म्यां…डेडा
डागिन ठड़वा, गोनेज डोंगरा डी डी डी…
डोगे राजा…उहूं उहूं
डोगे रानी…उहूं उहूं
यह कोरकू भाषा का एक बाल गीत है जिसे खंडवा से लगभग 60 किमी दूर डाभिया स्थित आंगनवाड़ी केंद्र में सुगंधी और सीमा प्रकाश बच्चों के साथ गा रही हैं। यह गीत जंगल में रहने वाले एक मेंढक के बारे में है। आंगनवाड़ी में इन बच्चों को कुछ ही देर में खाना परोसा जाएगा। उससे पहले भाषा ज्ञान और मनोरंजन के लिए यह गतिविधि करवाई जा रही है। मगर कई बच्चे इस गाने को न समझ पा रहे हैं और ना ही दोहरा रहे हैं। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने बताया कि इन बच्चों को कोरकू नहीं आती।
जिले के खालवा ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली इन आंगनवाड़ीयों में ज़्यादातर बच्चे कोरकू आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। इनकी मातृभाषा कोरकू है। मगर आंगनवाड़ी की दीवारों पर सब्ज़ियों, फलों और जानवरों के नाम हिंदी में लिखे हुए हैं। यहां अंग्रेज़ी और हिंदी वर्णमाला के अक्षर हैं मगर कोरकू भाषा का कोई भी शब्द नहीं लिखा। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कहती हैं कि वह हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा में ही पढ़ाती और बात करती हैं ताकि बच्चों की भाषा का विकास हो सके।
सीमा प्रकाश खंडवा में स्थित सामाजिक संस्था स्पंदन समाज सेवा समिति की सीईओ हैं। उनकी संस्था मूल रूप से कोरकू बच्चों के पोषण को लेकर काम करती है। वह कहती हैं कि कुपोषण के लिए लोगों को जागरूक करने के लिए ज़रूरी है कि स्थानीय भाषा में ही बात की जाए। इसी विचार के साथ उन्होंने कुपोषण और भाषा दोनों पर काम करना शुरू किया। इससे उनका काम आसान हुआ, समुदाय में संस्था के कार्यकर्ताओं के प्रति विश्वास जगा और अगली पीढ़ी के लिए भाषा का दस्तावेजीकरण भी हो सका।

शुरूआती संवाद में गई दिक्कतें
सीमा प्रकाश ने 2003 में पोषण को लेकर खंडवा और आस-पास के जिलों में काम करना शुरू किया। उनका काम निमाड़ क्षेत्र जिसमें वर्तमान खंडवा, खरगोन और बड़वानी जिले शामिल हैं, में कुपोषण को दूर करने के लिए नवाचार और जन जागरण जैसे प्रयास करना था। मगर यहां के कोरकू आदिवासियों के साथ संवाद करना उनके लिए सबसे मुश्किल काम था। प्रकाश कहती हैं, “हमारे लिए सबसे बड़ी दिक्कत ये थी कि ग्रामीणों को हिंदी नहीं आती थी और हमें कोरकू नहीं आती थी।”
प्रकाश कहती हैं कि कुपोषण दूर करने के लिए ज़रूरी था कि मां और बच्चा पुनर्वास केंद्र में जाए और घर में रहते हुए भी पोषण युक्त आहार ले। इसके अलावा स्थानीय आशा कार्यकर्ता और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में वह नियमित जांच करवाए। मगर इस बात को समझाने के लिए लंबे संवाद की ज़रूरत थी। “कुपोषित बच्चों की पहचान और उनको इससे बाहर निकालने के लिए बच्चे का वज़न और उसे खिलाई जाने वाली चीजों की जानकारी ज़रूरी थी।” मगर यह ग्रामीण वज़न करने के लिए बच्चे को देना तो दूर उनसे बात करना भी पसंद नहीं करते थे।
स्पंदन समाज सेवा समिति में प्रारंभिक दिनों से ही ज़मीनी कार्यकर्ता के रूप में जुड़ीं सुगंधी बताती हैं, “शुरू में जब मैं लोगों के घर जाती थी तो ‘बाईयां’ (बच्चों की मां) मुझे देख कर ही भाग जाती थीं।”
ऐसे में स्थानीय लोगों के साथ रिश्ते बनाना और फिर बदलाव के लिए प्रेरित करना बेहद कठिन दिखाई देता था। मगर जल्द ही सुगंधी समेत इस स्वयंसेवी संस्था को समझ आया कि कोरकू लोगों से उनकी भाषा में बात करने से ही इस समस्या का हल निकल सकेगा।

संकटग्रस्त भाषा और पोषण
कोरकू एक मुंडा भाषा है जो मुख्यतः मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बोली जाती है। यूनाईटेड नेशंस एजुकेशनल साइंटिफिक एंड कल्चरल आर्गेनाईजेशन (UNESCO) ने एटलस ऑफ़ द वर्ल्ड्स लैंग्वेजेस इन डेंजर, 2010 में इस भाषा को वल्नरेबल श्रेणी में रखा है। हालांकि 1971 से 2011 तक के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में यह भाषा बोलने वाले कुल लोगों की संख्या बढ़ी है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में इसे बोलने वाले 7,27,133 लोग थे। वहीं मध्य प्रदेश में 4,70,386 लोग कोरकू बोलते थे।

सुगंधी खुद कोरकू समुदाय से नहीं हैं। मगर संवाद के लिए उन्होंने अपने आस-पास के माहौल से इस भाषा को सीखा। वह कहती हैं कि जब वो हिंदी में बात करती थीं तो स्थानीय लोग उनसे जुड़ाव नहीं महसूस करते थे। मगर भाषा बदलने पर वह अपनी बात प्रभावी ढंग से कह पातीं और लोगों को बेहतर तरीके से सरकारी सुविधाओं के बारे में समझा पाती हैं।
प्रकाश बताती हैं, “हमें परिजनों को बताना था कि उनका बच्चा कितना गंभीर है और इसके लिए उनको क्या-क्या करना है? अगर भाषा की बाधा बनी रहती तो यह करना मुश्किल रहता।”
शुरुआत में प्रकाश ने कोरकू भाषा का प्रयोग केवल अपनी सुविधा और काम आसान करने के लिए किया। मगर बाद में उन्होंने देखा कि इस समुदाय के बच्चे आंगनवाड़ी आकर चुप रहते और असहज महसूस करते हैं। वह मानती हैं, “बच्चों के पसंद की चीज़ अगर आंगनवाड़ी में होगी तभी उसे वहां अच्छा लगेगा।” इसलिए उन्होंने इसी भाषा में गीत और गतिविधियां करवाना शुरू किया। इस तरह पोषण को लेकर शुरू हुआ कार्य इस भाषा के दस्तावेजीकरण तक जा पहुंचा।

प्रशासनिक और संस्था की पहल
सीमा प्रकाश और उनके संस्थान ने कोरकू भाषा में मॉड्यूल और शब्दकोष विकसित करना शुरू किया। प्रकाश बताती हैं कि उन्होंने इसके लिए गांव के बुजुर्गों और अपने उन कार्यकर्ताओं का सहारा लिया जिन्हें कोरकू आती थी। “हमने बुजुर्गों से पेड़ों, जानवरों और आम बोलचाल के शब्दों के किए कोरकू और हिंदी भाषा का डाटा तैयार किया। इसे फिर व्यवस्थित करके दस्तावेज का रूप दिया।” वह कहती हैं, “हमने यह किया ताकि आने वाली पीढ़ी तक उनकी भाषा और संस्कृति पहुंच सके।”
यह काम उन्होंने अपने निर्धारित काम से आगे जाकर किया हालांकि इससे उन्हें मुख्य काम में सहायता ही मिली। उनके काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आंगनवाड़ी को बेहतर बनाना था। सीमा कहती हैं, “हर बच्चे का अधिकार है कि वह शुरूआती शिक्षा अपनी मातृभाषा में ग्रहण करे।” इसलिए स्पंदन ने इनके रंग-रोगन के अलावा कोरकू भाषा के पोस्टर भी वितरित किए।
इसके अलावा स्पंदन द्वारा ‘कोरकू शब्द ज्ञान’ नाम से शब्दकोष भी विकसित किया गया है। इसके अलावा सीमा प्रकाश द्वारा कोरकू समुदाय पर आधारित ‘lest we forget them’ (कहीं हम उन्हें भूल न जाएं) शीर्षक से किताब भी लिखी गई है।
प्रकाश हमसे बात करते हुए प्रशासनिक कार्यविधि और लोगों के बीच के संबंध की एक कमी को उजागर करती हैं। वह कहती हैं, “यहां अमले को भी कोरकू नहीं आती।” हालांकि महिला एवं बाल विकास विभाग खंडवा में जिला परियोजना अधिकारी रत्ना शर्मा कहती हैं, “रोशनी और खालवा में कोरकू बोलने वाली महिलाओं को ही आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और आशा कार्यकर्ता के रूप में नियुक्त किया गया है।” वह कहती हैं कि इस नियुक्ति का उद्देश्य भाषाई बाधा को दूर करना है।
हालांकि खालवा ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले लंगोटी में पदस्थ करिश्मा कनोजे को कोरकू नहीं आती। वहीं डाभिया में कार्यरत आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका कोरकू भाषा जानती हैं मगर वह भी बच्चों से हिंदी में ही बात करती हैं।

ग्राउंड रिपोर्ट से बात करते हुए शर्मा ने बताया कि जिला प्रशासन द्वारा ‘सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0’ के तहत कोरकू भाषा में छोटी फ़िल्में और गीत बनवाए जा रहे हैं जिनको सक्षम आंगनवाड़ीयों में दिखाकर परिजनों को जागरूक किया जाएगा।
मगर फरवरी 2026 में जब हमने खालवा की कुछ आंगनवाड़ियों का दौरा किया तो सभी में केवल हिंदी-अंग्रेज़ी वर्णमाला और पोस्टर दिखाई दिए। ज़्यादातर में यह भी ख़स्ताहाल हैं ऐसे में कोरकू भाषा के पोस्टर की उम्मीद करना एक बड़ी चीज़ लगती है। ज़्यादातर आंगनवाड़ियों में इस कहानी की शुरुआत में जो पंक्तियां लिखी हैं उनको दोहराने में भी बच्चे हिचकिचाते हैं।
हालांकि यह बदलाव ज़रूर आया है कि अब सुगंधी के साथ लोग सहज हो चुके हैं। वह न सिर्फ उनके पास रुकते हैं बल्कि बच्चों को पोषण केंद्र और अस्पताल ले जाने के मशवरे को मानते भी हैं। मगर वह अब भी मानती हैं कि स्थानीय भाषा को लेकर और प्रयास किया जाना ज़रूरी है।
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