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AMR जागरूकता और सुरक्षित दवा निपटान के लिए अस्पतालों की संयुक्त पहल शुरू

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मुंबई और ठाणे में अस्पतालों और डॉक्टरों ने एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस यानी AMR को लेकर जागरूकता बढ़ाने की पहल शुरू की है। RNisarg Foundation ने कई अस्पतालों और क्लीनिक के साथ मिलकर एंटीबायोटिक के जिम्मेदार उपयोग और दवाओं के सुरक्षित निपटान पर आधारित एक अभियान शुरू किया है।

इस पहल के तहत अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है और मरीजों को एंटीबायोटिक के सही उपयोग के बारे में जानकारी दी जा रही है। इसके साथ ही, दवाओं के सुरक्षित निपटान के लिए मेडिसिन टेक-बैक सिस्टम भी शुरू किया गया है।

RNisarg Foundation की इस पहल में डॉ. लता घनश्यामनानी, डॉ. मनोज मास्के और डॉ. लीना केलशीकर जैसे वरिष्ठ स्वास्थ्य विशेषज्ञ सक्रिय रूप से जुड़े हैं। फाउंडेशन का कहना है कि अस्पतालों के साथ मिलकर काम करने से मरीजों तक सही जानकारी पहुंचाना आसान होता है और एंटीबायोटिक के जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है, जिससे लंबे समय में दवा-प्रतिरोध की समस्या को कम करने में मदद मिलेगी।

क्या है AMR और क्यों बढ़ रहा है खतरा

भारत सहित दुनिया के कई देश एक गंभीर स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहे हैं। इसे एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस या AMR कहा जाता है। इसमें दवाएं संक्रमण पर असर करना कम कर देती हैं या बंद कर देती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के अनुसार, AMR तब होता है जब बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। WHO ने इसे दुनिया के बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों में शामिल किया है।

WHO के अनुसार, यह एक प्राकृतिक, अनुवांशिक प्रक्रिया है, लेकिन इंसानों की गलत आदतें इसे तेजी से बढ़ाती हैं। जब लोग बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक लेते हैं, तो बैक्टीरिया मजबूत हो जाते हैं।

भारत सरकार के राष्ट्रीय AMR एक्शन प्लान के अनुसार, एंटीबायोटिक का गलत और अधूरा उपयोग बैक्टीरिया को पूरी तरह खत्म नहीं होने देता, जिससे उनमें दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध विकसित हो जाता है।

कितना बड़ा है खतरा

WHO के अनुसार, AMR अब वैश्विक स्तर पर गंभीर संकट बन चुका है। लैंसेट (Lancet) में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, 2019 में 12.7 लाख मौतें सीधे तौर पर AMR से जुड़ी थीं।

भारत में भी स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी ICMR की 2024 रिपोर्ट के अनुसार, कई आम संक्रमणों में एंटीबायोटिक की प्रभावशीलता घट रही है। उदाहरण के तौर पर, Klebsiella pneumoniae (न्युमोनिआ का कारक बैक्टीरिया) में एक प्रमुख एंटीबायोटिक की प्रभावशीलता 2017 के 58.5 प्रतिशत से घटकर 2024 में 31.2 प्रतिशत रह गई है।

ICMR की इसी रिपोर्ट के अनुसार, कुछ गंभीर संक्रमणों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध तेजी से बढ़ रहा है, जिससे इलाज के विकल्प सीमित हो रहे हैं।

असर सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं

विश्व बैंक के अनुसार, अगर AMR पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो 2050 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है। इलाज की लागत बढ़ेगी और अस्पतालों में मरीजों का समय भी बढ़ेगा। WHO के अनुसार, इसका असर सर्जरी और कैंसर जैसे इलाज पर भी पड़ेगा, क्योंकि संक्रमण का खतरा बढ़ जाएगा।

भारत सरकार ने 2017 में नेशनल एक्शन प्लान ऑन AMR शुरू किया। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इसका उद्देश्य एंटीबायोटिक के सही उपयोग को बढ़ावा देना और निगरानी को मजबूत करना है। वहीं मध्य प्रदेश के 2019 के AMR एक्शन प्लान के अनुसार, इस समस्या से निपटने के लिए एंटीबायोटिक के सही उपयोग और संक्रमण नियंत्रण को मजबूत करना जरूरी है। ICMR ने भी अस्पतालों में एंटीबायोटिक के उपयोग पर निगरानी और शोध के लिए एक राष्ट्रीय नेटवर्क तैयार किया है, जो देशभर से डेटा इकट्ठा करता है।

WHO और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार, इस समस्या को रोकने के लिए लोगों की भूमिका अहम है। बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक न लेना, दवा का पूरा कोर्स पूरा करना और बची हुई दवाओं का दोबारा उपयोग न करना जरूरी है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, अस्पतालों को संक्रमण नियंत्रण के नियमों का सख्ती से पालन करना चाहिए। WHO के अनुसार, AMR एक धीमी लेकिन गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो सामान्य संक्रमण भी इलाज से बाहर हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए सरकार, स्वास्थ्य संस्थानों और आम लोगों को मिलकर काम करना होगा।

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