दुनिया भर में हर साल 100 लाख लोग ट्यूबरक्लोसिस (TB) का शिकार होते हैं। हर साल 10 लाख से अधिक लोग इससे मरते हैं। किसी एक इन्फेक्शन से मरने वाले लोगों में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा है। भारत टीबी के मरीज़ों के मामले में दुनिया में प्रमुख देश है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हमारे देश में दुनिया के 25% टीबी मरीज़ पाए जाते हैं।
विश्व टीबी दिवस के अवसर पर अपने एक लेख में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने बताया, “भारत में 2015 से टीबी के मामलों में 21 प्रतिशत की कमी आई है। यह ग्लोबल रेट से लगभग दोगुनी है।” इसके साथ ही उन्होंने बताया कि टीबी से होने वाली मौतों में भी 25 प्रतिशत की कमी आई है। अनुमानित टीबी मामलों में इलाज का कवरेज बढ़कर 80% हो गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 19% ज़्यादा है।
यानि सरकारी आंकड़ों में देश बेहतर प्रदर्शन करते हुए दिखाई देता है। ग्राउंड रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों से टीबी के मसले पर कई ग्राउंड रिपोर्ट की है। ऐसे में यह देखना ज़रूरी है कि इन सरकारी आंकड़ों के बरक्स ज़मीन पर क्या-क्या बदला है?

विदिशा में क्या बदला?
ग्राउंड रिपोर्ट ने विदिशा के गंजबासौदा में पत्थर की खदान में काम करने वाले मज़दूरों से लेकर झाबुआ के भील आदिवासियों तक को कवर किया है। ऐसी ही एक कहानी में गंज बासौदा के कुचौली के गेंदालाल की है। गेंदालाल अब भी अपने 6×6 फीट के कच्चे मकान में रहते हैं। वह कहते हैं कि बीते 2 साल में उनके जीवन में कोई बदलाव नहीं आया है। उनकी तबियत अब भी बिगड़ती रहती है। जब उन्हें कमज़ोरी और बुखार के कारण चलने में दिक्कत होती है तो वह अपने बेटे के सहारे सरकारी अस्पताल चले जाते हैं। यहां से उन्हें वही ‘लाल पत्ते वाली दवाइयां’ मिल जाती हैं।
गेंदालाल के घर में अब भी आनाज सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत आता है। वह अमूमन रोटी, दाल और कभी-कभी कोई हरी सब्ज़ी खा लेते हैं।
टीबी के मरीज़ों के लिए पोषण युक्त आहार हेतु 2018 में निक्षय पोषण योजना शुरू की गई थी। इसके तहत हर मरीज़ को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रासफर के ज़रिए प्रति माह 1000 रूपए मिलने थे। मगर गेंदालाल ने कभी इसके लिए पंजीयन नहीं करवाया ना ही उनके पास इस योजना का लाभ लेने के लिए कोई बैंक खाता है।
प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। एनडीटीवी द्वारा प्रकाशित एक खबर के अनुसार भोपाल में ही कई मरीज़ों को 5 महीने से निक्षय पोषण योजना का लाभ नहीं मिला है। राष्ट्रिय राजधानी से 60 किमी से भी कम दूरी पर स्थित बल्लभगढ़ में इस योजना पर 2 सालों तक किए गए शोध के अनुसार, केवल 22.3% मरीज़ ही ऐसे थे जिनको इलाज के दौरान पूरी राशि मिली थी।
विदिशा में हमने जिन मरीज़ों से बात की थी वो सभी पास स्थित पत्थर खदान जाते थे। प्रसून नामक सामाजिक संस्था में काम करने वाले प्रमोद पटेरिया कहते हैं, “अब जो नई पीढ़ी है वो खदानों में काम करने नहीं जाती मगर जो पुराने लोग हैं उन्हें अब भी सिलिकोसिस के बजाय टीबी का इलाज ही मिल रहा है।” यानि इस दौरान केवल यह बदला है कि नई पीढ़ी उस पेशे की ओर नहीं जाएगी जिसके चलते गेंदालाल का परिवार लगभग ख़त्म हो गया।

झाबुआ में क्या बदला?
गंजबासौदा से 447 किमी दूर स्थित झाबुआ में भी यह बिमारी भयावह है। जिला अस्पताल से मिले आंकड़ों के अनुसार यहां 2020 से 2023 के बीच टीबी के मरीज़ बढ़े हैं। 2020 में जिले में 2094 टीबी के मरीज़ थे जबकि 2023 तक यह बढ़कर 2846 हो गए। हालांकि जिले के टीबी अधिकारी डॉ फैसल पटेल कहते हैं कि कुछ सालों में प्रशासन ज्यादा लोगो के पास पहुंच पाया है और जिले में टेस्टिंग बढ़ी है जिसके चलते आंकड़ों में बढ़ोत्तरी दिखाई देती है।
2024 में जब हमने यहां के मरीज़ों से बात की थी तो उन्होंने दवा की कमी की शिकायत की थी। आदिवासियों को बेहतर स्वास्थ्य लाभ के लिए जागरूक करने वाले मिकला दित्ता कटारा कहते हैं, “बीते एक-डेढ़ साल से यहां दवा की लगातार कमी बनी हुई है। पूछने पर डॉक्टर कहते हैं कि ऊपर से ही दवा की सप्लाई में कमी आई है।”
झाबुआ के स्वास्थ्य विभाग के साथ काम करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, “सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हर महीने दवाइयां आती हैं। अगर एक महीने किसी केंद्र में 10 मरीज़ हैं तो उनके लिए ही बस दवा आएंगी। दवा आते तक अगर यह संख्या बढ़कर 15 हो गई तो 5 लोगों को दवा नहीं मिलेगी।” वह कहते हैं कि इसी कारण दवाओं की कमी की बात आती रहती है।
हालांकि बीते 10 सालों से यहां टीबी पर काम कर रहे यह कार्यकर्ता यह भी कहते हैं कि इससे किसी का इलाज नहीं रुकता।
मगर स्वास्थ्य के क्षेत्र में ही काम करने वाले जॉन मंडोरिया मानते हैं कि जिले में बिमारी की जल्दी पहचान (Early Diagnosis) अब भी नहीं हो पा रहा है। “लोगों में जागरूकता की बहुत कमी है। शुरुआत में वो बिमारी को सर्दी-जुखाम समझते हैं और दवा नहीं लेते बाद में जब मुह से खून आता है तब डॉक्टर के पास जाते हैं।” इसके अलावा वह कहते हैं कि बड़वा (तांत्रिक के लिए स्थानीय शब्द) पर लोगों ने विश्वास करना अब भी कम नहीं किया है। “लोग उनकी दी हुई माला पहन लेते हैं और सोचते हैं कि टीबी ठीक हो जाएगा।”

देश में कितना बदलाव हुआ?
भारत सरकार की टीबी रिपोर्ट 2024 के अनुसार भारत में नए टीबी मरीज़ों की संख्या में 16% तक कमी आई है। वहीं इससे होने वाली मृत्यु में 18% तक कमी आई है। हालांकि भारत 2025 तक टीबी मुक्त होने की अपनी डेडलाइन मिस कर चुका है। जनवरी से अक्टूबर 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार देश में 22 लाख से भी ज्यादा टीबी केस दर्ज किए गए।
इस दौरान उत्तरप्रदेश में सबसे ज्यादा 6,04,726 केस दर्ज किए गए हैं। जबकि मध्य प्रदेश 1,47,443 केस के साथ देश में पांचवे स्थान पर है।
इसके अलावा भारत खुद अपने बनाए नेशनल स्ट्रेटिजिक प्लान (NSP) के कई टार्गेट मिस कर चुका है। एनएसपी के अनुसार 2015 में प्रति एक लाख जनसंख्या में 217 लोग टीबी के शिकार थे जिसे 2023 तक 77 व्यक्ति (प्रति लाख जनसंख्या) तक लाना था। मगर 2023 में भी 199 व्यक्ति (प्रति लाख जनसंख्या) टीबी का शिकार हुए। वहीं 2015 में इससे मरने वाले लोगों का प्रतिशत 32 था। इसे 2023 तक 6% तक लाना था जो 2023 में घटकर 23% तक ही पहुंचा।

इसके अलावा ड्रैग रेजिस्टेंट टीबी के मरीज़ों के इलाज में सफल होने का लक्ष्य 73% रखा गया था जो 66% तक ही पहुंचा। यही नहीं देश में 90% मरीज़ों के बजाए 70% मरीज़ों को ही आर्थिक सहायता मिली है।
वहीं मध्य प्रदेश ने भी 2019 से 2025 तक के लिए एक स्ट्रेटिजिक मैनेजमेंट प्लान बनाया था। इसके तहत 2025 तक प्रदेश में टीबी मरीजों की संख्या 1.58 लाख (2018) से घटाकर 1.3 लाख करनी थी। मगर मगर दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 1.71 लाख मरीज़ नोटिफाई हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में हर दिन 13 लोगों की मौत इस बिमारी से हो रही है।
स्थानीय कार्यकर्ता यह मानते हैं कि प्रदेश में टीबी की पहचान के लिए प्रयास बेहतर हुए हैं। मगर वह यह भी कहते हैं कि सामाजिक जागरूकता के लिए सरकारी प्रयास कम किए गए हैं। सरकार भले ही कहे कि देश में टीबी की दवाइयों की कमी नहीं है मगर ज़मीनी हकीकत इससे उलट है। कुल मिलाकर बात ये है कि सरकारी आंकड़ों के बरक्स ज़मीन पर अब भी बहुत सी खामियां हैं। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वो इस पर ध्यान दे।
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
यह भी पढ़ें
दाल रोटी के सहारे टीबी से लड़ रहे विदिशा में कुचोली गांव के आदिवासी
दवाओं की कमी, कुपोषण और ग़रीबी, क्या 2025 तक भारत हो पाएगा टीबी मुक्त?
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।








