ई टू-व्हीलर का मार्केट शेयर 10% के पार, कर्नाटक में 386 छोटे जलविद्युत प्रोजेक्ट्स रद्द, अरुणाचल में बाढ़-भूस्खलन से 3 की मौत, चंबल सेंचुरी का डीनोटिफिकेशन कैंसल। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
मुख्य सुर्खियां
भारत में पहली बार जून 2026 में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर की बाजार हिस्सेदारी 10% को पार कर गई है। ईरान युद्ध के चलते तेल की कीमतों में अनिश्चितता और नई सस्ती ई-बाइक के लॉन्च को इस तेजी का मुख्य कारण माना जा रहा है।
कर्नाटक में आवंटित किए गए 519 छोटे जलविद्युत प्रोजेक्ट्स में से 386 को पर्यावरणीय मंजूरी न मिलने के कारण रद्द कर दिया गया है। राज्य जलविद्युत क्षेत्र में अग्रणी होने के बावजूद इन परियोजनाओं को समय पर शुरू करने में चुनौतियों का सामना कर रहा है।
अरुणाचल प्रदेश में मानसूनी बारिश के कारण आई बाढ़ और भूस्खलन से 3 लोगों की मौत हो गई है और 12 जिले बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। राज्य के बुनियादी ढांचे, विशेषकर सड़कों और राजमार्गों को काफी नुकसान पहुंचा है जिससे कई गांव अलग-थलग पड़ गए हैं।
नई दिल्ली में 2 से 5 जुलाई तक प्लास्टिक रीसाइक्लिंग और स्थिरता पर तीसरा वैश्विक सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। भारत का प्लास्टिक रीसाइक्लिंग उद्योग वर्तमान में ₹30,000 करोड़ का है और इसके 2035 तक ₹60,000 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है।
सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने चंबल सेंचुरी की 511 एकड़ भूमि को राजस्व भूमि घोषित करने का अपना आदेश वापस ले लिया है। पहले इस जमीन को रेत खनन के लिए डी-नोटीफाई करने की कोशिश की गई थी जिसे अब रद्द कर दिया गया है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बिना परमिट के चल रहे ई-रिक्शा और उनसे होने वाली ट्रैफिक जाम की समस्या पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने इस मामले में 4 सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है क्योंकि ये वाहन बड़े शहरों में दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं।
विस्तृत चर्चा
आज की चर्चा में हमारे रिपोर्टर चंद्रप्रताप तिवारी बताएंगे भोपाल में झीलों में लाखों की संख्या में मरी मछलियां।
भोपाल की झीलों में मृत मिली मछलियां
भोपाल की झीलों में पिछले 48 घंटों के दौरान पांच लाख से ज़्यादा मछलियां मर गई हैं, और इस घटना ने भोपाल नगर निगम के लेक कंजर्वेशन सेल की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे ज़्यादा असर लोअर लेक यानी छोटा तालाब पर पड़ा है, जहां किनारों पर मरी हुई मछलियों के ढेर लग गए हैं, चारों तरफ बदबू फैल गई है और प्रशासन को आपातकालीन कार्रवाई करनी पड़ी है।
जांच के आदेश
नगर निगम ने सोमवार से सफाई अभियान शुरू कर मरी मछलियों को हटाना शुरू कर दिया है। वहीं मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी एमपीपीसीबी ने इस घटना की जांच शुरू कर दी है। पानी के नमूने लिए जा रहे हैं ताकि घुलित ऑक्सीजन का स्तर, सीवेज प्रदूषण और दूसरे रासायनिक कारणों की जांच हो सके। बोर्ड के मुताबिक शहर की जल निकायों की सालाना निगरानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड और जलीय पारिस्थितिकी को प्रभावित करने वाले अन्य पहलू शामिल होते हैं। मछलियों की मौत की असली वजह पानी के नमूनों की जांच रिपोर्ट आने के बाद ही साफ हो पाएगी।
क्या कारण हो सकते हैं?
नगर निगम के लेक कंजर्वेशन सेल के शुरुआती आकलन के मुताबिक ऑक्सीजन के स्तर में अचानक आई गिरावट इस सामूहिक मछली मौत की वजह हो सकती है। हालांकि अधिकारी यह भी जांच रहे हैं कि कहीं सीवेज का पानी झील में मिलने और प्रदूषण की वजह से पानी ज़हरीला तो नहीं हो गया।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वरिष्ठ वैज्ञानिक सुनील कुमार मीणा ने बताया कि भारी बारिश के बाद अक्सर “पॉन्ड टर्नओवर” नाम की एक प्राकृतिक प्रक्रिया से भी मछलियां मरती हैं, जिसमें ठंडा बारिश का पानी ऑक्सीजन-रहित तलछटी पानी से मिल जाता है। बारिश के साथ बहकर आया कचरा और प्रदूषक तत्व भी बैक्टीरिया बढ़ा देते हैं, जिससे ऑक्सीजन तेज़ी से खत्म हो जाती है।
सीवेज मिलने से इनकार
वहीं नगर निगम के सुपरिटेंडेंट इंजीनियर संतोष गुप्ता ने सीवेज मिलाए जाने की बात से इनकार किया और कहा कि गर्मियों में ऑक्सीजन घटना आम बात है, लेकिन मानसून के दौरान इतने बड़े पैमाने पर मछलियों का मरना असामान्य है। करीब सात साल पहले भी लोअर लेक में ऐसी ही घटना हुई थी।
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
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