खरगोन से 21 किमी दूर भगवानपुरा तहसील कार्यालय के सामने कुछ लोग धरने पर बैठे हुए हैं। उनके हाथ में ज़मीन के कुछ कागज़ हैं। उनका कहना है कि गांव में जहां उनकी ज़मीन और खेत हैं, ऑनलाइन रिकॉर्ड में उसे सरकारी ज़मीन बता दिया गया है। कुछ लोगों के खसरा नंबर एक्टिवेट हैं मगर वो असल जगह के बजाए गांव से बाहर दिखा रहे हैं। लोगों को अब डर है कि उन्हें उनकी ज़मीन से बेदखल किया जा सकता है। इसीलिए ये लोग ऑनलाइन रिकॉर्ड दुरुस्त करने के लिए अब प्रदर्शन कर रहे हैं।
दगड़खेड़ी धूलकोट पंचायत के अंतर्गत आता है। इसके सरपंच बलिराम सोलंकी हमें बताते हैं कि बीते 2 फरवरी को उन्हें 229 हेक्टर शासकीय भूमि पर औद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने के लिए अनापत्ति पत्र मांगा गया। इस भूमि का खसरा नंबर 318/1 था। “हमने कहा भाई 318 खसरा नंबर पे दगड़खेड़ी गांव के किसान खेती करते हैं। हम इस खसरे को किसी औद्योगिक क्षेत्र के लिए नहीं देंगे।”
सोलंकी बताते हैं कि लगभग 10 साल पहले तक सब कुछ सामान्य था। फिर कुछ लोगों ने जब स्थानीय तहसील कार्यालय से अलग-अलग कारणों से अपनी ज़मीन के नक़्शे निकलवाए तो उन्हें यह मालूम हुआ कि सरकारी रिकॉर्ड में उनकी ज़मीन गांव से बाहर दर्शाई गई है।
हेर सिंह कनासे 1।75 एकड़ में खेती करते हैं। खेत के एक हिस्से में ही उन्होंने कच्चा मकान बनवा रखा है। मगर सरकारी रिकॉर्ड में उनका खेत और घर मौजूदा जगह से 4 किमी दूर नया बिलवा नामक जगह में दिखाई दे रहा है। वो पूछते हैं, “वहां कहां खेती करने जाएं? कौन देगा ज़मीन हमें?”
मगर बात सरकारी कागज़ों में ज़मीन की जगह बदलने तक बस सीमित नहीं है। बोधि बाई अपने भाई के साथ मिलकर 10 एकड़ में खेती करती हैं। इसे अपने बच्चों के बीच बांटने के लिए उन्होंने आवेदन किया तो उन्हें पता चला कि सरकारी रिकॉर्ड में उनकी ज़मीन शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है।
दरअसल बोधि बाई गांव के उन लोगों में शामिल हैं जिनकी ज़मीन कहीं भी नहीं दिखाई दे रही। न गांव के अन्दर न इसके बाहर। इसे और आसान भाषा में कहें तो बोधि बाई की ज़मीन कागजों में अब कहीं अस्तित्व में नहीं है।
इस गांव के कई और लोग भी हैं जिनके खेत में सरकार की ‘कपिलधारा’ योजना से कुआं खोदा गया है। मगर अब वो भूमि शासकीय ज़मीन दिखती है।
हालांकि ग्राम सभा ने यहां आए औद्योगिक क्षेत्र के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया है। कलेक्टर कार्यालय से उन्हें मौखिक आश्वासन भी मिला की ऐसी कोई भी परियोजना उनके क्षेत्र में नहीं लायी जाएगी। मगर पंचायत को अब तक इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं मिला है।
ऐसे में इन ग्रामीणों को आशंका है कि आने वाले दिनों में उन्हें सरकारी भूमि पर कब्ज़ा करने वाला बताकर बेदखल किया जा सकता है।
इस पूरे मामले में भगवानपुरा तहसीलदार संजय चौहान कहते हैं, “50 साल पहले इन ग्रामीणों को सोसाइटी के माध्यम से पट्टे बनाकर दिए गए थे। मगर अब भी इनकी ज़मीन सरकारी भूमि के रूप में दर्ज है। ये चाहते हैं कि वापस से इनको पट्टे बनाकर दिए जाएं।”
हालांकि प्रदर्शन के बाद राजस्व विभाग की ओर से फिलहाल 12 पटवारी का एक दल गांव सर्वे कर रहा है। ग्रामीणों ने बताया कि उनके खेतों के सीमांकन की प्रक्रिया शुरू की गई है। इन ग्रामीणों की मांग है कि यह सर्वे पूरा कर उन्हें जल्द से जल्द सही भू दस्तावेज दिए जाएं।
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