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रिपोर्टर से बात: खुश हैं मध्य प्रदेश के सोयाबीन किसान

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मध्य प्रदेश में सोयाबीन किसानों के चेहरे खिले हुए हैं, क्योंकि मंडी में दाम 7,000 रुपये क्विंटल तक पहुंच गए हैं, जो सरकारी भाव से कहीं ज्यादा है। हमारे रिपोर्टर अब्दुल वसीम अंसारी ने इसके कारणों की पड़ताल की है। आइए, उन्हीं से जानते हैं कि भाव क्यों चढ़े हैं और किसान अब आगे क्या करने की सोच रहे हैं।

आज की प्रमुख हेडलाईन्स

दिवाली पर दिल्ली में प्रदूषण

दिवाली के दिन दिल्ली की हवा ‘गंभीर’ श्रेणी में रहने की आशंका है। AQI 500 के पार जा सकता है, जबकि अभी यह 400 के आसपास है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का कारण सड़कों पर ट्रैफिक और सार्वजनिक परिवहन की कमी को बताया। उन्होंने किसानों को आकर्षित करने के लिए फसल अवशेषों का खरीद मूल्य पहले से घोषित करने का सुझाव भी दिया।


पेट्रोल में इथेनॉल पर विवाद

कर्नाटक सरकार ने तेल कंपनियों पर पेट्रोल में 20 प्रतिशत के मानक से ज्यादा इथेनॉल मिलाने का आरोप लगाया है। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने इसका खंडन किया है और कर्नाटक सरकार के टेस्टिंग तरीके पर सवाल उठाए हैं।

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सियोम बांध को वन मंजूरी

अरुणाचल प्रदेश में सियांग बांध के विरोध के बीच पर्यावरण मंत्रालय की सलाहकार समिति ने सियोम नदी पर 1000 मेगावाट की हाइड्रोपावर परियोजना के लिए वन मंजूरी की सिफारिश की है। सियोम, सियांग नदी की सहायक नदी है।


सफाईकर्मियों को दिवाली पर दोगुना वेतन

मध्य प्रदेश सरकार ने दिवाली पर सफाईकर्मियों का वेतन दोगुना करने का फैसला किया है। साथ ही संविदा पर काम कर रहे कर्मचारियों को नियमित भी किया जाएगा। यह फैसला सफाईकर्मियों की हड़ताल के बाद लिया गया है।


रिपोर्टर से बात

क्यों खुश हैं मध्य प्रदेश के सोयाबीन किसान

Madhya Pradesh Soybean Farmers Rejoice as Prices Rise, Turn Away from Bhavantar Scheme
किसान अपनी सोयाबीन की फसल बेचने सीहोर कृषि मंडी आए | फोटो: पल्लव जैन

अब्दुल वसीम अंसारी, ग्राउंड रिपोर्ट

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पिछले कुछ दिनों में जब मैं गाँवों में घूम रहा था, तो किसानों के चेहरे पहले से काफी अलग दिखे। पिछले साल की तुलना में इस साल उपज भी अच्छी है और मंडी में भाव भी काफी ऊपर चल रहे हैं।

पल्लव, सबसे दिलचस्प बात यह थी कि उपार्जन शुरू होने से पहले ही किसान अपनी फसल खुली मंडी में बेच रहे थे।

खंडियापुरा गाँव में मेरी मुलाकात विक्रम सोंधिया से हुई। उन्होंने भावांतर योजना में पंजीयन तो कराया था, लेकिन 20 क्विंटल सोयाबीन 6,000 रुपये क्विंटल के भाव पर खुली मंडी में बेच दी। उन्होंने साफ कहा कि जब तुरंत अच्छा भाव मिल रहा हो, तो इंतजार करने का कोई मतलब नहीं है।

मनोहरपुरा में लाखन सिंह परमार ने तो पंजीयन ही नहीं कराया। उनकी 55 क्विंटल पैदावार हुई, जिसे उन्होंने अलग-अलग भाव पर बेचा: 6,300, 6,900 और 6,875 रुपये क्विंटल।

माल्याहेड़ी के महेश सोंधिया की फसल अभी खेत में ही पड़ी है। उन्होंने भी पंजीयन नहीं कराया, क्योंकि खुले बाजार में भाव बेहतर हैं और उन्हें आगे और बढ़ने की उम्मीद है।

रिपोर्टिंग के दौरान ब्यावरा मंडी के सचिव भंवर सिंह सोलंकी ने बताया कि भावांतर का सरकारी भाव 5,708 रुपये है, जबकि खुली मंडी में सोयाबीन 7,300 रुपये तक पहुँच चुकी है। व्यापारी राजेंद्र साहू ने बताया कि अभी सोयाबीन 7,000 से 7,200 रुपये में बिक रही है। महाराष्ट्र में फसल कमजोर बताई जा रही है, इसलिए किसान अपनी फसल रोककर रखे हुए हैं।

पल्लव, सरल भाषा में समझें तो सरकारी भाव 5,708 रुपये है और खुली मंडी में 6,600 से 7,300 रुपये तक मिल रहा है। यानी 900 से 1,600 रुपये क्विंटल तक का फर्क है। ऐसे में किसान इंतजार क्यों करेंगे?

पल्लव, यह सिर्फ राजगढ़ की बात नहीं है। हरदा की सिराली मंडी में भी यही हाल है। वहाँ सिर्फ 2,300 पंजीयन हुए हैं और सोयाबीन 6,000 से 7,000 रुपये में बिक रही है। राजगढ़ में पिछले साल 11 हजार पंजीयन हुए थे, जबकि इस साल सिर्फ 766 हुए हैं।

इसका कारण भी साफ है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखे ने सोयाबीन को बहुत नुकसान पहुँचाया है। महाराष्ट्र में उत्पादन लगभग 33 प्रतिशत कम रहने का अनुमान है, जबकि कर्नाटक में गिरावट इससे भी ज्यादा है।

नतीजा यह है कि मध्य प्रदेश में अच्छी पैदावार होने के बावजूद भाव ऊँचे बने हुए हैं, और मध्य प्रदेश फिर से देश का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक राज्य बन गया है।

पल्लव, गाँवों में किसानों से बात करते हुए एक और बात बार-बार सुनने को मिली: पानी की समस्या। कुछ किसानों ने बताया कि बारिश कम होने से कुएँ सिर्फ आधे दिन ही चल पाते हैं। नर्मदा लाइन चालू होने से थोड़ी राहत मिली है, लेकिन फिर भी वे गेहूँ और रायड़ा कम ही लगाने की सोच रहे हैं।

कुल मिलाकर अभी बाजार किसानों के पक्ष में दिख रहा है। व्यापारी और किसान, दोनों मान रहे हैं कि आगे भाव और चढ़ सकते हैं। पल्लव, अब सवाल यही है कि सरकार उपार्जन की तारीख कब तय करती है और तब तक यह रुझान कितना और मजबूत होता है।

ग्राउंड रिपोर्ट की बात

पर्यावरण सिर्फ खबर नहीं, यह हमारी सांसों का सवाल है। ग्राउंड रिपोर्ट की कोशिश है कि इन मुद्दों को ज़मीनी स्तर पर उठाया जाए और चुनावी एजेंडे का हिस्सा बनाया जाए। अगर आप पर्यावरण पत्रकारिता को ज़रूरी मानते हैं, तो इस एपिसोड को शेयर करें और हमें अपना फीडबैक भेजें।

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Author

Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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