राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने भोपाल के अयोध्या बायपास 10 लेन सड़क परियोजना को अनुमति दे दी है। इसके साथ ही 836 करोड़ के इस प्रोजेक्ट पर अब काम शुरू हो सकेगा। इस प्रोजेक्ट के लिए भोपाल के आशाराम तिराहा से लेकर रत्नागिरी चौराहा के बीच 8000 पेड़ काटे जाने थे। इसके खिलाफ भोपाल के पर्यावरण कार्यकर्ता नितिन सक्सेना ने एनजीटी की भोपाल स्थित सेंट्रल बेंच में याचिका लगाई थी। बाद में यह मामला दिल्ली स्थित प्रिंसिपल बेंच को ट्रांसफर हो गया।
17 अप्रैल को मामले पर अंतिम सुनवाई करते हुए अधिकरण के चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव, जस्टिस श्यो कुमार सिंह सहित 4 सदस्यीय कोरम ने यह फैसला सुनाया है। अधिकरण ने नेशनल हाइवे अथोरिटी ऑफ़ इंडिया (NHAI) के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा,
“क्योंकि यह प्रोजेक्ट राष्ट्रीय महत्त्व का है और इसमें इंटर-स्टेट कनेक्टिंग नेशनल हाईवे है इसलिए प्रतिवादियों (respondents) को एनएचएआई की गाइडलाइंस के अनुसार पर्यावरणीय नियम एवं स्थानीय कानूनों का सही तरीके से पालन करते हुए एक टाइमफ्रेम के अंदर प्रोजेक्ट पूरा करने का निर्देश दिया जाता है।”
इस प्रोजेक्ट की आधारशिला जनवरी 2024 को केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने रखी थी। बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई के चलते इसके खिलाफ भोपाल में एक से अधिक बार प्रदर्शन भी हुए। मगर अंततः फैसला ‘सड़क’ के पक्ष में ही गया।
ऐसे में हमने इस मामले में लगातार अधिकरण, प्रशासन और ज़मीन पर लड़ाई लड़ रहे पर्यावरण कार्यकर्ताओं से बात कर जानने की कोशिश की के वो इस फैसले के बारे में क्या सोचते हैं?

पहले जान लीजिए फैसला क्या आया?
मामले की अंतिम सुनवाई 17 अप्रैल को पूरी हुई। हालांकि संबंधित मामले का आदेश 20 मई को अपलोड किया गया है। आदेश में कहा गया कि- शहर की भीड़भाड़ और बढ़ती आबादी को देखते हुए और प्रोजेक्ट की बढ़ती लागत को ध्यान में रखते हुए, आज की ज़रूरत है कि पर्यावरण कानूनों और दूसरे ज़रूरी नियमों का ठीक से पालन करते हुए प्रोजेक्ट को एक टाइमफ्रेम के अंदर पूरा किया जाए।”
फैसले में यह भी कहा गया है कि इस प्रोजेक्ट की राज्य सरकार की बनाई हाई लेवल कमेटी जिसके प्रमुख एडिशनल चीफ सेक्रेटरी थे, ने दोबारा जांच की और कुछ शर्तों के साथ इसे सही पाया।
फैसले में क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण (compensatory plantation) की 15 साल तक के लिए एक टेक्नीकल कमिटी द्वारा निगरानी की जाएगी। इस समिति के सदस्य वन विभाग, उद्यानिकी विभाग, नगर निगम और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से होंगे।
गौरतलब है कि प्रोजेक्ट की एनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट रिपोर्ट के अनुसार कुल 80,000 पेड़ लगाए जाने हैं। राज्य द्वारा गठित सेंट्रली इम्पावर्ड कमिटी के समक्ष दिए जवाब के अनुसार हाइवे अथोरिटी द्वारा प्रोजेक्ट रोड के दोनों तरफ 10,000 पेड़ लगाएगा। इसके अलावा झिरनिया और झगरियाखुर्द में 85 हेक्टेयर ज़मीन पर 70,000 पेड़ लगाए जाएंगे।
नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया को पिछले पांच सालों में मध्य प्रदेश में किसी डिपार्टमेंट चाहे वो वन विभाग हो, नगरीय निकाय हो या फिर ट्री ऑफिसर हों, के पास जमा की गई कुल रकम के बारे में रिपोर्ट जमा करनी होगी।
साथ ही राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मेंबर सेक्रेटरी को निर्देश दिया गया है कि वे कैम्पा (CAMPA) फंड पेड़ों की कटाई के एवज में मिलने वाले फंड, इसके इस्तेमाल और क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के तहत लगे जिंदा पेड़ों के जानकारी इकट्ठा करें।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने क्या कहा?
मामले में याचिका लगाने वाले नितिन सक्सेना इस फैसले से निराश नज़र आते हैं। वहीं कहते हैं कि यह स्पष्ट हो गया है कि अधिकरण के लिए विकास प्राथमिकता है। वह कहते हैं कि चूंकि इसकी सुनवाई प्रिंसिपल बेंच द्वारा की जा रही थी ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि ऐसा फैसला आएगा जिसके आधार पर कोई नीति बन सकेगी। मगर ऐसा नहीं हुआ।
वहीं इस मामले में अयोध्या बायपास पर ही नागरिकों को इकठ्ठा कर विरोध प्रदर्शन का आयोजन करने वाले उमाशंकर तिवारी मानते हैं कि अगर जनता द्वारा सरकार पर पर्याप्त दवाब बनाया गया होता तो शायद यह फैसला न आता। उनके अनुसार जब पेड़ों को बचाने के लिए प्रदर्शन आयोजित किए जाते हैं तब शामिल होने वाले लोगों की संख्या बेहद कम होती है। वह इससे बेहद निराश नज़र आते हैं।
इस मामले में भोपाल के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अलग-अलग स्तर पर विरोध और आपत्तियां दर्ज की थीं। वरिष्ठ पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ सुभाष कुमार पाण्डेय ने 10 दिसंबर 2025 को राज्य की सेंट्रली एम्पावर्ड कमिटी के सामने अपनी लिखित शिकायत और सुझाव दर्ज करवाए थे।
ग्राउंड रिपोर्ट को मिले इस दस्तावेज में उन्होंने कहा था कि उनके द्वारा कमिटी के मेंबर सेकेट्री और नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के आयुक्त से इस बारे में मुलाक़ात भी की गई थी मगर फिर भी हाइवे अथोरिटी या फिर कमिटी से उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला।
अपनी शिकायत में वह कहते हैं कि NHAI के पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन, पेज नंबर 16 (NXRR3) के अनुसार, (जहां निर्माण कार्य होना है वहां) दो रिंग रोड एक दूसरे के समनांतर हैं। वह सवाल करते हैं कि कम से कम नुकसान के लिए दूसरा विकल्प, आउटर रिंग रोड, क्यों नहीं चुना गया?। दरअसल अभी जहां निर्माण कार्य होना है उसके पास स्थित इनर रिंग रोड के आसपास शहर की घनी आबादी बसी हुई है।

डॉ पाण्डेय क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के वायदे से भी संतुष्ट नहीं हैं। वह कहते हैं कि प्रशासन में किसी को भी इस बारे में वैज्ञानिक जानकारी नहीं है कि अयोध्या बायपास के उन पेड़ों के कटने से स्थानीय बायोडाईवर्सिटी को क्या नुकसान होगा? ऐसे में आने वाले समय में सही पेड़ लगें और वो बचे रहे इसके लिए प्रशासन तत्पर होगा? डॉ पाण्डेय पर भी सवाल खड़ा करते हैं।
वह कहते हैं कि पहले यह केस सेंट्रल बेंच में था जहां उनके जैसे लोग जो स्थानीय पर्यावरण पर वैज्ञानिक तर्क डे सकते हैं, थे। मगर दिल्ली स्थित प्रिंसिपल बेंच तक मामला जाने से केस में उनका दखल और सामने जाकर दलील करना कठिन हो गया। वह मानते हैं कि अगर इसकी सुनवाई भोपाल स्थित सेन्ट्रल बेंच में ही होती तो शायद फैसला कुछ और होता।
वह दुःख जताते हुए कहते हैं कि इस फैसले का असर लोकल वार्मिंग, जलाशयों और भोपाल आने वाले प्रवासी पक्षियों पर भी पड़ेगा।
यह पर्यावरण कार्यकर्ता कहते हैं कि ऐसे मामलों में प्रशासन और ठेकेदारों के खिलाफ लड़ने वाले उनके जैसे चुनिन्दा लोग होते हैं। यह लोग संसाधनों, पहुंच और शक्ति के लिहाज़ से अपेक्षाकृत कमज़ोर होते हैं। ऐसे में ज़रूरी है कि आम लोग उनका साथ देते हुए किसी मुहीम की तरह विरोध करें ताकि सरकार और प्रशासन पर दबाव बनाते हुए ऐसे फैसलों को टाला जा सके।
बैनर तस्वीर: अयोध्या बायपास किनारे कटे हुए पेड़ों पर बैठे लोग | भोपाल | फ़ोटो: चंद्र प्रताप तिवारी
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