यह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के डेली मॉर्निंग पॉडकास्ट का एपिसोड-134 है। मंगलवार, 5 फरवरी को देश भर की पर्यावरणीय ख़बरों के साथ पॉडकास्ट में जानिए ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर पर सरकार की स्थिति और बड़े हादसों में पीड़ितों की पहचान के लिए NDMA की नई गाइडलाइंस।
हैदराबाद के पास 50 साल बाद बाघ देखा गया। यादाद्री-भुवनगिरी जिले में डर का माहौल है। गांव के लोग रात में घर से बाहर नहीं निकल रहे। पशु मारे गए हैं। वन विभाग हाई अलर्ट पर है। लोगों की जिंदगी प्रभावित हुई है।
जापान में रिकॉर्ड बर्फबारी से हालात बिगड़ गए। 6.5 फुट बर्फ गिरने से कम से कम 35 लोगों की मौत हुई और करीब 400 लोग घायल हुए। उत्तर जापान के कई इलाकों में हिमस्खलन का खतरा है। सड़कें बंद हैं। ट्रेन सेवाएं ठप हैं। 1,700 से ज्यादा घरों में बिजली नहीं है। सरकार ने हाई अलर्ट जारी किया।
विशेषज्ञों ने कहा कि यूनियन बजट 2026-27 में स्वच्छ हवा को प्राथमिकता नहीं दी गई। दिल्ली-एनसीआर में गंभीर वायु प्रदूषण के बावजूद पर्यावरण को दूसरे दर्जे पर रखा गया। बजट में कोयला, परमाणु ऊर्जा और कार्बन कैप्चर पर ज्यादा जोर है। प्रदूषण नियंत्रण और शहरी पर्यावरण कार्यक्रमों के लिए कम फंड रखा गया।
झारखंड हाई कोर्ट ने चाईबासा सदर अस्पताल में ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बाद 5 बच्चों को एचआईवी होने के मामले में पुलिस को तुरंत एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा मामला बहुत गंभीर है और देरी बर्दाश्त नहीं होगी। परिवारों ने अस्पताल की लापरवाही और सिस्टम की गलती का आरोप लगाया।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर पर सरकार ने लोकसभा को बताया कि बिहार में कोई प्रोजेक्ट नहीं है। आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश में फेज-1 का काम पूरा हो चुका है। उत्तर प्रदेश में फेज-2 के तहत नई ट्रांसमिशन लाइनें और सबस्टेशन मंजूर हुए हैं। सोलर सेक्टर के लिए 66,000 से ज्यादा सूर्य मित्र प्रशिक्षित किए गए हैं।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने बड़े हादसों में मरने वालों की पहचान के लिए पहली बार राष्ट्रीय दिशानिर्देश जारी किए हैं। इसमें डेंटल डेटा रजिस्ट्री और फॉरेंसिक आर्कियोलॉजी जैसे तरीके शामिल हैं। यह कदम पिछले साल की बड़ी त्रासदियों के बाद उठाया गया। लक्ष्य पीड़ितों की सही पहचान और परिवारों को सम्मान के साथ शव सौंपना है।
विस्तृत चर्चा

ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर: रिन्यूएबल बिजली को ग्रिड तक पहुँचाने का नेटवर्क
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर क्या है? चर्चा के अनुसार, ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर एक विशेष प्रकार का ट्रांसमिशन नेटवर्क है। इसका मुख्य काम सोलर (सौर) और विंड (पवन) जैसे रिन्यूएबल सोर्सेस (नवीकरणीय स्रोतों) से बनी बिजली को सुरक्षित तरीके से ग्रिड तक पहुँचाना है। भारत में अक्सर रिन्यूएबल एनर्जी के प्रोजेक्ट्स उन जगहों पर होते हैं जहाँ बिजली की खपत कम होती है, जैसे कि राजस्थान या मध्य प्रदेश। इसलिए, बिजली को दूसरे राज्यों तक पहुँचाने के लिए मजबूत हाई वोल्टेज लाइनों और सबस्टेशनों की जरूरत होती है, जिसे यह कॉरिडोर पूरा करता है।
योजना के दो चरण (Phases) इस परियोजना को दो हिस्सों में बांटा गया है:
1. फेज 1 (Phase 1): इसका उद्देश्य राज्यों के भीतर ट्रांसमिशन लाइनों और सबस्टेशनों को मजबूत करना है ताकि रिन्यूएबल एनर्जी को लोकल ग्रिड में जोड़ा जा सके। संसद में दिए गए जवाब के अनुसार, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश में फेज 1 के सभी प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं, जिसमें मध्य प्रदेश में 400 केवी का सागर सबस्टेशन शामिल है।
2. फेज 2 (Phase 2): इसमें लंबी दूरी तक बिजली भेजने के लिए नए ट्रांसमिशन नेटवर्क बनाए जा रहे हैं ताकि ज्यादा उत्पादन होने पर रिन्यूएबल बिजली बर्बाद न हो और पूरे देश के ग्रिड में इस्तेमाल हो सके। उत्तर प्रदेश में फेज 2 के तहत कई प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में फेज 2 का कोई प्रोजेक्ट नहीं है और बिहार में अभी तक इस योजना के तहत कोई प्रोजेक्ट शुरू नहीं हुआ है।
निष्कर्ष और महत्व कुल मिलाकर, इस पहल का उद्देश्य बिजली के उत्पादन (production) और उपयोग (utilization) के बीच होने वाले नुकसान को कम करना है। वक्ता ने इसकी तुलना ‘रिवैम्प्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम’ (Revamped Distribution Sector Scheme) से की है, जिसका लक्ष्य एटी एंड सी (AT&C) लॉसेस को कम करना था (जैसे स्मार्ट मीटर्स के जरिए)। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर भी ग्रिड को ज्यादा स्थिर (stable) बनाने की दिशा में उठाया गया एक वैसा ही कदम है।
NDMA ने जारी की आपदा पीड़ित पहचान गाइडलाइंस
जब देश में कोई बड़ा हादसा या आपदा होती है और बड़ी संख्या में लोगों की मौत होती है, तो शवों की पहचान एक बड़ी चुनौती बन जाती है। इसी समस्या को आसान बनाने के लिए नेशनल डिज़ास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने पहली बार एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर जारी किया है।

यह दस्तावेज़ बताता है कि ऐसे हादसों के बाद क्या-क्या कदम उठाने चाहिए। इसमें सभी स्टेकहोल्डर्स की भूमिका, शवों की पहचान के लिए बनने वाली टीमों की संरचना और सिस्टम की प्रमुख कमियों पर बात की गई है। इनमें मैनपावर और ट्रेनिंग की कमी, लॉजिस्टिक्स की दिक्कतें और आपदा स्थल पर कोऑर्डिनेशन व लीडरशिप की समस्याएं शामिल हैं।
गाइडलाइंस में पहचान की प्रक्रिया को चार चरणों में बांटा गया है। इसमें इंसानी अवशेषों को व्यवस्थित तरीके से इकट्ठा करना, पोस्टमॉर्टम डेटा जुटाना, परिवारों से मेडिकल रिकॉर्ड जैसे एंटी-मॉर्टम डेटा लेना और फिर पहचान के बाद शवों को सम्मान के साथ परिजनों को सौंपना शामिल है।
दस्तावेज़ में दो अहम सुझाव भी दिए गए हैं। पहला, नेशनल डेंटल डेटा रजिस्ट्री बनाना ताकि दांतों और जबड़ों से पहचान की जा सके। दूसरा, फोरेंसिक आर्कियोलॉजी का इस्तेमाल, जिससे महीनों या सालों बाद भी पहचान में मदद मिल सके। यह कदम पिछले साल हुई बड़ी त्रासदियों के बाद उठाया गया है।
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