21 दिव्यांगता श्रेणियों को जनगणना में शामिल करने की मांग, कावेरी वन्यजीव अभ्यारण्य में शिकार-विरोधी शिविरों पर हमला, बाढ़ से बेहाल बांग्लादेश, मप्र में दिन में किसानों को बिजली। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
दिव्यांग अधिकार समूहों ने जनगणना 2027 के फॉर्म में केवल 9 दिव्यांगता श्रेणियों को शामिल करने के प्रस्ताव पर चिंता जताई है। अधिकार समूहों की मांग है कि सभी 21 श्रेणियों को जनगणना में शामिल किया जाए। यह मांग दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act) 2016 के तहत की गई है।
कर्नाटक के कावेरी वन्यजीव अभ्यारण्य (Cauvery Wildlife Sanctuary) में उपद्रवियों ने शिकार-विरोधी शिविरों पर हमला किया है। यह हमला 15 अगस्त की तड़के हुई मुठभेड़ के विरोध में किया गया, जिसमें तीन शिकारी मारे गए थे। हमलावरों ने शिकार-विरोधी शिविरों को जिलेटिन स्टिक से उड़ा दिया।
दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने दिल्ली के नए मास्टर प्लान (MPD-2047) को मंजूरी दी है। इसके तहत ट्रांसफर ऑफ डेवलपमेंट राइट्स (TDR) नीति पेश की गई है। इस नीति के तहत संपत्ति के मालिक अपने अनुपयोगी निर्माण अधिकारों को बेच सकते हैं।
बांग्लादेश के चटगांव में भारी बारिश, पहाड़ी ढलान के पानी और समुद्री ज्वार के कारण बाढ़ आ गई है जिससे 7.5 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। यहां अब तक 8 लोगों की मौत दर्ज हो चुकी है। लगभग 50% कृषि भूमि जलमग्न हो चुकी है।
मध्य प्रदेश से गुजरात भेजी गई नकली शराब के सेवन से 9 लोगों की मौत हो गई है। इस घटना में 41 लोग अस्पताल में भर्ती हैं, जिनमें से 7 की हालत गंभीर है। गुजरात पुलिस के अनुसार, इस नकली शराब में मिथाइल अल्कोहल मिलाया गया था।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने घोषणा की है कि आगामी फसलों के लिए किसानों को दिन में बिजली दी जाएगी। ऊर्जा विभाग ने इसके लिए 11,000 करोड़ रुपये का ब्लूप्रिंट तैयार किया है। फ्री प्रेस जर्नल के अनुसार गुजरात भारत का एकमात्र अन्य राज्य है जो दिन में किसानों को बिजली प्रदान करता है।
विस्तृत चर्चा
आम तौर पर किसान शब्द के बारे में सोचते हुए हमें खेत में काम करता हुआ एक पुरुष ही याद आता है। एक हालिया शोध बताता है कि भारत में कृषि क्षेत्र में काम करने वाली 50.5% महिलाएं किसानों के बजाय ‘अवैतनिक पारिवारिक सहायक’ के रूप में दर्ज हैं। जबकि पुरुषों में यह अनुपात 21.7% है। पूरी खबर विस्तार से जानिए वाहिद भट से।
खेतों में महिलाएं मगर कागजों में ग़ायब ‘महिला किसान’
ग्रामीण भारत में कृषि क्षेत्र महिलाओं के रोजगार का सबसे बड़ा जरिया है, जहां साल 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार लगभग 77% ग्रामीण महिलाएं कृषि से जुड़ी हुई हैं। इसके साथ ही, कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी साल 2017-18 के 57% से बढ़कर साल 2023-24 में 64% से भी अधिक हो गई है। हालांकि, इस बढ़ती भागीदारी के बावजूद महिलाओं की मेहनत को अक्सर स्वतंत्र किसान के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है।
आधी महिलाएं ‘अवैतनिक पारिवारिक सहायक’
आर्या.एजी (Arya.ag) की ‘हर हार्वेस्ट 2026’ (Her Harvest 2026) रिपोर्ट के अनुसार, खेती में काम करने वाली 50.5% महिलाओं को ‘अवैतनिक पारिवारिक सहायक’ (अनपेड फैमिली हेल्पर) के तौर पर वर्गीकृत किया गया है, जबकि पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा केवल 21.7% है।
दफ्तरों और प्रशासनिक रिकॉर्डों में उनकी किसान के रूप में पहचान न होने का सीधा और नकारात्मक असर बीज, खाद, कृषि संबंधी जरूरी मशवरों, सरकारी योजनाओं के लाभ और फसल की सरकारी खरीद तक उनकी पहुंच पर पड़ता है।
भूमि पर महिलाओं के नियंत्रण और स्वामित्व में भारी असमानता को भी उजागर किया गया है। भारत में महिलाएं केवल 11.72% कृषि भूमि (फार्मलैंड एरिया) को ही संचालित (ऑपरेट) करती हैं और परिचालन जोतों (ऑपरेशनल होल्डिंग्स) में उनकी हिस्सेदारी मात्र 13.96% है।
एक तरफ जहां वे कृषि कार्यबल का एक विशाल हिस्सा संभालती हैं, वहीं दूसरी तरफ कृषि संसाधनों और भूमि नियंत्रण में उनकी भागीदारी बेहद सीमित है। लैंगिक असमानता की इस स्थिति के कारण देश को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
क्यों ज़रूरी है महिला किसान की पहचान
रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत के कृषि सकल मूल्य वर्धन पर खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुमानों को लागू किया जाए, तो भारत को प्रतिवर्ष कृषि उत्पादन में लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान होता है।
इस स्थिति में सुधार के लिए रिपोर्ट में कुछ महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सिफारिशें प्रस्तुत की गई हैं, जिनमें सबसे बुनियादी सुझाव यह है कि महिलाओं को किसान के रूप में आधिकारिक पहचान दी जानी चाहिए, भले ही भूमि का मालिकाना हक (लैंड टाइटल) उनके नाम पर हो या न हो।
इसके अतिरिक्त, महिला किसानों के लिए ऋण की पहुंच (क्रेडिट एक्सेस) को बढ़ाना, वेयरहाउस रसीद वित्तपोषण (वेयरहाउस रिसीप्ट फाइनेंसिंग) की सुविधा का विस्तार करना और महिलाओं के नाम पर किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) खातों को बढ़ावा देना बेहद आवश्यक है।
वर्ष 2026 को ‘अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष’ (इंटरनेशनल ईयर ऑफ वुमेन फार्मर्स) के रूप में मनाया जा रहा है, जिससे ये सुधार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। यदि महिला किसानों को उचित पहचान, ऋण, आधुनिक तकनीक और बाजार तक पहुंच मिलती है, तो इसका सकारात्मक लाभ न केवल उन महिलाओं तक सीमित रहेगा, बल्कि उनके परिवारों, खेतों और देश के समग्र कृषि उत्पादन में भी व्यापक सुधार लाएगा।
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