केंद्र ने कहा एथेनॉल से वाहनों के इंजन में कोई दिक्कत नहीं, इलेक्ट्रिक और सीएनजी कारों का चलन बढ़ा, मप्र में मानसून की चाल अब भी धीमी, दिल्ली में नई ईवी पॉलिसी लागू। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट किया है कि पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने से वाहनों के इंजन को नुकसान होने का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिला है। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसके इस्तेमाल से गाड़ी की बीमा पॉलिसी पर कोई असर नहीं पड़ता है।
इस साल की पहली छमाही में देश में बिकने वाली नई कारों में से 37% कारें इलेक्ट्रिक (EV) या सीएनजी (CNG) मॉडल की हैं। पेट्रोल और डीजल कारों की बाजार हिस्सेदारी में कमी देखी जा रही है।
कमजोर मानसून के कारण देश में खरीफ की बुआई में 23% की गिरावट आई है। धान (चावल) का रकबा भी पिछले साल की तुलना में लगभग 25% घट गया है, जिससे आने वाले समय में महंगाई बढ़ने की आशंका है।
दिल्ली में नई इलेक्ट्रिक वाहन नीति लागू हो गई है। अब सब्सिडी पाने के लिए वाहन मालिकों को 30 दिनों के भीतर पोर्टल पर स्वयं आवेदन करना होगा। इसमें 2030 तक के लिए नए प्रोत्साहन और लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
प्रदेश में मानसून की रफ्तार धीमी है और भोपाल में इसकी एंट्री में देरी हो रही है। हालांकि, मौसम विभाग ने प्रदेश के 32 जिलों में ‘येलो अलर्ट’ जारी किया है और अगले 72 घंटों में अच्छी बारिश की संभावना जताई है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उज्जैन में पेप्सिको के नए फ्लेवर कंसंट्रेट प्लांट का शुभारंभ किया। इस परियोजना से क्षेत्र में 18,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने का दावा किया गया है।
विस्तृत चर्चा
आज की चर्चा में हमारे असोसिएट एडिटर वाहिद भट बताएंगे कि जुलाई में बारिश का हाल कैसा रहने वाला है?
क्या जुलाई में पर्याप्त बारिश होगी?
भारत में कमजोर मानसून के कारण वर्तमान में कृषि क्षेत्र के सामने एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है, जिससे बुवाई की धीमी गति और सूखे जैसी स्थिति पैदा हो गई है।
जून में ऐतिहासिक कमी
मानसून की शुरुआत काफी निराशाजनक रही है, क्योंकि जून का महीना पिछले 125 वर्षों में सबसे शुष्क दर्ज किया गया है। देश भर में इस दौरान सामान्य से 40% कम बारिश हुई है। आंकड़ों के अनुसार, जून में केवल 99.5 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य तौर पर यह 165 मिमी होनी चाहिए थी।
जुलाई का चिंताजनक पूर्वानुमान
भारतीय मौसम विभाग (IMD) की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में भी स्थिति में बहुत अधिक सुधार की उम्मीद नहीं है:
बारिश का अनुमान: जुलाई में वर्षा लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का केवल 94% रहने की संभावना है।
जुलाई का महत्व: खेती के लिए जुलाई सबसे महत्वपूर्ण महीना माना जाता है क्योंकि मानसून की कुल बारिश का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी महीने में होता है और यह फसलों की बुवाई का पीक समय होता है।
बढ़ता तापमान: कम बारिश के साथ-साथ, जुलाई के दौरान दिन और रात का तापमान भी सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है, जिससे फसलों पर दोहरा दबाव पड़ेगा।
कमजोर मानसून के वैज्ञानिक कारण
मौसम वैज्ञानिकों ने इस कमी के पीछे कई प्रमुख कारण बताए हैं:
लो-प्रेशर सिस्टम का अभाव: आमतौर पर जून में बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में दो-तीन कम दबाव वाले क्षेत्र बनते हैं जो मानसून को ताकत देते हैं, लेकिन इस साल ऐसा कोई सिस्टम विकसित नहीं हुआ।
एल नीनो (El Niño): प्रशांत महासागर में एल नीनो की स्थिति दोबारा उभर रही है, जिससे समुद्र की सतह गर्म हो जाती है और भारत का मानसून कमजोर पड़ जाता है।
अन्य वैश्विक कारक: मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) और इंडियन ओशन डिपोल (IOD) जैसे कारकों ने भी इस बार मानसून को कोई विशेष सहयोग नहीं दिया है।
कृषि और बुवाई पर प्रभाव
बारिश की देरी और कमी का सीधा असर खेती की गतिविधियों पर पड़ा है:
बुवाई में गिरावट: सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 25 जून तक फसलों की बुवाई पिछले साल के मुकाबले लगभग 23% कम रही है।
खेती का रकबा: पिछले साल इस समय तक 2.36 करोड़ एकड़ में बुवाई हो चुकी थी, जो इस साल घटकर केवल 1.82 करोड़ एकड़ रह गई है।
जोखिम में फसलें: विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जुलाई में बारिश कम रही, तो सोयाबीन, दालें और तिलहन की फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है।
फसलों की वृद्धि: जिन किसानों ने पहले ही बुवाई कर दी है, उनके लिए बारिश की कमी और बढ़ती गर्मी फसलों के शुरुआती विकास (growth) के लिए बड़ा खतरा बन गई है।
कम बारिश और अत्यधिक गर्मी का यह संयोजन भारतीय कृषि के लिए बेहद प्रतिकूल माना जा रहा है, और अब सारा दारोमदार जुलाई के बाकी दिनों में होने वाली संभावित बारिश पर टिका है।
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