24 मई 2026 की रात करीब ढाई बजे का समय, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के पनपथा बफर से सटे खेरवा टोला गांव में बाघ घुस आया। बाघ ने आंगन में सो रही 40 वर्षीय फूलबाई पर हमला किया। उन्हें बचाने दौड़े पति व अन्य परिजन भी उसकी चपेट में आ गए। कुछ घंटे बाद बाघ लौटा, जिससे गांव में दशहत फैल गई। आक्रोशित ग्रामीणों ने वन अमले पर हमला किया। इसके बाद विभाग ने बाघ को ट्रंकुअलाइज़ किया।
मगर कैंप पहुंचने से पहले उसकी मौत हो गई।
जबलपुर स्थित स्टेट वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक हेल्थ सेंटर ने बाघ का पोस्टमार्टम किया। इसमें बाघ की मौत कार्डियो-रेस्पिरेटरी फेल्योर से सामने आई। रिपोर्ट के आने के बाद 7 ग्रामीणों को गिरफ्तार किया।
यह घटना उस बड़े सवाल की ओर इशारा करती है, जिसका सामना मध्य प्रदेश को अपनी बढ़ती बाघ आबादी के साथ करना पड़ रहा है: क्या बाघों की संख्या बढ़ने के साथ उनके लिए सुरक्षित और जुड़े हुए जंगल भी उसी अनुपात में बढ़े हैं ?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस साल राज्य में बाघ हमलों में मरने वालों की संख्या 22 तक पहुंच गई हैं। वहीं दूसरी ओर, एनटीसीए के डाटा के अनुसार 2022 से 2025 के बीच मध्य प्रदेश में कम से कम 168 बाघों की मौतें दर्ज हुई। इनमें से 114 यानी करीब 68% मौतें टाइगर रिजर्व के अंदर और 54 यानी करीब 32% बाहर हुईं। 2026 में अब तक कम से कम 33 मौतें दर्ज हैं, जिससे कुल संख्या 201 तक पहुंचती है
नेशनल टाइगर कंजर्वेशन आर्थिरटी (एनटीसीए) के अनुसार बाघों की मौत प्राकृतिक कारणों, टेरिटोरियल संघर्ष, बीमारी, दुर्घटना, मानव-वन्यजीव संघर्ष और शिकार जैसी वजहों से हो रही हैं।

उपलब्ध रिज़र्व डेटा के अनुसार, 2022 और 2025 के बीच सबसे ज़्यादा मौतें—लगभग 50—बांधवगढ़ में दर्ज की गईं। इसके बाद कान्हा में करीब 25, पेंच में 20, सतपुड़ा में 15 और पन्ना में करीब 10 मौतें हुईं। शेष मामले माधव, संजय-दुबरी, वीरांगना दुर्गावती, रातापानी और रिजर्व के बाहर के वन क्षेत्रों के हैं।
बांधवगढ़ और कान्हा जैसे उच्च घनत्व वाले रिजर्वों में प्राकृतिक मौत और टेरिटोरियल संघर्ष के मामले अधिक दिखाई देते हैं। 11 मई 2026 को बांधवगढ़ के पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय बाघ ‘पुजारी’ की मौत इसका उदाहरण है।
वहीं रिजर्व से बाहर होने वाली मौतों में सड़क, रेल दुर्घटना, बिजली के तारों से करंट, कुएं में गिरना, जहर और मानव-सघंर्ष जैसे जोखिम शामिल हैं। 2022 में रिजर्व के बाहर हुई मौतों का हिस्सा करीब 29 प्रतिशत था, जो 2025 में बढ़कर 35 प्रतिशत हो गया ।
यह संकेत है कि बाघों की आवाजाही अब संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। कॉरिडोर, बफर और मानव-प्रधान इलाकों में जोखिम बढ़ रहा है।
बाघों की मौत का हर मामला बढ़ती आबादी का प्रमाण नहीं है। लेकिन एक साथ दो घटनाएं —मानव आबादी के करीब बाघों का पहुंचना और उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों में बाघों की टेरिटोरियल लड़ाई— यह सवाल जरूर खड़ा करती हैं: क्या कुछ लैंडस्केप में बाघों की संख्या और उपलब्ध सुरक्षित क्षेत्र के बीच दबाव बढ़ रहा है?
राज्य वन अनुसंधान संस्थान (SFRI), जबलपुर के ”लैंडस्केप-स्केल टाइगर ऑक्यूपेंसी इन मध्य प्रदेश: पैटर्न्स, ड्राइवर्स एंड कन्सर्वेशन इंप्लिकेशंस” अध्ययन भी चेतावनी देता है। शोध बताता है कि बाघों के जंगल अब अपनी पारिस्थितिक वहन क्षमता के करीब हैं। ऐसे में वन्यजीव काॅरिडोर्स को बचाना और ग्रामीण क्षेत्रों में सह-अस्तित्व की नीतियां लागू करना ही एकमात्र रास्ता है।
एक बाघ को कितनी जगह चाहिए ?
राज्य में अखिल भारतीय बाघ आकलन-2022 के अनुसार 785 बाघ हैं, जो देश में सबसे अधिक हैं। 2018 में यह संख्या 526 थी, यानी चार वर्षों में ही 259 बाघ बढ़े। यह संरक्षण की बड़ी सफलता है।
हालांकि, इस बात का कोई पक्का जवाब नहीं है कि बाघ को कितनी जगह की ज़रूरत होती है। सतपुड़ा फाउंडेशन के डिप्टी डायरेक्टर मंदार पिंगले बताते हैं, “बाघ के लिए जरूरी क्षेत्र शिकार की उपलब्धता, जंगल की गुणवत्ता, पानी और दूसरे बाघों की मौजूदगी पर निर्भर करता है।”
यही बात मध्य प्रदेश के सतपुड़ा परिदृश्य में डब्ल्यूआईआई के अध्ययन से समझी जा सकती है।
इस अध्ययन में रेडियो-कॉलर किए गए वयस्क नर बाघ का औसत वार्षिक होम-रेंज करीब 268 वर्ग किलोमीटर और वयस्क मादा का करीब 64 वर्ग किलोमीटर पाया गया था। सब-एडल्ट बाघों के क्षेत्र इससे काफी छोटे थे। यानी एक बाघ की जरूरत केवल एक निश्चित संख्या में वर्ग किलोमीटर नहीं है। शिकार और आवास की गुणवत्ता बदलने पर उसका क्षेत्र भी बदलता है।
जबकि कान्हा के टाइगर कंजर्वेशन प्लान में भी बाघों की वहन क्षमता को शिकार प्रजातियों के बायोमास से जोड़कर देखा गया है।
इस आकलन में उपलब्ध शिकार के आधार पर लगभग 12 बाघ प्रति 100 वर्ग किलोमीटर तक ही संभावित क्षमता का अनुमान लगाया गया था। यह पूरे मध्य प्रदेश के लिए तय सीमा नहीं है। बल्कि कान्हा के विशिष्ट आवास और उस समय उपलब्ध शिकार के आधार पर आधारित मॉडल है।
“बाघों की संख्या बढ़ना अपने आप में समस्या नहीं है।” पिंगले कहते हैं, “समस्या तब पैदा होती है जब बाघों की स्थानीय घनत्व, शिकार और सुरक्षित टेरिटरी की उपलब्धता के बीच संतुलन बिगड़ने लगे।”
एसएफआरआई का अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण
राज्य वन अनुसंधान संस्थान (SFRI), जबलपुर के वैज्ञानिकों का अध्ययन अखिल भारतीय बाघ आकलन 2022 के दौरान एकत्र किए गए फील्ड डेटा पर आधारित है। शोधकर्ताओं ने कैमरा ट्रैप पर निर्भर रहने के बजाय ऑक्यूपेंसी मॉडलिंग तकनीक अपनाई।
अध्ययन के लेखक डॉ. मंयक मकरंद वर्मा, इस वैज्ञानिक तकनीक को समझाते हैं, “इस पद्धति में किसी प्रजाति की संख्या नहीं, बल्कि उसके किसी क्षेत्र में मौजूद होने की संभावना का आकलन किया जाता है।”
मध्य प्रदेश के लगभग 1,06,700 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को 10×10 किलोमीटर के 1,067 ग्रिड में विभाजित किया। प्रत्येक ग्रिड में बाघों की मौजूदगी के संकेत जैसे पगमार्क, मल, खराेंच, और अन्य फील्ड साइन का सर्वे किया।
इसके बाद सांख्यिकीय मॉडल के माध्यम से उन संकेतों को वन आवरण, शिकार प्रजातियों की उपलब्धता, वर्षा तापमान, जल स्रोत और मानव दबाव जैसे कारकों के साथ जोड़कर विश्लेषण किया।
इस पद्धति की विशेषता बताते हुए वर्मा कहते हैं, ”यदि किसी स्थान पर सर्वेक्षण के दौरान बाघ दिखाई नहीं देता, तब भी मॉडल यह अनुमान लगा सकता है कि वहां उसके मौजूद होने की कितनी संभावना है। इसलिए इसे बड़े लैंडस्केप स्तर पर कैमरा ट्रैप से अधिक प्रभावी माना जाता है।”
अध्ययन में मप्र को दो प्रमुख बाघ परिदृश्यों (विंध्य और सतपुड़ा-मैकल लैंडस्केप) में बांटकर विश्लेषण किया गया।
विंध्य लैंडस्केप, जिसमें बांधवगढ़, पन्ना और संजय-दुबरी शामिल हैं। वहां बाघों की मौजूदगी मुख्य रूप से शिकार प्रजातियों की उपलब्धता पर निर्भर मिली। यह इलाका खेती, गांवों और खनन के कारण अधिक खंडित है। इसलिए यहां बाघों और इंसानों का आमना-सामना अपेक्षाकृत ज़्यादा होता है।
यहां 654 में से 172 ग्रिडों में बाघों की मौजूदगी दर्ज की गई। जो लगभग 17,194 वर्ग किलोमीटर (नैव ऑक्यूपेंसी 0.26) का क्षेत्र है।

इसके वितरीत सतपुड़ा-मैकल लैंडस्केप, जिसमें कान्हा, पेंच और सतपुड़ा के घने और आपस में जुड़े जंगल आते हैं। वहाँ घना वन आवरण और अच्छी वर्षा बाघों की मौजूदगी के सबसे बड़े कारक पाए गए। यहां 413 में से 155 ग्रिडों में बाघ दर्ज किए गए, जो 15,599 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (नैव ऑक्यूपेंसी 0.38) में फैले हुए हैं।
शोधकर्ताओं ने इसे मध्य प्रदेश का प्रमुख सोर्स लैंडस्केप माना है। जहां से युवा बाघ दूसरे क्षेत्रों की ओर फैलते हैं।
शोधकर्ताओं ने इस गणना में यह भी शामिल किया कि कुछ जगहों पर बाघ मौजूद होने के बावजूद सर्वे में डिडेक्ट नहीं हुए होंगे। तो राज्यभर में बाघों की मौजूदगी वाला क्षेत्र करीब 37,345 वर्ग किलोमीटर (0.35 ऑक्युपेंसी) निकला। यह आंकड़ा सीधे मिले संकेतों से (सामान्य नैव अनुमान) 33,077 वर्ग किलोमीटर से 4268 वर्ग किलोमीटर अधिक है।
अब सवाल है कि शोधकर्ताओं ने इसे नियर सेचुरेशन यानी लगभग भराव की स्थिति क्यों कहा ?
शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि बाघों की ज़्यादा संभावना वाले इलाके नक़्शे में कहां स्थित हैं। अध्ययन में ऐसे क्षेत्र प्रमुख रूप से पहले से मौजूद टाइगर रिजर्व और उनसे जुड़े कॉरिडोर्स के आसपास केंद्रित दिखाई दिए।
इन्हीं मौजूदा बाघ आबादीयों से लगे हुए फ़ॉरेस्ट पैचेज़ (वनखंड) में है। इसी आधार पर अध्ययन में करीब 37,345 वर्ग किलोमीटर की मौजूदा टाइगर ऑक्यूपेंसी को उपलब्ध सूटेबल फॉरेस्ट हेबिटेट के लगभग सेचुरेशन की स्थिति बताया गया है।
मकरंद कहते हैं, “’इसका मलतब यह नहीं है कि जंगल में अब बिल्कुल जगह नहीं बची, बल्कि यह कि नए वयस्क बाघों के लिए सुरक्षित टेरिटरी तेजी से सीमित होती जा रही है।”
वे आगे कहते हैं, “जहां बाघों के लिए उपयुक्त जंगल मौजूद है। वहाँ उनकी मौजूदगी पहले से काफी हद तक केंद्रित हो चुकी है। नए इलाकों में बड़े पैमाने पर फैलने के विकल्प सीमित हैं।”
आगे की कंजर्वेशन स्ट्रेटजी में नए क्षेत्र खोजने से ज्यादा मौजूदा जंगल, पानी, शिकार और उन्हें जोड़ने वाले कॉरिडोर्स को बचाने पर जोर देना होगा।
हर रिजर्व में बाघों का दबाव एक जैसा नहीं
मध्य प्रदेश के पुराने छह टाइगर रिजर्वों में भी आबादी समान नहीं है।
2022 के राष्ट्रीय आकलन में बांधवगढ़ में 135, कान्हा में 105 और पेंच में 77 बाघों की आबादी दर्ज हुई थीं। सतपुड़ा में 2022 में 50 व्यक्तिगत बाघ पहचाने गए और अनुमानित घनत्व 2.01 बाघ प्रति 100 वर्ग किलोमीटर था।
कान्हा में 2022 में 105 व्यक्तिगत बाघ पहचाने गए और घनत्व 5.57 बाघ प्रति 100 वर्ग किलोमीटर आंका गया। वहीं नए क्षेत्रों में स्थिति बिल्कुल अलग रही है। वीरांगना दुर्गावती में 2023 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। उस समय वहां करीब 15 बाघ बताए गए थे। 2024 में बांधवगढ़ से दो बाघ वहां स्थानांतरित किए गए।
माधव 2025 में राज्य का आठवां टाइगर रिजर्व बना। यहां बाघों को दूसरे रिजर्व से लाकर आबादी स्थापित की जा रही है। 2025 में इसकी संख्या सात तक पहुंची थी। इसका अर्थ साफ है कि मध्य प्रदेश में सभी टाइगर रिजर्व ओवरफुल नहीं हैं। कुछ लैंडस्केप में बाघों की घनत्व बहुत अधिक है, जबकि कुछ नए रिजर्व अभी बाघों की आबादी स्थापित करने के चरण में हैं।
क्या उनके रास्ते सिमट रहे हैं ?
बाघों के लिए अगली चुनौती अब जंगल के भीतर नहीं, बल्कि जंगलों के बीच उन संकरी पट्टियों में है, जिनसे होकर वे एक इलाके से दूसरे इलाके में जाते हैं।
पिंगले कहते हैं, “एक टाइगर रिजर्व अपने आप में पर्याप्त नहीं होता। एक युवा बाघ को नई टेरिटरी खोजने के लिए दूसरे जंगल तक पहुंचने का रास्ता चाहिए। यही रास्ते वन्यजीव कॉरिडोर कहलाते हैं। यदि ये कॉरिडोर टूटते हैं तो बाघों का फैलाव रूक जाता है और उनका सामना खेतों, गांवों और इंसानों से होने लगता है।”
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ( NTCA) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने मध्य भारत के कई ऐसे कॉरिडोर चिंहित किए हैं।
इनमें बांधवगढ़-संजय-दुबरी-गुरु घासीदास, कान्हा-अचनाकमार, कान्हा-पेंच और पेंच-सतपुड़ा-मेलघाट जैसे कॉरिडोर मध्य प्रदेश के लिए खास महत्व रखते हैं। इन कॉरिडोरों का बड़ा हिस्सा टाइगर रिजर्व के बाहर है। यहां बाघ संरक्षण और विकास परियोजनाओं के बीच टकराव ज्यादा है। इसका ताजा उदाहरण सतपुड़ा-मेलघाट कॉरिडोर से जुड़ा बैतूल-खंडवा इकोनॉमिक कॉरिडोर है।

3 फरवरी 2026 में राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की बैठक में इस सड़क परियोजना को लेकर एनटीसीए ने विस्तृत साइट आकलन की जरूरत बताई। समिति ने माना कि प्रस्तावित सड़क उस पारिस्थितिक लैंडस्केप से गुजरती है, जो सतपुड़ा और मेलघाट टाइगर रिजर्व के बीच संपर्क बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
समस्या केवल सड़क तक सीमित नहीं है। बांधवगढ़ और संजय-दुबरी के बीच पुराने कॉरिडोर पर बाणसागर बांध की ऊंचाई बढ़ने से जलस्तर बढ़ा। इससे वन्यजीवों की आवाजाही प्रभावित हुई। इसकी पुष्टि मध्य प्रदेश के महालेखाकार की वन्यजीव संबंधी रिपोर्ट-2022 से भी होती है। रिपोर्ट में चेताया है कि दोनों क्षेत्रों के बीच जीन प्रवाह के लिए महत्वपूर्ण मार्ग बंद हो गया है।
वहीं संजय-दुबरी के 2025 के इको-सेंसिटिव जोन प्लान में भी इस लैंडस्केप की अहमियत दर्ज है। दस्तावेज के मुताबिक संजय राष्ट्रीय उद्यान और उसका ईएसजेड बांधवगढ़ से कान्हा और आगे छत्तीसगढ़ के संरक्षित क्षेत्रों को जोड़ने वाले क्षेत्रीय कॉरिडोर का हिस्सा है। इसका ईएसजेड का करीब 20-30 प्रतिशत हिस्सा प्रमुख वन्यजीव कॉरिडोर के रूप में काम करता है।
भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार 2021 से 2023 के बीच मध्य प्रदेश के फॉरेस्ट कवर में 371.54 वर्ग किलोमीटर कमी आई है। जो देश में सबसे अधिक है। हालांकि यह आंकड़ा सीधे यह नहीं बताता कि इतनी पूरी भूमि बाघ कॉरिडोर से घटी है। लेकिन यह उस व्यापक वन परिदृश्य पर दबाव का संकेत है, जिसमें बाघों को फैलना है।
अब संख्या नहीं, वहन क्षमता पर फोकस
इसी बदलती चुनौती को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार अब बाघों की कैरिंग कैंपेसिटी का अध्ययन करने जा रहा है।
वन विभाग ने डब्ल्यूआईआई (WII) से अनुरोध किया है कि वह मौजूदा पारिस्थितिक परिस्थितयों में हाई-डेंसिटी टाइगर रिजर्व की वहन क्षमता का आकलन करे। साथ ही शिकार बायोमास, आवास की गुणवत्ता, भूमि उपयोग, टेरिटरी डाइनैमिक्स और सामाजिक संरचना जैसे प्रमुख संकेतकों पर वैज्ञानिक इनुपट व साक्ष्य आधारित सुझाव दें।
राज्य के प्रधान मुख्य वनसंरक्षक और मुख्य वन्यजीव वार्डन शुभरंजन सेन समझाते हैं, ”कई मौतें इंट्रा-स्पेसिफिक कॉम्पिटिशन (एक ही प्रजाति के भीतर प्रतिस्पर्धा) के कारण हुई हैं। जो संकेत देती है कि अब मध्य भारत के टाइगर लैंडस्केप में डेंसिटी-ड्रिवेन दबाव बढ़ रहा है।”
हालांकि राज्य सरकार ने भी बफर क्षेत्रों में संघर्ष कम करने 2025 में 145 करोड़ की योजना बनाई। परियोजना में संवेदनशील इलाकों चेन-लिंक फेंसिंग, जल स्रोतों का विकास, वन्यजीव स्वास्थ्य निगरानी और स्थानीय समुदायों के कौशल विकास जैसे काम दिए जा रह हैं।
बाघों की बढ़ती आबादी के साथ अब सिर्फ बफर में काम करना पर्याप्त नहीं होगा। ऐसा मानते हुए पिंगले कहते हैं, “कॉरिडोर की जमीन बचाने, रैखिक परियोजनाओं की सही डिजाइन, बफर में शिकार व पानी उपलब्धता बनाए रखनी होगी। साथ ही ग्रामीणों को समय पर मुआवज़े भी मिले।”
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