मध्य प्रदेश के रीवा में बीहर नदी के एक द्वीप पर बने एक ईको पार्क को पर्यावरणीय नियमों के कथित उल्लंघन, निर्माण से जुड़ी रिपोर्टों में विरोधाभास को लेकर जांच के दायरे में लाया गया है। सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेजों और रीवा के स्थनीय निवासी अमित सिंह बघेल के आकलन से यह संकेत मिलता है कि अधिकारियों ने कागजों पर जिस योजना को मंजूरी दी थी और जमीन पर जो निर्माण हुआ है, दोनों के बीच बड़ा फर्क है।

गूगल अर्थ की हिस्टोरिकल इमेजरी के अनुसार वर्ष 2014, 2018 और 2025 की सूरते हाल में बड़ा बदलाव दिखता है। वर्ष 2014 की तस्वीर में द्वीप पेड़ों से घिरा हुआ दिखाई देता है। 2018 तक वहां के पेड़ गायब हो चुके थे। 2025 की तस्वीर में नदी ग्रीन बेल्ट पर स्थायी निर्माण दिखाई देते हैं। बघेल का कहना है कि यह जमीन कभी भी स्थायी निर्माण के लिए नहीं थी।
नदी के कैचमेंट में होता निर्माण
दस्तावेजों की यह कहानी जनवरी 2010 से शुरू होती है। उस समय नगर तथा ग्राम निवेश, रीवा कार्यालय ने वन विभाग को बताया था कि निपनिया गांव स्थित बीहर नदी के खसरा नंबर 156, 157, 159 और 160 जल निकाय (वाटर बॉडी) हैं, जबकि खसरा नंबर 158 वनरोपण भूमि के अंतर्गत आता है।

इसी अवधि के एक अन्य रिकॉर्ड में खसरा नंबर 158/1 के अधिग्रहण के दौरान मुआवजे के लिए दर्ज 35 पेड़ों का उल्लेख है। इनमें आम, महुआ, कहुआ, बबूल और अमरूद के पेड़ शामिल थे। गौरतलब है कि 60 सेमी की मोटाई के कई पेड़ इस सूची में शामिल हैं। दस्तावेजों के अनुसार इन 35 पेड़ों की कीमत मात्र 1349 रूपये लगाई गई है।
जुलाई 2010 में राज्य के आवास एवं पर्यावरण विभाग ने प्रस्तावित इको-टूरिज्म स्थल के लिए भूमि उपयोग परिवर्तन के संबंध में रीवा के वन मंडलाधिकारी (DFO) को पत्र लिखा। विभाग ने अपने नोट में एक बात स्पष्ट कही थी कि द्वीप पर होटल या खान-पान की सुविधा विकसित करने से नदी के पर्यावरण के प्रदूषित होने का वास्तविक खतरा है। इसलिए वहां केवल ‘आमोद-प्रमोद’ संबंधी सुविधा विकसित की जानी चाहिए, न कि ऐसा निर्माण जिसमें खान-पान की व्यवस्था शामिल हो।
वर्ष 2015 में नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग ने निपनिया गांव की 3.646 हेक्टेयर भूमि के भूमि उपयोग परिवर्तन को मंजूरी दी। इस भूमि पर सस्पेंशन ब्रिज, वॉटर पार्क, हर्बल गार्डन और स्नैक काउंटर के साथ एक पार्क विकसित किया जाना था। इसके अलावा बीहर नदी से 50 मीटर के भीतर रीवा की 1.55 हेक्टेयर भूमि को भी मनोरंजन संबंधी उपयोग के लिए चिन्हित किया गया, जबकि शेष भूमि को व्यावसायिक उपयोग के लिए निर्धारित किया गया। इसी आदेश में यह भी कहा गया था कि रीवा विकास योजना के अनुसार नदी के दोनों किनारों पर 50 मीटर चौड़ी पट्टी सामाजिक वानिकी और वृक्षारोपण के लिए खुली रखी जानी चाहिए।

बीहर-रीवा इकोटूरिज्म एंड एडवेंचर पार्क के लिए 25 नवंबर 2014 को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत एक कंसेशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए गए। बघेल का कहना है कि इस स्थल के लिए उनके प्रस्तावित लेआउट में कई हिस्सों में 50 मीटर सीमा के भीतर किसी प्रकार का निर्माण नहीं रखा गया था और औसतन इस सीमा का पालन किया गया था। इस योजना में केवल सीमित और कम प्रभाव वाले उपयोग की परिकल्पना की गई थी। उनका आरोप है कि निर्माण एजेंसी ने अपनी ही स्वीकृत डिजाइन का पालन नहीं किया और बाद में प्रमाणन करने वाले अधिकारियों ने इसके बावजूद परियोजना को मंजूरी दे दी।
क्या है ज़मीनी हकीकत
कंसेशन एग्रीमेंट में रियायतधारी (Concessionaire) के लिए 13 न्यूनतम विकास कार्य निर्धारित किए गए थे। इनमें दोनों द्वीपों को जोड़ने वाले सस्पेंशन ब्रिज, शौचालय, स्टाफ हट, इंटरप्रिटेशन सेंटर, बटरफ्लाई पार्क, कैफेटेरिया, ट्रीहाउस, एडवेंचर स्पोर्ट्स सुविधाएं और अन्य निर्माण शामिल थे।
जनवरी 2022 की “अपडेटेड प्रोजेक्ट स्टेटस रिपोर्ट” में परियोजना के 28 घटकों का नियोजित और वास्तविक प्रगति का चार्ट दिया गया है। इसमें 27 घटकों को पूरा बताया गया है। इनमें बटरफ्लाई पार्क, कैफेटेरिया, ट्रीहाउस, तीरंदाजी मैदान, पेंटबॉल क्षेत्र, आर्टिफिशियल रॉक और बर्मा ब्रिज जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसी सूची में ध्यान एवं योग केंद्र तथा म्यूजिकल फाउंटेन को बाद में जोड़े गए कार्यों के रूप में दर्शाया गया है, लेकिन इनके सामने पूर्ण होने की तिथि दर्ज नहीं है।
हालांकि, मई 2023 तक वन परिक्षेत्र अधिकारी (Range Officer) और वन मंडलाधिकारी (DFO) कार्यालय की निरीक्षण रिपोर्टों में अनुबंध के तहत निर्धारित सभी 13 घटकों को पूर्ण बताया गया। इसके आधार पर विभाग ने पार्क के संचालन की अनुमति देने की सिफारिश की। रीवा के वन मंडलाधिकारी द्वारा जारी एक प्रमाणपत्र में कहा गया कि कार्य कंसेशन एग्रीमेंट की शर्तों के अनुसार किया गया है तथा इसमें वन कानून या सरकारी नियमों का कोई उल्लंघन नहीं पाया गया।
यहां गौर करने की की बाद है कि जब 17 जून 2026 को जब ग्राउंड रिपोर्ट की टीम मौके पर पहुंची तो वहां बटरफ्लाई पार्क, साइकिलिंग ट्रैक, बर्मा ब्रिज, लाइब्रेरी, और मेडिटेशन सेंटर जैसी सुविधाएं नदारद थीं। बघेल का यह भी कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के अनुसार किसी जल निकाय के पास शौचालय बनने पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) होना अनिवार्य है, लेकिन यहां ऐसा कोई प्लांट नहीं बनाया गया। उनका आरोप है कि शौचालयों का अपशिष्ट सीधे नदी में जाता है।

‘ईको पार्क’ जो हर बड़ी बाढ़ में डूब जाता है
इन्हीं दस्तावेजों में शामिल सितंबर 2016 के फोटोग्राफ से पता चलता है कि बीहर नदी में आई बाढ़ के दौरान परियोजना स्थल पूरी तरह जलमग्न हो गया था। तस्वीरों में एक पुल का ढांचा भी आंशिक रूप से पानी में डूबा दिखाई देता है।
उसी समय प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट में बताया गया था कि बाढ़ के पानी से रीवा का संपर्क कट गया था, सेना को बुलाना पड़ा था और इको पार्क का सस्पेंशन ब्रिज तेज बहाव में उखड़ गया था। बघेल का कहना है कि यह द्वीप नदी के बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) का स्वाभाविक, भले ही अपेक्षाकृत ऊंचा, हिस्सा है और लगभग हर बड़ी बाढ़ में डूब जाता है।
इन सभी शिकायतों पर प्रतिक्रिया देते हुए नगर निगम आयुक्त, रीवा ने कहा कि मामले की जांच की जाएगी। इसमें मूल स्वीकृति की शर्तों और वर्तमान में पार्क के संचालन के तरीके की तुलना की जाएगी। इसके बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाएगा।
बघेल ने इस मामले में राज्य के संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपना पक्ष रखा है। उनका कहना है कि यदि इस पर कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो वह राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) का रुख करेंगे। इसके अलावा, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की अवकाश अवधि समाप्त होने के बाद इस मामले में एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर करने की तैयारी की जा रही है।
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