यह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के डेली मॉर्निंग पॉडकास्ट का एपिसोड-116 है। गुरुवार, 15 जनवरी को देश भर की पर्यावरणीय ख़बरों के साथ पॉडकास्ट में जानिए गंगा की बेहतरी के बंद की जा रही 600 मेगवाट की जलविद्युत् परियोजना और हिमाचल की पहली सेटेलाईट सिटी को लेकर हो रहे विरोध के बारे में।
मुख्य सुर्खियां
पश्चिम बंगाल में नीपाह वायरस का तीसरा मामला सामने आया है। एह्तीयातन तौर पर 100 लोगों को होम क्वारंटाइन कर दिया गया है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड को बड़े सरकारी अस्पतालों के पास सबवे की ज़िम्मेदारी लेने और मरीज़ों के रिश्तेदारों के लिए तुरंत बेड एवं सर्दियों के लिए टेंट देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि शेल्टर न देना फंडामेंटल राइट्स का उल्लंघन है।
बुधवार को तेज़ ठंड और ठंडी हवाओं की वजह से गौतम बुद्ध नगर में मिनिमम टेम्प्रेचर 2 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया, जबकि दिल्ली और गुरुग्राम में टेम्परेचर 3°C से थोड़ा ऊपर रहा।
यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ द्वारा बीते साल इंटरसिटी कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए 8 डबल डेकर बसों को हरी झंडी दिखाई गई थी। मगर इनमें से 6 बसें चार्जिंग स्टेशन न होने के कारण अब खड़े-खड़े कबाड़ हो रही हैं।
मध्य प्रदेश में 2022 और 2025 के बीच फारेस्ट फायर पॉइंट्स में 30% की बढ़ोतरी हुई है। इससे जंगल की आग की बढ़ती फ्रीक्वेंसी और इंटेंसिटी को लेकर चिंता बढ़ गई है। हालांकि वन विभाग का कहना है कि आग की घटना में बढ़ोत्तरी बेहतर डिटेक्शन सिस्टम का परिणाम है।
भोपाल में 4 जगहों पर ई-कोलाई बैक्टीरिया मिलने के मामले पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की प्रिंसिपल बेंच ने स्वतः संज्ञान लिया है। वहीं जबलपुर नगर निगम को भी इन्हीं कारणों के चलते हाईकोर्ट ने नोटिस जारी किया है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बुधवार को इंदौर में 800 करोड़ रुपये की लागत वाले एक बड़े जल आपूर्ति प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया।
विस्तृत चर्चा

लोहारी नाग पाला जलविद्युत परियोजना का समापन
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में भागीरथी नदी पर 600 मेगावाट क्षमता वाली ‘लोहारी नाग पाला’ जलविद्युत परियोजना प्रस्तावित थी। एनटीपीसी (NTPC) ने 2006 में इसका काम शुरू किया था, जिसकी अनुमानित लागत ₹2000 करोड़ थी। लगभग 60% काम पूरा होने और ₹650 करोड़ खर्च होने के बावजूद, 2019 में केंद्र सरकार ने इसे आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया था,।
विरोध और पर्यावरणीय चिंताएं: पर्यावरणविदों, विशेष रूप से आईआईटी प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल, और विभिन्न धार्मिक संस्थाओं ने इस परियोजना का कड़ा विरोध किया,। उनका तर्क था कि नदी को सुरंगों में मोड़ने से उसका प्राकृतिक स्वरूप नष्ट हो जाएगा और वह उद्गम क्षेत्र के पास ही गायब हो जाएगी।
सुरंगों को सील करने की प्रक्रिया: हाल ही में, परियोजना के तहत बनी 14 किलोमीटर लंबी सुरंगों को मिट्टी और मलबे से स्थायी रूप से बंद करने का काम शुरू किया गया है, जिस पर ₹52 करोड़ खर्च किए जाएंगे।
धराली आपदा का प्रभाव: 5 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी के धराली गांव में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन (संभावित ग्लेशियर लेक आउटबस्ट) के बाद इन खुली सुरंगों को बंद करने का निर्णय लिया गया। इस आपदा में जान-माल और बुनियादी ढांचे का भारी नुकसान हुआ था।
पहाड़ों में टनलिंग और निर्माण कार्य के जोखिम
स्थानीय बस्तियों पर प्रभाव: सुरंग बनाने के लिए की जाने वाली ब्लास्टिंग ने कई इलाकों को कमजोर कर दिया है। उदाहरण के लिए, पाला गांव में ब्लास्टिंग से भटवारी कस्बे और गंगोत्री जाने वाली सड़क पर बुरा असर पड़ा।
घरों में दरारें और विस्थापन: चर्चा में जोशीमठ और शिमला के भट्टा कुफर से संजौली के बीच बन रही फोर-लेन सुरंग का जिक्र किया गया है, जहां निर्माण कार्य के कारण घरों और सड़कों में दरारें आ गईं। इसके परिणामस्वरूप, कड़ाके की ठंड में लोगों को रातों-रात अपने घर खाली करने पड़े।
शिमला में सैटेलाइट माउंटेन टाउन विवाद
शिमला में बढ़ती भीड़ और दबाव को कम करने के लिए सरकार शहर से 14 किमी दूर जठिया देवी में राज्य का पहला ‘सैटेलाइट माउंटेन टाउन’ बसाना चाहती है। इसका लक्ष्य सरकारी कार्यालयों और आवासीय कॉलोनियों को शहर से बाहर स्थानांतरित करना है।
परियोजना में बाधाएं: यह परियोजना पिछले 10 वर्षों से फंडिंग की कमी, निजी कंपनियों के हटने और एनजीटी (NGT) द्वारा ऊंची इमारतों पर लगाई गई रोक के कारण अटकी हुई है।
ग्रामीणों का विरोध: जठिया देवी और आसपास के 9 गांवों के लोग इस टाउनशिप का विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि ‘लैंड पूलिंग’ और भूमि अधिग्रहण से उनकी पुश्तैनी जमीन, खेती, पशुपालन और मंदिर खतरे में पड़ जाएंगे,। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि पुराने हाईवे और रेलवे प्रोजेक्ट्स के मुआवजे और पुनर्वास की शिकायतें अभी तक अनसुलझी हैं।
सरकार का रुख: मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू इस मॉडल को तेजी से लागू करना चाहते हैं ताकि केंद्र से मिलने वाला फंड अन्य राज्यों के पास न चला जाए। HIMUDA को इस परियोजना के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया है।
इन चर्चाओं से यह स्पष्ट होता है कि सरकारों के लिए जिसे ‘विकास’ माना जा रहा है, वह स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरणविदों के लिए एक ‘संकट’ बन गया है। टनलिंग और बड़े निर्माण कार्यों ने हिमालयी क्षेत्रों के पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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