Read in English | मार्च 2019 में राधेश्याम यदुवंशी ने मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम ज़िले के बासनिया कीर गाँव में अपने खेत पर सोलर पंप लगवाया। उन्हें उम्मीद थी कि अब मूँग और गेहूँ की सिंचाई के लिए बिजली का एक भरोसेमंद साधन मिल जाएगा।
यदुवंशी ने पीएम-कुसुम के कंपोनेंट बी, जो राज्य सरकार की योजना के साथ संचालित है, के तहत 5 हॉर्सपावर (HP) का डायनामेक कंपनी का सोलर पंप लगवाया।
पंप बिना किसी बड़ी दिक्कत के चलता रहा और उन्हें वैसी ही भरोसेमंद सिंचाई मिली जिसकी उन्हें आस थी। इस अनुभव से उत्साहित होकर उन्होंने सितंबर 2020 में अपने भाई के खेत पर एक और पंप लगवाया। यह 7 HP का था और शक्ति पंप्स द्वारा इंस्टॉल किया गया।
लेकिन समय के साथ इन पंपों में बार-बार समस्याएँ आईं। चोरी हुई, पैनल क्षतिग्रस्त हुए और कंट्रोलर खराब हो गया। मरम्मत और मुआवज़े के लिए उन्हें कंपनियों और सरकारी अधिकारियों से लंबी लड़ाई भी लड़नी पड़ी।
परेशानी की शुरुआत मई 2022 में हुई, मूँग की कटाई से ठीक पहले। यदुवंशी खाना खाने घर गए थे, तभी सोलर पैनलों के पास अचानक रोशनी सी दिखाई दी और खेत पर मौजूद मज़दूरों की नज़र उस पर पड़ी। उन्हें लगा कि यदुवंशी लौट आए हैं। जब उन्होंने फ़ोन किया, तब पता चला कि चोर पैनल चुराने की कोशिश कर रहे थे।
मज़दूर पैनलों की ओर दौड़े और यदुवंशी भी उनके साथ हो लिए। चोरों ने उन्हें देखा तो भाग निकले, लेकिन कई खोले हुए पैनल ले जाने में कामयाब रहे। एक पैनल भागते समय गिरकर टूट गया। यदुवंशी ने थाने में शिकायत दर्ज कराई और उसकी एक प्रति राज्य के ऊर्जा विभाग को भी दी। एक अधिकारी ने मामले को आगे बढ़ाने में उनकी मदद की और आख़िरकार कंपनी ने पैनल बदल दिए।
हमारी रिपोर्टिंग के दौरान यदुवंशी ने बताया कि उनका दूसरा सिस्टम 2025 में तब ख़राब हुआ, जब पैनलों के पास आकाशीय बिजली गिरी। पैनलों के सेल पर निशान पड़ गए और कंट्रोलर चलना बंद हो गया। कंपनी ने कंट्रोलर बदल दिया, लेकिन अधिकारियों के दबाव डालने के बाद। फिर फ़रवरी 2026 में चोर पैनलों से जुड़ी केबल चुरा ले गए।

अब बार-बार हुई चोरी और नुकसान की वजह से दोनों सोलर सिस्टम लगभग बेकार पड़े हैं। पुराना डायनामेक सिस्टम क़रीब एक साल से बंद है। यदुवंशी ने ऊर्जा विभाग में शिकायत की, ज़िला प्रशासन को आवेदन दिए और जनसुनवाई में भी यह मुद्दा उठाया। उन्होंने एक टोल-फ्री नंबर पर भी फ़ोन करने की कोशिश की, लेकिन उनके मुताबिक़ वह लाइन अब चालू ही नहीं है।
जब उन्होंने ये सिस्टम लगवाए थे, तब उन्होंने चोरी को कोई बड़ा ख़तरा नहीं माना था, क्योंकि उन्हें बताया गया था कि पंपों में ऐसी तकनीक है जिससे चोरों का पता लगाया जा सकता है। लेकिन आज उनके दोनों सोलर पंप बेकार पड़े हैं। खेतों की सिंचाई जारी रखने के लिए यदुवंशी ने ट्रांसफ़ॉर्मर लगवाया और फिर से ग्रिड की बिजली पर निर्भर हो गए।
यदुवंशी का मामला शायद एक अपवाद हो, जिसमें दोनों सोलर सिस्टम चोरी और प्राकृतिक नुकसान, दोनों का शिकार हुए। लेकिन यह रखरखाव, तकनीकी मदद, चोरी और मुआवज़े से जुड़ी बड़ी समस्याओं को उजागर करता है।
यदुवंशी जैसे किसानों से इस योजना ने वादा किया था कि उन्हें अनियमित बिजली आपूर्ति पर निर्भर हुए बिना सिंचाई मिलेगी। सात साल बाद उनका अनुभव कहीं ज़्यादा उलझा हुआ रहा है।

चोरी और सुरक्षा के उपाय
आईआईटी गांधीनगर के संकाय सदस्य प्रहर्ष पटेल ने पानी, ऊर्जा, भोजन और कार्बन के आपसी संबंधों पर शोध किया है। गुजरात में उनके फ़ील्डवर्क के दौरान 22 जगहों पर किसानों, नीति-निर्माताओं और तकनीकी कर्मचारियों से बातचीत की गई।
दक्षिण गुजरात के एक गाँव में एक किसान की प्रतिक्रिया को याद करते हुए पटेल ने बताया: “आप यहाँ क्यों आए हैं? यह तो बस एक छत है। इसमें सोलर जैसा कुछ है ही नहीं, क्योंकि सारी केबल चोरी हो चुकी हैं।” चोरों ने पैनल नहीं, केबल चुराई थीं। लेकिन केबल के बिना पैनल किसी काम के नहीं।
पटेल ने कहा, “तुरंत पैसे पाने के लिए तांबे का स्क्रैप बाज़ार सक्रिय है, लेकिन सोलर पैनलों के लिए ऐसा कोई बाज़ार नहीं है।”
हमारी रिपोर्टिंग में हमें मध्य प्रदेश में चोरी के कई मामले मिले। सीहोर ज़िले के कोठरी गाँव के किसान सुधीर कासनिया के खेत में पैनल क्षतिग्रस्त हो गए थे। उन्हें मुआवज़ा नहीं मिला, इसलिए उन्होंने फ़सल का मौसम ख़त्म होने के बाद पैनल खोलकर घर ले जाने का फ़ैसला किया।

जून 2026 में विदिशा के किसान जगत सिंह दांगी ने 90% सब्सिडी की मदद से 5 HP का सोलर पंप लगवाया। लेकिन क़रीब दो हफ़्ते के भीतर ही चोर लगभग 150 फ़ीट केबल चुरा ले गए। दांगी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और कंपनी से भी संपर्क किया। उन्हें बताया गया कि सिस्टम का बीमा है और नुकसान की भरपाई की जाएगी, लेकिन दो महीने से ज़्यादा बीत जाने के बाद भी वे जवाब का इंतज़ार कर रहे थे। अब वे अतिरिक्त सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे लगवाने की योजना बना रहे हैं।
योजना के तहत सोलर पंपों का पाँच साल का बीमा होता है, जिसमें चोरी और प्राकृतिक आपदाओं से हुआ नुकसान, दोनों शामिल हैं।
शक्ति पंप्स के एरिया सेल्स मैनेजर सचिन चौहान ने बताया कि कंपनी के पंप इस्तेमाल करने वाले किसान टोल-फ्री नंबर के ज़रिए बीमा शिकायत दर्ज करा सकते हैं। चोरी के दावों के लिए उनसे तस्वीरें माँगी जाती हैं या वीडियो कॉल पर साइट दिखाने को कहा जाता है, और फिर शिकायत व अन्य दस्तावेज़ जमा करने होते हैं। इसके बाद कंपनी बीमा दावे की प्रक्रिया शुरू करती है। चौहान के मुताबिक़ दावे आम तौर पर सात दिनों के भीतर दाखिल कर देने चाहिए, क्योंकि देरी होने पर दावा ख़ारिज होने की संभावना बढ़ जाती है।
चौहान ने यह भी कहा कि बीमा के अलावा कंपनियाँ सोलर पैनल के ढाँचे पर चोरी-रोधी नट-बोल्ट जैसे भौतिक उपाय भी अपनाती हैं। उन्होंने बताया कि फ़ास्टनर वाली इस बनावट में दो-तीन पैनल एक साथ उठाने पड़ सकते हैं, जिससे चोरी करना मुश्किल हो जाता है।
इन सुरक्षा उपायों के बावजूद, या शायद उन्हीं की वजह से, चौहान के अनुसार सबसे ज़्यादा चोरी केबल की होती है, हालाँकि पंप मोटर, ड्राइव और कंट्रोलर भी निशाना बन सकते हैं। लेकिन उनका कहना है कि चोरी के मामले व्यापक नहीं हैं, केवल 2-3% पंप मालिक ही चोरी की शिकायत करते हैं।
मध्य प्रदेश ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (MPUVNL) से मिले सूचना का अधिकार (RTI) के जवाब में 2019 से अब तक योजना के तहत किसानों के खेतों में लगे सोलर पंपों से जुड़ी चोरी की 41 शिकायतें दर्ज हैं। सूची में शामिल ज़्यादातर ज़िलों से चोरी की कोई शिकायत नहीं आई, लेकिन बालाघाट में 22, मुरैना में पाँच और सिवनी में तीन शिकायतें दर्ज हुईं।
MPUVNL में पीएम-कुसुम-बी का काम देखने वाले कमलेश गहलोत ने कहा कि चोरी और बीमा दावों को पंप स्थापित करने वाली कंपनी संभालती है। इसलिए दावों की सही संख्या और मुआवज़े के भुगतान का पता लगाना मुश्किल है, और RTI के जवाब में भी यही कहा गया है।
चोरी के मामले सोलर पंप अपनाने की राह में एक चुनौती
2017 में सोलर पंप योजना शुरू होने के बाद से मध्य प्रदेश ने 59,400 स्टैंडअलोन सोलर पंप स्वीकृत किए हैं, जिनमें से 28,193 लगाए जा चुके हैं। यह स्वीकृत पंपों का लगभग 44.6% है और 31 अगस्त 2026 तक देशभर में लगे 11.69 लाख पंपों का 2.3% है। पहले चरण में 14,000 पंप लगे, दूसरे चरण में 6,787 और तीसरे चरण के आँकड़े अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं। हालाँकि राज्य का लक्ष्य अगले दो वर्षों में 4 लाख पंप लगाने का है।
गुजरात में सोलर सिंचाई अपनाए जाने का अध्ययन करने वाले पटेल का कहना है कि मध्य प्रदेश में सोलर पंपों को मिली फीकी प्रतिक्रिया को समझने के लिए सोलर उद्योग के आसपास के पूरे तंत्र को देखना होगा।
गुजरात ने कुल संख्या में कम सोलर पंप लगाए, लेकिन अपने स्वीकृत पंपों का 100% काम पूरा कर लिया है, जबकि मध्य प्रदेश में स्वीकृत पंपों के आधे से भी कम लगे हैं। पटेल के मुताबिक़ गुजरात की ताक़त उसका तंत्र है। वहाँ सैकड़ों सूचीबद्ध संचालन-और-रखरखाव (O&M) ऑपरेटर हैं, जिससे सोलर उपकरण लगाने, उपलब्ध कराने और उनका रखरखाव करने की स्थानीय क्षमता बनती है।
पटेल ने कहा, “एक बार पर्याप्त संख्या हो जाने पर, सोलर पैनल की आपूर्ति करने वाले के पास आख़िरी छोर तक पहुँचकर आपूर्ति और रखरखाव करने की सुविधा भी हो जाती है।”
हरियाणा, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों को बड़ा आवंटन मिला है और वहाँ स्थापना की दर भी ऊँची रही है।
गहलोत ने कहा कि सरकार मौजूदा चरण में स्थापना की रफ़्तार बढ़ाना चाहती है। उनके अनुसार पिछले चरणों में माँग और आपूर्ति के बीच के अंतर ने क्रियान्वयन को प्रभावित किया था, और सरकार लक्ष्य पूरा करने के लिए मौजूदा चरण में इन रुकावटों को दूर करना चाहती है।

चोरी भले ही व्यापक न हो, लेकिन यह सोलर पंप अपनाने में एक चुनौती बन सकती है।
रोहतास कुमार और उनके सहयोगियों के 2025 के एक शोध पत्र में, जो एशियन जर्नल ऑफ़ एग्रीकल्चरल एक्सटेंशन, इकोनॉमिक्स एंड सोशियोलॉजी में छपा, हरियाणा और राजस्थान के 240 किसानों का सर्वे किया गया। इन दोनों राज्यों में 3 लाख से ज़्यादा सोलर पंप लगे हैं।
उन्होंने पाया कि सोलर पैनल चोरी का डर हरियाणा में अपनाने वालों और न अपनाने वालों, दोनों में 100 में से 72.22 रहा। राजस्थान में यह अपनाने वालों में 61.11 और न अपनाने वालों में 63.33 रहा।
अपनाने वाले किसानों की प्रमुख चिंताओं में बिक्री के बाद की ख़राब सेवा, सोलर उपकरणों के लिए गुणवत्ता मानकों की कमी, ऊँची शुरुआती लागत, अपर्याप्त सब्सिडी, और प्रदर्शन व फ़ॉलो-अप सहायता की कमी शामिल थीं। जिन किसानों ने नहीं अपनाया, वे ख़ास तौर पर सिस्टम की ऊँची क़ीमत, कर्ज़ की कमी, कम जागरूकता और स्पेयर पार्ट्स व मरम्मत की सुविधा पाने में कठिनाई से जूझ रहे थे।
समाधान के रूप में पोर्टेबल सोलर
सीधी ज़िले के किसान जय सिंह चौहान ने कहा, “मैंने फ़िक्स्ड सोलर पैनल नहीं चुने, क्योंकि चोरी, तोड़फोड़ और पैनल टूटने का डर था।”
चौहान ने मोबाइल सोलर सिस्टम के लिए अपनी जेब से 3 लाख रुपये से ज़्यादा ख़र्च किए। यह फ़ैसला उनकी बिखरी हुई ज़मीन के हिसाब से भी ठीक बैठता था, क्योंकि उनके खेत कई छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटे हैं। उन्होंने बताया कि यही सिस्टम घर को बिजली दे सकता है, या आटा या दाल मिल जैसे छोटे उद्यम भी चला सकता है।
चौहान की तरह, हमसे बात करने वाले लगभग सभी किसानों ने सुरक्षा के उपाय के तौर पर मोबाइल सोलर पैनलों के बारे में सोचा था। लेकिन यदुवंशी के शब्दों में, “पैनल खोलना एक जटिल प्रक्रिया है” और उसमें “नुकसान का जोखिम” रहता है। इसके अलावा, सरकारी वित्तीय सहायता फ़िक्स्ड पैनलों के लिए तो उपलब्ध है, पर मोबाइल सिस्टम के लिए नहीं।

पटेल के गुजरात में किए गए शोध में यह भी देखा गया कि क्या एक ही फ़ीडर से जुड़े किसान अपने सोलर सिस्टम किसी साझा जगह पर इकट्ठा कर सकते हैं और फिर भी सिस्टम में अपना अलग हिस्सा बनाए रख सकते हैं। ऐसी व्यवस्था में समुदाय के लिए निगरानी और सुरक्षा आसान हो सकती है, और साथ ही एक साझा सामुदायिक संपत्ति भी बन सकती है। अध्ययन के अनुसार इससे “चोरी और संचालन से जुड़ी चुनौतियाँ ख़त्म हो सकती हैं”।
भोपाल में MPUVNL की अतिरिक्त कार्यकारी अभियंता वंदना चटर्जी ने बताया कि फ़िलहाल योजना का ध्यान ऑफ़-ग्रिड सोलर-चालित सिंचाई पर है। एक बार सिस्टम लग जाने के बाद किसान उसका जैसे चाहें उपयोग कर सकते हैं, लेकिन सरकार ने पोर्टेबल सोलर की कोई योजना अभी तक नहीं सोची है।
पटेल ने पोर्टेबल सोलर सिस्टम के एक और फ़ायदे की ओर इशारा किया: वे उपलब्ध सौर ऊर्जा का बेहतर उपयोग कर सकते हैं। उन्होंने कहा, “ऑफ़-ग्रिड सिस्टम में सबसे बड़ी चुनौती पूँजी का कम उपयोग है।”

एक सोलर पंप सिस्टम लगभग 300 दिन बिजली बना सकता है, लेकिन सिंचाई के लिए उसका उपयोग केवल लगभग 100 दिन होता है। पटेल ने कहा कि वे ऐसी किसी भी नीति का समर्थन करते हैं जिससे बनी बिजली का ज़्यादा उपयोग हो। उनका तर्क था कि ऑफ़-ग्रिड सोलर को केवल सिंचाई तक सीमित रखने के बजाय विकेंद्रीकृत, बहुउद्देशीय ऊर्जा के रूप में बढ़ावा दिया जा सकता है, जिसमें घरेलू और खेती की मशीनों की ज़रूरतें भी शामिल हों।
यदुवंशी ने, दूसरे किसानों की तरह, सोलर पंपों के फ़ायदे गिनाने में कोई झिझक नहीं दिखाई। लेकिन उनके लिए इन फ़ायदों पर उस व्यवस्था की हक़ीक़तें भारी पड़ती हैं जो इन्हें सहारा देने के लिए बनी है। पोर्टेबल ट्रॉली सिस्टम इनमें से कुछ चुनौतियों का हल दे सकता है, लेकिन सब्सिडी के बिना उसकी लागत सोलर पंप से तीन से चार गुना होती है, जिससे वह ज़्यादातर किसानों की पहुँच से बाहर है।
कासनिया ने कहा कि सरकार को या तो योजना को ज़मीनी हक़ीक़त के हिसाब से ढालना चाहिए, या तकनीकी सहायता देनी चाहिए ताकि किसान इस तकनीक का सहजता से उपयोग कर सकें।
नोट: यह रिपोर्ट इंटरन्यूज़ अर्थ जर्नलिज़्म नेटवर्क के सहयोग से तैयार की गई है।
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
यह भी पढ़ें
बरेठी सोलर परियोजना: तिरपाल के नीचे रहने को क्यों मजबूर हैं ग्रामीण?
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।
Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India
We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.
Connect With Us
Send your feedback at greport2018@gmail.com
Newsletter
Subscribe our weekly free newsletter on Substack to get tailored content directly to your inbox.
When you pay, you ensure that we are able to produce on-ground underreported environmental stories and keep them free-to-read for those who can’t pay. In exchange, you get exclusive benefits.
Your support amplifies voices too often overlooked, thank you for being part of the movement.




