मध्य प्रदेश के जबलपुर में स्थित बरगी बांध में क्रूज़ डूबने से अब तक 9 लोगों की मौत हो चुकी है। 3 बच्चों समेत कुल 4 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव शुक्रवार को पीड़ितों से मिलने पहुंचे। उन्होंने घटना की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं।
सीएम ने कहा कि दुर्घटना में लापरवाही करने वाले दोषियों के विरूद्ध सख्त कार्रवाई की गई है। क्रूज पायलट महेश पटेल, हेल्पर छोटेलाल गोंड और टिकट काउंटर प्रभारी बृजेन्द्र की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गई हैं। साथ ही होटल मैकल रिसार्ट और बोट क्लब के मैनेजर सुनील मरावी को निलंबित कर दिया गया है। वहीं रीजनल मैनेजर संजय मल्होत्र को मुख्यालय अटैच कर विभागीय जांच शुरू कर दी गई है।
इस घटना की मीडिया कवरेज में यह दावा किया गया कि क्रूज़ में क्षमता से अधिक लोग सवार थे। इसके अलावा सवारियों को सुरक्षा जैकेट न पहनाने और अन्य लापरवाही की बात भी कही गई। मगर इस घटना से पहले भी प्रदेश में असुरक्षित नांव संचालन की ख़बरें प्रकाशित होती रही हैं तब सवाल यही है कि क्या इस घटना के बाद प्रदेश भर में ऐसी गतिविधियां बंद हो जाएंगी?

राजगढ़: रोज़ाना जान दांव पर डालते लोग
बरगी बांध से 476 किमी दूर राजगढ़ जिले में मोहनपुरा डैम के डूब क्षेत्र में आने वाले लगभग 40–50 गांवों के ग्रामीण रोज़ाना नाव से सफर करते हैं। यह सफर बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के होता है। लोग अपनी जान जोखिम में डालकर पानी पार करते हैं।
ऐसा नहीं है कि उन्हें डर नहीं लगता। परिवार की चिंता भी होती है। इसके बावजूद वे यह जोखिम उठाते हैं। उनके पास दूसरा रास्ता मौजूद है। लेकिन वह रास्ता लंबा है और समय भी ज़्यादा लगता है। देर रात आने-जाने में असुरक्षा का डर भी बना रहता है।
यह स्थिति राजगढ़ ब्लॉक के उद्पुरिया और रायपुरिया गांव की हैं। यहां के ग्रामीणों ने समय और पैसे बचाने के लिए डैम के डूब क्षेत्र में खुद ही एक वैकल्पिक रास्ता बना लिया है। इसी रास्ते से सैकड़ों लोग रोज़ नाव से आवाजाही करते हैं।
बांध के बाद डूबा रास्ता
ग्रामीण बताते हैं कि पहले करीब 40–50 गांवों को शहर से जोड़ने वाला एक सीधा रास्ता था। इसी रास्ते से वे कम समय और कम खर्च में ब्यावरा पहुंच जाते थे। मगर वर्ष 2017 में डैम में पानी भरने के बाद वह रास्ता और उस पर बना पुल डूब गया। इसके बाद लोगों ने नाव का सहारा लेना शुरू किया। वे दोपहिया वाहन के साथ नदी पार करते हैं।
नाव चलाने वालों का कहना है कि वे यह काम शौक से नहीं करते। उन्हें दूसरों की जान खतरे में डालने की इच्छा नहीं है। उनका कहना है कि अगर पुलिया और सड़क दोबारा बना दी जाए, तो वे तुरंत नाव चलाना बंद कर देंगे और दूसरे काम करने लगेंगे।
ग्राउंड रिपोर्ट की टीम ने इस मामले में मोहनपुरा परियोजना के प्रबंधक अशोक दीक्षित से बात की। उन्होंने कहा कि
“जिन गांवों से नाव चल रही है, वे पहले ही डूब क्षेत्र में दर्ज हैं। ग्रामीणों को मुआवजा भी दिया जा चुका है।”
उनका कहना है कि ग्रामीण अब गांव के ऊपरी हिस्सों में रह रहे हैं और वहीं उन्होंने मकान बनाए हैं। जिस पुल की बात की जा रही है, वह 2017 में ही डूब चुका है। आज अगर वहां पुल होता भी, तो उस पर लगभग 30 फीट पानी रहता।

एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारी डालने का चक्र
दीक्षित के अनुसार रिकॉर्ड में वहां कोई आबादी दर्ज नहीं है, जिसके लिए पुल बनाया जाए। विभाग की ओर से ऐसा कोई प्रस्ताव भी लंबित नहीं है। उन्होंने कहा कि ब्यावरा जाने के लिए डैम की डाउनस्ट्रीम में बना रपटा मौजूद है, जहां से लोग डायवर्ट होकर जा सकते हैं।
डैम के रिज़रवॉयर में नाव संचालन जैसी गतिविधियों को उन्होंने कानून-व्यवस्था का मामला बताया। उनके अनुसार इसकी जिम्मेदारी संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की है, परियोजना की नहीं।
वहीं पीडब्ल्यूडी (PWD) विभाग के एसडीओ (SDO) प्रेमनारायण धनवाल कहते हैं कि डूबी हुई सड़क और पुलिया उनके विभाग की थी। उनके अनुसार यह डब्ल्यूआरडी (WRD) विभाग की परियोजना के कारण डूबी है। ऐसे में नया ब्रिज बनाना उसी विभाग की जिम्मेदारी है। पीडब्ल्यूडी को कोई भुगतान नहीं किया गया है।
वहीं ग्रामीणों का कहना है कि उनकी आधी ज़मीन डूब गई है और आधी बची हुई है। इसी वजह से वे अब भी वहीं रह रहे हैं। उन्हें यह अंदाज़ा नहीं था कि डैम में इतना पानी भरेगा कि शहर से जोड़ने वाला रास्ता पूरी तरह बंद हो जाएगा।
उस समय लोग मुआवजे और पुनर्वास की चिंता में थे। सड़क और पुल के भविष्य पर ध्यान नहीं गया। अब पानी की सहूलियत उनके लिए परेशानी बन गई है।
ग्रामीण बताते हैं कि यदि वे नांव का इस्तेमाल न करें, तो उन्हें ब्यावरा जाने के लिए 60 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है। रोज़ की 300 रुपये की मज़दूरी में से 100 से 200 रुपये पेट्रोल में खर्च हो जाते हैं। ऐसे में नांव उनके लिए सबसे सस्ता विकल्प बचता है।

दो ही विकल्प; जान का खतरा और असुरक्षा
डैम निर्माण के समय ग्रामीणों और विभागीय अधिकारियों को यह अंदाज़ा नहीं था कि आसपास के गांवों को जोड़ने वाली सड़कें और पुल भी डूब जाएंगी। इसका असर केवल डूब क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। आसपास के गांवों का रोजगार भी प्रभावित हुआ।
इसी वजह से न तो उस समय ग्रामीणों ने आवाज़ उठाई और न ही पीडब्ल्यूडी ने कम जलस्तर वाले इलाके में वैकल्पिक सड़क का प्रस्ताव तैयार किया। नतीजा यह है कि आज ग्रामीणों के सामने दो ही विकल्प हैं। या तो वे लंबा सफर करें, या हर दिन जान जोखिम में डालें।
इस पूरे मामले पर राजगढ़ की एसडीएम निधि भारद्वाज का कहना है कि प्रकरण उनके संज्ञान में है। सभी संबंधित विभागों के साथ मिलकर स्थायी समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है।
मोहनपुरा डैम के डूब क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीण आज विकास और व्यवस्था के बीच फंसे हुए हैं। रिकॉर्ड में ये गांव डूब क्षेत्र में दर्ज हैं और मुआवजा ले चुके हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लोग आज भी रोज़गार और इलाज के लिए नांव से सफर करने को मजबूर हैं।
प्रदेश में कितनी सुरक्षित नाव सवारी?
जबलपुर में हुई घटना के बाद मोहनपुरा बांध पर फिलहाल नाव का संचालन बंद है। उदयपुरिया गांव के नाव चालक बलराम रुहेला ने बताया कि हवा तेज़ चलने के कारण फिलहाल नाव का संचालन बंद है।
डैम के कैचमेंट एरिया में चलती हुई नाव के वीडियो मीडिया वा सोशल मीडिया के माध्यम से संज्ञान में आने के बाद अधिकारियों द्वारा लाइफ जैकेट और सुरक्षा के इंतज़ाम करने के लिए कहा गया है।

प्रदेश में नाव पलटने से हुआ यह पहला हादसा नहीं है। घटना से लगभग 3 हफ्ते पहले ओंकारेश्वर में पत्थर से टकराने के बाद एक नाव 10 सवारियों सहित डूबने लगी। हालांकि स्थानीय नाविकों, तैराकों और होम गार्ड्स की मदद से बड़ा हादसा टल गया। मगर यहां बीते साल कुल 24 लोगों की डूबने से जान जा चुकी है।
इसी तरह बीते मार्च में रायसेन के रिछावर घाट में 16 लोग नाव पलटने के बाद डूबने लगे थे। इन्हें भी स्थानीय लोगों ने बचा लिया।
कुल मिलाकर बात ये है कि मध्य प्रदेश में इस तरह का यह पहला हादसा नहीं है। फिर भी प्रदेश में सुरक्षा की कड़ी निगरानी नदारद है। हालांकि हादसे के बाद पर्यटन मंत्री धर्मेंद्र लोधी ने कहा है कि एमपी में क्रूज संचालन पर रोक लगा दी गई है। क्रूज फिटनेस और मानकों की जांच के बाद ही संचालन दोबारा शुरू होगा।
दुर्घटना में जान गंवाने वालों के निकटतम परिजन को 2-2 लाख रूपए और राज्य सरकार ने 4-4 लाख रुपए आर्थिक सहायता देने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री ने अपील करते हुए कहा कि हम सभी को मौसम विभाग द्वारा समय-समय दी जाने वाली सूचनाओं और चेतावनियों को पूरी गंभीरता के साथ अमल में लाना चाहिए।
मगर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भविष्य में ऐसी दुर्घटना की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए प्रशासन को इन सूचनाओं और चेतावनियों को अमल में लाना पड़ेगा। साथ ही यह प्रशासन की ज़िम्मेदारी होगी कि वह कड़े नियम बनाकर उनका सख्ती से पालन करवाए।
नोट– इस खबर के लिए रिपोर्टिंग जनवरी माह में की गई है।
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