान्न को भारी नुकसान पहुंचा है।

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मध्य प्रदेश में रबी सीजन 2026-27 से किसानों को ‘फार्मर आईडी’ के बिना सहकारी समितियों से खाद नहीं मिलेगी। फार्मर आईडी बनाने के लिए 20 अगस्त से 15 सितंबर तक विभिन्न विभागों द्वारा विशेष संयुक्त अभियान चलाया जा रहा है। फार्मर आईडी न होने पर किसान ब्याज मुक्त ऋण, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल बिक्री और खाद सब्सिडी सहित 8 प्रमुख सरकारी योजनाओं से वंचित हो जाएंगे।

विस्तृत चर्चा

बीते 3 महीने में चीनी के दाम 40% तक बढ़ गए हैं। मगर ऐसा क्यों हुआ? और सरकार इसे नियंत्रित करने के लिए क्या कर रही है? जानते हैं अब्दुल वसीम अंसारी से।

चीनी की बढ़ती कीमतें और सरकारी फैसले: एक विश्लेषण

देशभर में पिछले तीन महीनों में चीनी के खुदरा दामों में 15 से 40 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कई शहरों में शक्कर की कीमतें 51 रुपये से बढ़कर 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुकी हैं, जबकि गुड़ भी 24 प्रतिशत तक महंगा हो चुका है। चीनी के साथ-साथ मक्के का आटा, चावल की टुकड़ी और पशु आहार के दाम बढ़ने से रसोई का पूरा बजट प्रभावित हो रहा है। 

आगामी त्योहारी सीजन को देखते हुए कीमतों में आई इस अचानक तेजी ने सरकार और आम जनता दोनों की चिंता बढ़ा दी है।

बाजार में चीनी की कमी और महंगाई की मुख्य वजह घरेलू स्टॉक का घटना और एथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी है। पिछले पेराई सीजन में लगभग 25 लाख टन चीनी के बराबर गन्ना और शीरा एथेनॉल बनाने में डायवर्ट कर दिया गया। इसके चलते आने वाले 2026-27 सीजन के लिए चीनी का ओपनिंग स्टॉक घटकर 32 लाख टन रह गया, जबकि देश की जरूरत के हिसाब से यह कम से कम 50 लाख टन होना चाहिए था। 

इसके अलावा एथेनॉल उत्पादन में मक्के और खराब अनाज की खपत बढ़ने से पशु आहार और पॉल्ट्री फीड के दाम भी 8 से 10 प्रतिशत बढ़ गए हैं। भारत, जो 2022-23 में 1.33 करोड़ टन चीनी का निर्यात करता था, अब इस साल निर्यात के मामले में शून्य पर आ गया है।

कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत दो बड़े कदम उठाए हैं। पहला, 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख मीट्रिक टन रॉ शुगर के सीमा शुल्क-मुक्त (duty-free) आयात को मंजूरी दी गई है। 

दूसरा, जमाखोरी रोकने के लिए थोक उपभोक्ताओं जैसे सॉफ्ट ड्रिंक निर्माताओं, मिठाई विक्रेताओं और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों पर स्टॉक लिमिट लागू कर दी गई है। अब 10 मीट्रिक टन से अधिक खपत वाले व्यापारी 15 दिन से ज्यादा की जरूरत का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। 

विशेषज्ञों का मानना है कि इन कड़े कदमों और जीएसटी रिटर्न के जरिए स्टॉक की मॉनिटरिंग से बाजार में सट्टेबाजी पर रोक लगेगी और जल्द ही कीमतें स्थिर होंगी।

ग्राउंड रिपोर्ट की बात

पर्यावरण सिर्फ खबर नहीं, यह हमारी सांसों का सवाल है। ग्राउंड रिपोर्ट की कोशिश है कि इन मुद्दों को ज़मीनी स्तर पर उठाया जाए और चुनावी एजेंडे का हिस्सा बनाया जाए। अगर आप पर्यावरण पत्रकारिता को ज़रूरी मानते हैं, तो इस एपिसोड को शेयर करें और हमें अपना फीडबैक भेजें।

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Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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