हर साल मध्य प्रदेश में गेहूं की कटाई के बाद कई जगहों पर खेतों में आग लगाने की घटनाएं सामने आती हैं। किसान फसल के अवशेष हटाने के लिए पराली जलाने का तरीका अपनाते हैं, क्योंकि इससे खेत जल्दी खाली हो जाता है। इस प्रक्रिया से हवा की गुणवत्ता और मिट्टी की स्थिति पर असर पड़ सकता है। इस साल भोपाल प्रशासन ने इस पर नियंत्रण के लिए सख्ती बढ़ाई है।
अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट सुमित कुमार पांडेय ने गुरुवार रात एक आदेश जारी किया। इस आदेश में पूरे भोपाल जिले में अगले तीन महीने तक पराली जलाने पर रोक लगा दी गई है। यह आदेश तुरंत लागू हो गया है और जून 2026 तक जारी रहेगा।
यह आदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 163 के तहत जारी किया गया है, जो जिला प्रशासन को जन सुरक्षा और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर रोक लगाने का अधिकार देता है। पांडेय ने सभी एसडीएम को निर्देश दिया है कि वे नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई करें। जो भी पराली जलाते हुए पकड़ा जाएगा, उसके खिलाफ नजदीकी थाने में एफआईआर दर्ज होगी।
इस पाबंदी की जरूरत क्यों पड़ी
आदेश में, यह रोक लगाने के पीछे चार कारण बताए गए हैं।
खेतों में लगी आग से सार्वजनिक संपत्ति, पेड़-पौधे और जानवरों को नुकसान होता है। पराली जलाने से मिट्टी के अंदर मौजूद अच्छे जीवाणु मर जाते हैं, जिससे मिट्टी की ताकत कम होती है और फसल पर असर पड़ता है। अगर पराली को खेत में सड़ने दिया जाए, तो वह मिट्टी को ताकत देती है, लेकिन जलाने से यह फायदा खत्म हो जाता है। इससे निकलने वाला धुआं और गैसें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं।
इस आदेश में राष्ट्रीय हरित अधिकरण और वायु प्रदूषण रोकने वाले कानून 1981 का भी जिक्र किया गया है। साथ ही 2017 से राज्य के कृषि और पर्यावरण विभाग के निर्देशों का भी हवाला दिया गया है।
यह रोक ऐसे समय में लगाई गई है, जब भोपाल जिले में किसान गेहूं की कटाई कर रहे हैं। इस समय पराली जलाने के मामले बढ़ जाते हैं, क्योंकि किसान अगली फसल के लिए जल्दी खेत खाली करना चाहते हैं।
आदेश में कहा गया है कि जिले में कई किसान अब रोटावेटर जैसी मशीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे बिना जलाए पराली को संभाला जा सकता है। यह सुविधा यहां उपलब्ध है।
यह रोक जून तक चलेगी। इस समय मानसून आने लगता है और पराली जलाने के मामले अपने आप कम हो जाते हैं। यह आदेश सीधे लागू किया गया है और तुरंत प्रभाव में है।
भारतीय किसान संघ के तहसील अध्यक्ष (हुजूर तहसील, भोपाल) अखिलेश मीणा ने इस आदेश का समर्थन किया है। उन्होंने ग्राउंड रिपोर्ट से बातचीत में कहा कि पराली प्रबंधन जरूरी है और इसे लेकर प्रशासन की सख्ती भी जरूरी है, लेकिन नियमों का पालन पारदर्शिता के साथ होना चाहिए। साथ ही किसानों को पराली प्रबंधन के लिए जागरूकता और जरूरी सहयोग मिलना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि बिजली विभाग की लापरवाही से खेतों में आग लगती है, तो प्रभावित किसानों को मुआवजा दिया जाना चाहिए।
पराली जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश देश में सबसे आगे
यह फैसला ऐसे समय आया है, जब पराली जलाने के आंकड़े चिंता बढ़ा रहे हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2020 से नवंबर 2025 के बीच मध्य प्रदेश में 546 मामले दर्ज हुए। इनमें सबसे ज्यादा 226 मामले छिंदवाड़ा से आए। इसके बाद बैतूल में 44, रायसेन में 42 और कटनी में 42 मामले सामने आए।
मध्य प्रदेश लगातार दूसरे साल पराली जलाने के मामलों में देश में सबसे ऊपर रहा। 15 सितंबर से 30 नवंबर 2025 के बीच सैटेलाइट से 17,067 मामले दर्ज हुए। यह संख्या पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान के कुल मामलों से भी ज्यादा है।
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